Saturday, 28 July 2018

ख़त

"ख़त"
आज सुशीला अपने पति का ख़त पढ़ रही थी और उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे अब सोचना क्या है!
एक वो प्यार भरा ख़त जब सुशीला के पति ने उसे शहर जा कर लिखा था, "मैं बहुत अकेला हो गया हूँ,मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगा..."
सुशीला ने इस एक खत के सहारे जीवन के 25 साल मुस्कुराते निकाल दिए.आज इतने सालों बाद ये ख़त कि "मेरा इन्तिज़ार ना करना,मैं अब तुम्हारे जिंदगी में शामिल नहीं..."
सुशीला की मां हैरान थी...
"काग़ज़ का टुकड़ा ही तो था और उस पर चंद अल्फ़ाज़... भला जीवन में इतना तूफान भर देगा, सोचा ना था."
अपर्णा झा

नीम का पेड़

आज अपने रुग्ण अवस्था में पड़ोसी के दादा जी अपनी दुखड़ा सुना रहे थे..."माँ-पिता विहीन हम दोनों पति- पत्नी से पूछे कि नीम के पेड़ की महत्ता क्या है.कितनी बार मुझे पत्नी की डांट सुननी पड़ी कि जब  भी बोलते हो तो कड़वा ही बोलते हो...अब तो बच्चे भी बोलते हैं कि बाबूजी लगता है नीम का पत्ता खाकर पैदा हुए हैं..."
"अरे जाने दो शीला, तुम तो जानती हो ना मेरा स्वभाव.आज बच्चे कुछ भी बोलें,कल जब यही लायक हो जाएंगे तो इसी  नीम के पेड़ पर वो गर्व करेंगे..."
"सुखद भविष्य की आस में  मैंने कितना कुछ सहा पर अपने परिवार की जड़ को हिलने नहीं दिया...पर आज जब फल चखने की बारी है तो समझ में नहीं आ रहा कि वाकई ये बूढ़ा नीम सारे जीवन एक कड़वे फल की ही देखभाल करता रहा..."मैं चुपचाप बैठी सोच रही थी कि वाकई नीम का पेड़ इतनी कड़वाहट पैदा करता है!!!
अपर्णा झा
स्वरचित,मौलिक रचना

बस यूँ ही

बस यूँही...
अंतसस्थल में चल रहे उथल-पुथल,शोर और कोलाहल को शब्दों में पिरो जाना इतना आसान नहीं होता, परन्तु जो यह कर पाता है उसकी आत्मिक संतुष्टि और परमानंद की कोई सीमा नहीं होती.फिर क्या फर्क पड़ता है कि विद्वतजन उसे किसी परिधि में लाएं या ना लाएं. आरम्भ बिंदु तो हो कहीं...
कितने ही स्थापित साहित्यकारों को पढ़ती हूँ और यह बात मेरे मन में स्थापित हो चुकी है कि जैसे हर महान बल्लेबाज हर गेंद पर चौका या छक्का नहीं मार सकता और कभी यूँ भी कि शून्य पर भी आउट हो जाता है. यही बात साहित्य में या कहें जिंदगी के मोड़ पर यह स्थिति आती ही है.
बस कोशिश यह हो कि जो जिस मार्ग पर ईमानदारीपूर्वक चल रहा है,खामियां उसमें चाहे कितनी भी हो पथप्रदर्शक बन निश्चितरूप से  उसे सही रास्ता दिखाने  में हम संकोच ना करें.
अपर्णा झा

समीक्षक

बस यूँही...

अच्छा डॉक्टर वही होता है कि आपको अपने प्यार के दो बोल से कड़वी दवा भी पिला जाता है और गंभीर से गंभीर बीमारी को भी जड़ से ठीक कर देता है.

समीक्षक की भूमिका भी ठीक वैसी ही होती है.एक तरफ तो उसे विषय का ज्ञान होता है और दूसरी तरफ किसी रचनाकार की लेखनी को पढ़ते ही उसे रचनाकार की लेखन के प्रति गंभीरता का भी पता लग जाता है.ऐसे में लेखक की लेखन के प्रति गंभीरता और समर्पण भाव को देखते हुए उसे सही राह ले जाने में  एक समीक्षक की खुद की भी परीक्षा हो जाती है.

एक समीक्षक का संतुलित होकर समीक्षा करना ही उसके सफल समीक्षक की निशानदेही करता है.लेखन हर कोई बेहतर कर सकता है पर सही समीक्षा करना सबके बस की बात नही और इसके ठीक पलट यह भी कि जो समीक्षा बेहतर करता हो,जरूरी नहीं कि वह साहित्य लेखन भी उस कोटि का करे.
अपर्णा झा

असहिष्णु

इतनी निराशाओं के साथ  जिंदगी को जिया तो क्या जिया ???भ्रांतियों में जीना और फिर कहना कि माहौल खराब है...!!! जिन्होंने यह लिखा और उसे सामाजिक पटल पर रखा तब वह असुरक्षित नहीं हुए,उनकी जान किसी ने नहीं ली  तो फिर ऐसे लेखन से समाज को डराना कैसा!!!मैं समझती हूं देश को बदनाम करने की एक साजिश छोड़ और कुछ भी नहीं…
आप नाम से असुरक्षित हैं, जीना चाहते हैं तो जाकर उस स्त्री के जीवन चरित को जानिये जो अपने माँ-बाप को हंसता देखने के लिये सदैव अपनी आहुति देती रहती है,परिवार बनाने हेतु उसने खुद को भुला दिया और जब परिवार बना दिया तो बच्चे पूछते हैं कि तुम कौन? और फिर भी जीना नहीं छोड़ती,अपनी निराशा नहीं दिखाती, क्योंकि तब भी मां को अपने माँ और स्त्री होने का खयाल रहता है,वो जीना,हंसना और आशीर्वाद देना नहीं छोड़ती कि भले ही उसका जीवन खुद की आहुतियों में गुज़रा हो, पर इस ख़याल से की बच्चे उसके जीवन को देख उसके जीवन के बाद भी संस्कारवान हो जाएं तो भी उसका स्त्री जन्म सफल हो जाएगा.
हम कितने असहिष्णु हो चुके हैं कि छोटी-छोटी बातों पर उबाल खाने लगते हैं....!!!!
अपर्णा झा

*माफ़ कीजियेगा यहाँ अपवाद की बात को अलग रखा है.

शक

"शक"
"आज की ताज़ा खबर का पता लगा!"
"नही तो!"
"ऐसी क्या बात हो गई ???"
"अरे सुबह से ही ना जाने क्यों मन में उस फिल्म के विलेन की याद आ रही है...
देखो ना !फिल्म का नाम याद नहीं आ रहा..."
"किस फ़िल्म की बात कर रही हो भला, रचना....."
"अरे प्रीति, वही जिसमें नासिरुद्दीन शाह ग़ज़ल गायक के रूप में प्रत्यक्ष और परोक्ष में कुछ और ही छवि का इंसान...."
"हाँ,याद आया."
"कौन सी....." अरे तुम कहीं 'सरफरोश' की बात तो नहीं कर रही!!!"
"हाँ.. हाँ... वही-वही."
"लेकिन हुआ क्या !माज़रा क्या है....? कुछ तो बताओगी ..."
"हमारे पड़ोस में जो रमेश था....वही जिसकी  समाज में बहुत पूछ थी...."
"हाँ हाँ...याद आया प्रीति..बहुत अच्छे से...."
"आज पता लगा कि उसने तो अपने अलग-अलग कई नाम रखे हुए हैं.अपनी सुविधा और परिस्थिति के अनुसार नाम बदल लेता है.आज ही अख़बारों के माध्यम से पता लगा कि वह अपने अलग अलग नामों से फेसबुक पर भी है.कहीं शिक्षाविद,कहीं धर्मतटस्थ और कहीं जातिवाद और धर्मगत के पोस्ट डालता है. उसके चाहनेवालों की लंबी कतार है".
"पर रचना ! इस सब से क्या हासिल...."
तभी अर्पिता ने बीच में ही रोकते हुए कहा....अरे ऐसे व्यक्तित्व का कोई ठिकाना नही....
ऐसे लोग सदैव रहस्यमय होते हैं जिन्हें अपने ही बारे में कुछ पता नही...और ऐसे ही इंसान बहकावे  का शिकार होता है.
मुझे तो यह इंसान शुरु से ही रहस्यमय लगता था....समझ में नही आता कि मेरा शक सही या नहीं.....क्या ऐसे लोगों  की दोस्ती सही या नहीं.....
Aparna Jha

भविष्य निर्माण

"भविष्य निर्माण"

मेरी कुछ आदतें जो मेरे बेटे और पतिदेव को बिल्कुल पसंद नहीं, पर आदतन मैं ऐसा करती हूं.मुझे ऐसे में कभी कभी उनसे 'जाहिल-गंवार' के विशेषण भी सुनने पड़ जाते हैं.रास्ते चलते हुए आंख-कान को हर जगह दौड़ाते रहती हूं कि शायद कुछ बातें मुझ से छूट ना जाएं... और कोई अलग सी बात लगी तो वहां रुक कर उसे पूरी तरह से समझना चाहती हूं,जबतक कि वस्तुस्थिति पूरी तरह से समझ में ना आ जाय.
ऐसा ही एक वाकया रहा जब हाल ही में मैं अमृतसर गई थी.शाम का समय, स्वर्ण मंदिर के बाहरी परिसर में  चलते हुए....पता नहीं ये इलाका पहले कैसा था पर आज सुंदर-सुंदर गार्डेन चेयर और एक खास ऊंचाई पर पूरे रास्ते लैम्पपोस्ट. कल्पना लोक में विचरने के लिये और क्या चाहिये..
चलते-चलते मेरी नज़र,एक कुर्सी पर कुछ less privileged class के बच्चे आपस में बड़े जोशो-खरोश में बातें कर रहे थे,उनपर पड़ी.मैं  उनके बात करने के तरीकों से आकर्षित हो जिज्ञासावश उनमें शामिल हो गई.मेरी ओर बच्चे देख मुस्कुराने लगे.पूछा क्या बातें हो रहीं हैं...!सभी बच्चे एक साथ बोल पड़े...कल रात इसके पापा ने बहुत पी ली थी तो इसके पापा ने बड़ी पिटाई की...तबतक दूसरा कहने लगा..."आँटी नहीं ऐसे हुआ...और फिर तीसरा अपने बात...."
मतलब ये कि इन बच्चों को भी पता था कि दारू के नशे में की गई मार-पीट गंभीरता से नहीं ली जाती और उसका असर ना उनके बच्चों की दोस्ती पर होता है और ना पियक्कड़ों की दोस्ती पर...हाँ, थोड़ी देर के लिए  झुग्गी परिसर में मौज-मस्ती आ जाती है...बस जो असर होता है वह उनकी माँ-बहनों पर जो एक तरफ उस व्यक्ति की जान बचाना चाहते हैं और दूसरी तरफ अपनी शर्मिंदगी को पर्दे में छुपाने का नित्य ही एक अथक प्रयास करते रहते हैं...
मैं हैरान इस बात से हुए जा रही थी कि
हम सोचते हैं बड़ों में ही परिपक्वता होती है...संवेदनाओं का भान भी बड़े होकर ही आता है ....बच्चे तो बच्चे हैं,आज सुने, कल भूल जाएंगे.पर,मुझे लगा कि मैं बिल्कुल गलत हूँ.हर उम्र के लोग अपनी तरह के लोग ढूंढ अपना समूह बना ही लेते हैं,जहां वे अपनी भावनाओं के उद्गार व्यक्त करते हैं,चर्चाएं करते हैं, समान परिस्थियों में आई विषमताओं को तुलनात्मकता के आधार पर सोच खुद को वर्तमान और भविष्य हेतु तैयार होने की नींव अपने बचपन में ही जमा लेते हैं.
और एक हम बड़े लोग इस सोच में बैठे होते हैं कि उनके बच्चों के भविष्य का निर्णय उन्हें ही लेना है,डॉक्टर-इंजीनयर बना कर...
क्या ये विडम्बना नहीं तो और और क्या है...!!!
अपर्णा झा

साहित्य दोहन

आज आदरणीय Gangesh Gunjan जी का पोस्ट 'यश विलास' से प्रेरित हो मेरे जो उद्गार लेखनी के माध्य्म से आये उसे यहां साझा करती हूं:
यथार्थ ही लिखा है आपने.जब मैंने अपनी लेखनी थामी थी तो लगता था कि मैं क्या लिख रही हूं?फिर थोड़ी सी हिम्मत आयी और लिखना शुरू कर दिया.साहित्यिक समूहों में अपने पोस्ट साझा करने लगी.ज्यादा नहीं  2-3 ही महीने हुए थे कि मुझे साझा संकलन में अपनी रचना प्रकाशित करने हेतु न्योता भी आया.मेरे लिये यह एक ऐसी खुशी का मौका था कि घर में किसी की सलाह पर अमल करना ही नहीं था.ख़ैर,2500 रुपए खर्चे और साझा संकलन भी आ गया.आज 4 साल हो गए... 10 प्रति में में किसी को भी बांट नहीं पाई सिवाय बाबूजी के. क्या बांटती भला!!! एक तो लिखना नही आता था, दूसरे कि दो-तीन किताबों में रचनाएँ प्रकाशित करने पश्चात यह समझ में आया कि आपकी रचना का सम्पादन करना तो दूर की बात यदि साइज लंबी हुई तो ऐसे कैंची लगता है कि रचना...तौबा तौबा...
इतना ही नहीं अब तो बात यह भी समझ में आ गई कि आप एक *समूह से साल भर के प्रकाशन हेतु कुछ 5-10 हज़ार की राशि जमा करें और ऐसे में आपको सालभर साझा संकलनों में तो आपकी रचना प्रकाशित होगी ही और साथ में इतने सारे शॉल, प्रशस्ति पत्र और साहित्य सम्मानों की झड़ी लग जायेगी कि आप भी खुद में आश्चर्य करेंगे.खैर,जिन्हें दुकान चलाना है वो चलाएं.परन्तु ऐसे में साहित्य सम्मान पाने वाले लोग 'तगमा खरीदना' या फिर 'आज तेरी कल मेरी' के सिद्धांतों पर चलने वाले क्या कभी खुद से  बात करते होंगे कि वाकई में वो इसके काबिल थे  भी या नहीं?
माफ़ कीजियेगा,आज के समय जितनी गुणवत्ता साहित्य के क्षेत्र में मौजूद है वह शायद ही कभी हो परन्तु इस खरीद-फरोख्त के दौर में असली काबिलियत कहीं खो सी जाती है...
ऐसे में मुखपोथी का timeline मुझे सबसे उचित स्थान दीख पड़ता है जहां आप खुद को व्यक्त कर पाते हैं.
मैं नहीं जानती कि मेरी बातों से कितने लोग संतुष्ट होंगे.पर हाँ मैंने खुद के लिये घाटे का काम किया है कि मैं अपनी रचनाओं को थोड़े से धनराशि देकर छपवाऊँ और सम्मान प्राप्त करूँ. मेरे लिये मेरा 'timeline और कुछलोग' यही संतुष्टि देती है.
अपर्णा झा
*मेरा कथन हर समूह हेतु लागू नहीं होता.

APJ kalam आज़ाद

Dr APJ Abdul Kalam
एक ऐसा व्यक्ति जिसे मैं फरिश्ता मानती हूँ . फरिश्ता यानि जिनकी उपस्थिति से सम्पूर्ण वातावरण साकारात्मक , अर्थपूर्ण , और खुशनुमा हो जाये , जिनका आस्तित्व तपस्वियों सा ठहराव , शीतलता , शुध्दता और पवित्रता की अनुभूति कराये , जिसके समक्ष भौतिकता , धर्म , भाषा , स्थान और " वाद " बेमाइने लगने लगे , ऐसे इंसान का ना होना बस ऐसा प्रतीत होता है मानो मीठे से सपने में फरिश्ते से बात हो रही हो और अचानक नींद खुल जाये और वो फरिश्ता मानो सामने से गायब हो जाये . मेरे मन में shri APJji के लिये यही भावना रही है और उनकी कमी हमेशा खलेगी . आपको मेरा सलाम .
अपर्णा झा

देश कहाँ, धर्म कहाँ

"देश कहाँ और धर्म कहाँ....!"

समझ में नहीं आता कि खुद को परिभाषित करूँ या वर्तमान को...
हम दूषित हुए हैं या समय हमें दूषित कर रहा!
यह सब क्या...मोबलिन्चिंग तो गाय-भैंस हत्या या फिर हिन्दू आतंकवाद और मुसलमान आतंकवाद...
क्या देश की प्रगति,सर्वधर्मसमभाव और वसुधैव कुटुम्बकम की संस्कृति को भूल चुका है.मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति प्रेम जिसे कवि कोकिल विद्यापति ने कहा:
"देसिल बयना सब जन मिट्ठा..."
अर्थात : "अपने देश या अपनी भाषा सबको मीठी लगती है।"
क्या हम भूल चुके उस अमीर खुसरो को जिन्होंने हमारे देश को गंगा-जमुनी तहजीब दी.जरा सोचिये तो एक ऐसा इंसान जिसका पिता तुर्की और माँ हिन्दू जिन्हें मुसलमान आक्रांताओं के हुकूमत ने मुसलमान बना दिया.जिस दौर में कदम कदम पर धर्मांतरण की धमकी मिलती हो, जहां उसे अपने गुरु से मिलने पर पहरा हो...मुसलमान सुल्तानों के अलग अलग दरबार में मंत्री भी हो,फनकार भी हो और फौज में सिपहसालार भी हो.जिसने स्त्रियों के दर्द को समझा,जिसने बेटी के बाप होने के दर्द को समझ(बाबुल ना ब्याहो विदेश...),जिसने हिन्दू रानी के इज़्ज़त को सम्मान दिया था(पद्मावत की गाथा जहां अलाउद्दीन खिलजी को खुसरो ने पद्मावत को जीतने की मनाही की थी),मैं सोचती हूँ वो कैसा वतनपरस्त इंसान होगा.कैसा होगा वो इंसान जिसकी कविताएं हिंदी में झूमती थी,उत्सवों का एहसास कराती थीं.उसे हिंदुस्तानी के सांवले रंग पर घमंड था.खुसरो कहा करते थे कि उन्हें हिदुस्तान के रंग-रंग में मुहब्बत का खयाल आता था.खुसरो ने यह कैसे लिखा होगा  कि  "मुसलमानों का खयाल है कि मौत के बाद उन्हें जन्नत नसीब होती है, इसलिये जीवन उनकेलिय एक 'कैदखाना' है लेकिन हिन्दोस्तान में जो ठंडी हवाएं चलतीं है वही इस देश को जन्नत बनाती है और इस कारण यहां बसने वाले आक्रांता इसे क़ैदख़ाने की बजाय बहिश्त(जन्नत) कहते हैं.
आज जहां धर्म और वर्ग संकीर्णता की पराकाष्ठा है वहीं अमीर खुसरो ने लिखा कि यहां का मौसम अमीर-गरीब सभी को रास आता है...जहाँ किसान एक पुरानी चादर में ठंडी रात गुज़ार लेता है वहीँ ब्राह्मण रात्रि के अंतिम प्रहार में जमुना नदी के किनारे ठंडे पानी की डुबकी लगा लेता है.
इतने भाषाओं और जीवन के विभिन्न विधाओं के धनी भारतीय दर्शन की तारीफ़ करते और संस्कृत को फ़ारसी से बड़ा मानते.पक्षियों की भाषा समझने वाले खुसरो भारतीय पक्षियों के लिये कहते हैं कि ये तो इंसानों की तरह बोली बोलते हैं, जहाँ कौवे भविष्य की बातें करते हैं वहीं गौरैये गुप्त बातों का पता बतातीं हैं....
हैरानी होती है  मध्यकालीन भारतीय देश में भी नागरिक इतना धर्मनिर्पेक्ष हुआ करते थे!!!
इस देश ने तो सदैव जीवन का अपना एक सिद्धांत जिया है, समय,समय पर आक्रांताओं के आक्रमण से खुद को मजबूत और संस्कृति को धनी किया है तो फिर,आज हम अपने सामाजिक प्रगति को वैश्वीकरण के शिखर पर होते हुए भी प हमारे सोचने की शक्ति भला इतनी कमज़ोर कैसे हो गई है. इतने शिक्षित होकर भी हमारे सारे तर्क एक एक कर धराशाई क्यों हो रहे हैं...क्या किसी सभ्यता का अंत अपनों से और विनाशकाले विपरीत बुद्धि से ही होता है...और यदि यही सच है तो क्या हम उस विनाश के पथ पर अपना कदम बढ़ा चुके हैं????
अपर्णा झा