"विद्यार्थी या शरारती"
(अंधेरे के अवगुंठन शीर्षक पर
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आद्या और काम्या शाम की चाय पीने के लिये अपने छात्रावास से बाहर निकले ही थे कि... आद्या_"अरे पुलिस अंकल! यहां कैसे ?आज यूनिफॉर्म में भी नहीं...लगता है आराम का एक दिन आप को मिल ही गया.वैसे आप अचानक यहाँ...!सब ठीक तो है?"
"बेटा चाय-शाय भी पिलाओगी या खड़े-खड़े सब पूछ लोगी. क्या कोई ढाबा है नज़दीक में?"
"बात-बात में हम पूछना ही भूल गए.आइये-आइये,वैसे भी हमलोग चाय पीने ही निकले
थे.बैठिये अंकल.वैसे बात क्या है?"
"क्या तुम राजन,अमन, चंदन को जानती हो?"
"जी अंकल,बड़े ही होनहार विद्यार्थी हैं ये और उतना ही इनका व्यवहार भी दोस्ताना...वैसे आप इन्हें कैसे जानते हैं?"
"बड़े ही शातिर दिमाग हैं ये सब.रात के अंधेरों में विदेशी खुफिया के लिए खबर पहुंचाने का काम करते हैं.ड्रग माफियाओं के साथ इनकी सांठ गांठ है.इतना ही नहीं ये अपने इस काम में पैसे कमाने का झांसा दे अन्य विद्यर्थियों को भी इस राह पर लाने का काम कर रहे हैं."
"तब तो ये देशद्रोही हुए"
"बिल्कुल सही कहा आद्या तुमने."
माथे पर हाथ रखते हुए काम्या_हे भगवान !विद्यार्थी के रूप में शरारती!किसकी नज़र लग गई?
अपर्णा झा