Monday, 25 September 2017

मुट्ठी बार बादाम

मुट्ठी बार बादाम

विवाह के कई साल बाद गोपाल के घर संतान सुख प्राप्त हुआ .ना जाने कितनी मन्नत और तम्मनाओं की पोटली बन जन्म लिया था फेंकन... नाम भी ऐसा की किसी की नज़र ना लगे बच्चे को...गोपाल को जब जो जैसे उस की खुशनसीबी और लंबी उम्र के लिए सलाह देता वह उन बातों को अमल करने पर तैयार हो जाता.आखिर गोपाल को उसमें अपना भविष्य जो दिख रहा था.
एक दिन ऐसे ही फौज से सेवानिवृत्त रामू काका भी गोपाल के घर पहुंचे और अपना विदेशी ज्ञान गोपाल को बघार कर चल दिये..." देख गोपाल...अगर तो इस बच्चे को बुद्धिमान और दीर्घायु बनाना चाहता है तो इसे बादाम खिलाया कर...."
बिचारा गोपाल एक तो किसान और वह भी गाँव का रहनेवाला... बादाम के कभी दर्शन भी नही हुए थे... फिर शहर जा किसी तरह मुट्ठी बाहर बादाम महंगे दामों में खरीद लाने लगा.बच्चे को इस आशा में खिलता कि बुद्धिमान बन भविष्य बना लेगा...घर के हालात सुधर जाएंगे...पर ये क्या अब जवान हुआ है तो घर के लाड़-प्यार ने तो उसे इतना बिगाड़ दिया है कि वह परिवार की क्या सुध लेगा,वो तो अपनी भी सुध नहीं ले पा रहा है....इस शोक ने गोपाल की जान ले ली...अब सारा बोझ फेंकन पर...आज घर की सारी जिम्मेवारी सर पर उसके पड़ी, वो और उसका परिवार दाने-दाने को तरसने लगे...
अब लोग भी गोपाल के घर की हालत देख कहने लगे...काश कि मुट्ठी भर बादाम खिलाने की बजाय आज फेंकन की पढ़ाई पर पैसे खर्च किये होते....
Aparna Jha
स्वरचित,मौलिक रचना.

तुम लिखते तो...

http://www.amarujala.com/kavya/mere-alfaz/aparna-jha-tum-likhte-to

Sunday, 24 September 2017

आपो दीपो भव

"आपो दीपो भव"
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"तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः सः पन्थाः।।"
(जीवन जीने के असली मार्ग के निर्धारण के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं है, श्रुतियां (शास्त्रों तथा अन्य स्रोत) भी भांति-भांति की बातें करती हैं, ऐसा कोई ऋषि/चिंतक/विचारक नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें। वास्तव में धर्म का मर्म तो गुहा (गुफा) में छिपा है, यानी बहुत गूढ़ है। ऐसे में समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति जिस मार्ग को अपनाता है वही अनुकरणीय है।
प्रतिष्ठित वह है जो चरित्रवान् हो, कर्तव्यों की अवहेलना न करता हो, दूसरों के प्रति संवेदनशील हो, समाज के हितों के प्रति समर्पित हो)

    आज के परप्रेक्षय में दो प्रकार के विद्वान :
1. एक वो जो वकीलों की तरह अपने बातों को सत्यापित करने के लिया बात-बात पर किताबों/ग्रंथों को संदर्भ बना अपनी तार्किकता को प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं, बेशक वो समसामयिक परिस्थिति के लिए प्रायोगिक हो ना हो...
2. दूसरे वो विद्वान जिन्होंने किताबें तो बहुत पढ़ीं हैं पर आंखें मूंदे उन्हीं रास्तो पर नहीं चलता बल्कि विभिन्न परिस्थितियों में संदर्भो को साथ ले अपने मस्तिष्क का भी उपयोग करते है और व्यवहारिक जीवन पर अपनी पैनी नज़र रखते हैं, सही और गलत का विचार करते हुए  उसी अनुरूप समाजहिक हित की बातें करते हैं.उनके लिए चिंतन का स्वरूप 'धारणा-प्रतिधारणा-समन्वय' पर आधारित होता है.
मेरे ख्याय से पहले प्रकार के विद्वान खुद में ही भ्रमित रहते हैं और लोगों को भी भ्रमित करते हैं...उनके पास कोई समाधान नहीं होता...  बस विद्वता का सहारा....जो कि भ्रांति फैलाने वाला और समाज के लिये घातक होता है. ऐसे में आवश्यक है कि व्यक्ति अपने को जागरूक रखे.
"आपो दीपो भव"(आप खुद के दीपक बनो).
Aparna Jha

Saturday, 16 September 2017

खबरों की खबर

"खबरों की खबर...."
सुबह गौरी लंकेशजी पर आधारित खबर एक चैनल पर देख रही थी...कई वरिष्ठ पत्रकार अपनी बातें रख रहे थे और रखना भी चाहिये.ऐसी नृशंश हत्या की यथासंभव भर्त्सना होनी चाहिए.मौत चाहे किसी की भी हो कभी भी अच्छा प्रतीत नहीं होता.
     उस समय चैनल पर जो कुछ दिखाया जा रहा था वह चूंकि मुझे तर्कसंगत लगा तो दो घड़ी मैं भी वहां देखने बैठ गई.बंगलोर के एक बहुत ही वरिष्ठ पत्रकार ने जो कुछ भी अपनी बातें रखीं वह बहुत ही तर्कपूर्ण लगी. उन्होंने कहा कि पत्रकारिेता में अक्सर ऐसा होता है कि बेबाकी से लिखने वाले मारे जाते हैं परन्तु कितनो के लिए संज्ञान लिया जाता है,इन खतरों को तो आये दिन लोकल पत्रकार झेलते ही रहते हैं.परन्तु आवाजें उन्ही लोगों के लिए उठती हैं जो किसी राजनीति से जुड़े होते हैं.गौरी लंकेश भी कुछ इसी प्रकार की थीं. परन्तु उनके मौत के कारणों में राजनीतिक के अतिरिक्त उन का जमीन को लेकर अपने भाई बहनों से अनबन और प्रॉपर्टी डीलरों का एंगल का आसार भी होना बताया.उसका कारण उन्होंने बताया कि सिटी पॉइंट या सेंटर जैसा कोई बंगलोर की जमीन बताई जिसकी बराबरी दिल्ली के कन्नौट प्लेस के बराबर आंकी गई.जिसका रुपयों में 40 से 50 करोड़ आंका गया है
       कहने का मतलब कि कोई भी इस तरह की दुर्घटनाएं होती हैं और न्यूज़ चैनल आपको लगातार इससे संबंधित अनाप शनाप बातों से लगातार अवगत कराता रहता है_ ये देखिए वो दीवार....वो दरवाज़े.... उनका वो कमरा....आपके समक्ष सबसे पहले हमारे न्यूज़ चैनल, आप तक ले आये हैं.....क्या मतलब निकलता है इन खबरों का.….
.. और इन  सब के बीच अपने को  सबसे ऊपर बताने की होड़ में ना जाने खबरों को किस तरह तोर मोड़ दिया जाता है की आपको पता भी नही लगता.आप भी खबरों के इंतिज़ार में क्या कुछ बेसिर पैर की बातें देख जाते हैं.
         मेरे खयाल में खबर ऐसी बननी चाहिए जिसमें तर्क हो और तंत्र को हिलाने का माद्दा हो. नाकि हर बातों में राजनीति को बीच में ला TRP बटोरी जाय.
    पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना गया है  जो तीनों स्तम्भों से समाज को जोड़ता है , एक आम राय बनाने में सहायक होता है. अपनी भागीदारी से समाज को मजबूत बनाता है.ऐसे में पत्रकारिता को समाज के लिए एक संवाद की कड़ी बनने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए ना कि खुद को ही एक खबर बनाने की होड़ में लगा रहना चाहिए.
Aparna Jha

Thursday, 14 September 2017

शाम्भवी दी (हिंदी दिवस के बहाने एक संस्मरण)

"शाम्भवी दी"
हिंदी दिवस के बहाने(संस्मरण)

"अरे कहाँ हो मंजू, सोना, मोना !कोई तो दया करो इस गरीब पर.....मुँह टेढिया टेढिया के बोलकर थक गई हूँ....."
"ऐसा क्या हुआ....शाम्भवी दी???
"अरे कुछ नहीं सोना...बस कुछ इतिहास के विभाग में अहिन्दी भाषी लोग आए थे....बात चीत थोड़ी लंबी खींच गई.....वो भी अंग्रेज़ी में.....अब तो चाय पिला दो."
हम सबकी चहेती, गंगा होस्टल में रहने वाली 'शाम्भवी दी'. बिल्कुल  ठेठ बिहारी मस्ती वाला अंदाज़...कैम्प्स में जहां से वो गुज़रती, विद्यार्थी लोग उनकी सादगी और बोलने केअंदाज़ के कुछ इस तरह दीवाने थे कि होस्टल तक उनका पीछा करते...और इस बीच किसी को उन्होंने टोक क्या दिया बस शर्म से मानों सैंकड़ों घड़ा पानी उस बच्चे पर पड़ जाता.
शाम्भवी दी पटना की एक अमीरघर की बेटी थी जिन्होंने मिशनरी स्कूल से शिक्षा ले उच्च शिक्षा दिल्ली के लेडीज़ श्रीराम कॉलेज से की और फिर जेएनयू में शोधकर्ता के रूप में रहीं.
वो छात्र जो दूसरे राज्यों से हिंदी माध्यम से पढ़कर आते उनके लिए शाम्भवी दी तो मानो वरदान से कम नहीं.ऐसा इसलिए कि इस युनिवर्सिटी में लोगबाग अंग्रेजी ही खाते-पीते,उठते-बैठते और सांस भी अंग्रेज़ी में ही लेते.ऐसे में कुछ दिनों के लिये नये प्रवेश लिए हुए हिंदी भाषियों  का तो जैसे अंग्रेज़ी संग सामना मानो कान बहरा हो जाना शरीर फूल जाना ,ऐसी ही हालत हुई रहती.
हालांकि शाम्भवी दी जितनी ही सुंदरता से हिंदी बोलती उतने ही सौम्यता से अंग्रेजी.परन्तु ज्यादा समय उनका वो अजबे-गजबे वाला भोजपुरिया हिंदी ... क्या गज़ब ढाता... इस बात के गवाह वहां का हर एक विद्यार्थी और प्रशिक्षक थे.
उनसे जब भी कोई हैरानीवश पूछ बैठता की तब जब कि वह इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हैं और इतनी कुशाग्र बुद्धि भी, फिर भी जानबूझ कर अपनी ऐसी छवि उन्होंने क्यों बना रखी हैं?तब वह पूरी गंभीरता से यही कहतीं .... "जैसे जीवन के लिये आक्सीजन जरूरी है वैसा ही महत्व भाषा का भी हमारे जीवन पर है.वो भाषा जिसे बोलकर अपना बचपन, अपनी जवानी अपने ढलते उम्र को जिया है उसकी जगह, समय की जरूरत अनुसार जिस नई भाषा को अंगीकार किया वो उसकी जगह भला कैसे ले सकता.वह तो हमारे आत्मा की आवाज़ है जो हमें उस तक पहुंचाती है, हमारे और उसके बीच एक रिश्ता कायम कराती है...रिश्ता करीबी का....प्रेम का...अपनेपन का...
उससे भला मुझे कोई कैसे अलग कर सकता???मुझ से मेरी भाषा का खोना यानि मेरे शरीर को मेरी आत्मा से अलग करना.....अच्छा,
तुम ही लोग  बताओ...क्या ऐसा कभी संभव है भला!!!
तीन वर्षों का सानिध्य उनसे और फिर देश के सर्वोच्च सेवा की परीक्षा में राष्ट्रीय स्तर पर 19सवें स्थान को प्राप्त कर अपने कर्मक्षेत्र की ओर शाम्भवी दी चल पड़ीं.कितना कुछ सीखने को मिला,कितना कुछ सिखा गईं उन तीन वर्षों में. हिंदी भाषा उनकी अपने जमीन से जुड़ाव और अक्षुण्ण प्रेम की अभिव्यक्ति का रूप थी जिसे वो भरपूर जीती थीं और इसे कभी अपने से अलग देखना भी नहीं चाहती थीं...
बस ऐसी ही थीं हमारी 'शाम्भवी दी'.
Aparna Jha

Monday, 4 September 2017

तूफान

"तूफान"
"हाँ माँ, अब बहुत हो चुका, नैना को जहां जाना हो वो जाए."
"अरे बेटा ! वो हमारी बहु है , वो भला कहां जाएगी...."
"माँ ,ये आप ऐसा सोचती हैं ना...परन्तु सुनैना कुछ और ही सोचती है.तंग आ गया हूँ  उसके अपने परिवार और दोस्तों की प्रशंसा सुनते सुनते...."
".....समय का अब और इंतिज़ार नही कर सकता...ना तुम उसकी अच्छी सास और ना ही मैं अच्छा पति बन पाया."
"ये भी बात सही है कि हम उसकी नादानियां भी समझते हैं और फिर उससे प्यार भी करते हैं."
"तो फिर ऐसा फैसला क्यों???"
"माँ समझा करो..."
"हम अपने प्यार के लिए उसकी जिंदगी तबाह तो नहीं कर सकते ना!
वैसे भी घर में तो अशांति ही तो छाई रहती है...."
"अब मैं क्या कहूँ..... जैसा तुम ठीक सोचो बेटा...."
तभी सुनैना की आवाज़ आई.वह अपने सूटकेस संग मायके विदा हो गई.
तीन-चार चार दिन बाद ....
"हैलो, नैना बोल रही हूँ....
तुम सुन रहे हो ना मेरी बात....
अजय मुझे प्यारी हवाओं के झोंकों की आदत है, ये मुझे किस तूफान में झोंक किनारे लग गए हो....
मुझे तुमलोगों की आदत है, मैं ऐसे में जी नहीं पाऊंगी....
तुम आते क्यों नहीं.... मुझे अपने और तुमलोगों के प्यार का अंदाज़ा ना था ...
आये तूफान को तुम्हीं टाल सकते हो....
सुन रहे हो ना मेरी बात....
हैलो....हैलो...."