"आपो दीपो भव"
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"तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः सः पन्थाः।।"
(जीवन जीने के असली मार्ग के निर्धारण के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं है, श्रुतियां (शास्त्रों तथा अन्य स्रोत) भी भांति-भांति की बातें करती हैं, ऐसा कोई ऋषि/चिंतक/विचारक नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें। वास्तव में धर्म का मर्म तो गुहा (गुफा) में छिपा है, यानी बहुत गूढ़ है। ऐसे में समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति जिस मार्ग को अपनाता है वही अनुकरणीय है।
प्रतिष्ठित वह है जो चरित्रवान् हो, कर्तव्यों की अवहेलना न करता हो, दूसरों के प्रति संवेदनशील हो, समाज के हितों के प्रति समर्पित हो)
आज के परप्रेक्षय में दो प्रकार के विद्वान :
1. एक वो जो वकीलों की तरह अपने बातों को सत्यापित करने के लिया बात-बात पर किताबों/ग्रंथों को संदर्भ बना अपनी तार्किकता को प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं, बेशक वो समसामयिक परिस्थिति के लिए प्रायोगिक हो ना हो...
2. दूसरे वो विद्वान जिन्होंने किताबें तो बहुत पढ़ीं हैं पर आंखें मूंदे उन्हीं रास्तो पर नहीं चलता बल्कि विभिन्न परिस्थितियों में संदर्भो को साथ ले अपने मस्तिष्क का भी उपयोग करते है और व्यवहारिक जीवन पर अपनी पैनी नज़र रखते हैं, सही और गलत का विचार करते हुए उसी अनुरूप समाजहिक हित की बातें करते हैं.उनके लिए चिंतन का स्वरूप 'धारणा-प्रतिधारणा-समन्वय' पर आधारित होता है.
मेरे ख्याय से पहले प्रकार के विद्वान खुद में ही भ्रमित रहते हैं और लोगों को भी भ्रमित करते हैं...उनके पास कोई समाधान नहीं होता... बस विद्वता का सहारा....जो कि भ्रांति फैलाने वाला और समाज के लिये घातक होता है. ऐसे में आवश्यक है कि व्यक्ति अपने को जागरूक रखे.
"आपो दीपो भव"(आप खुद के दीपक बनो).
Aparna Jha
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