बस यूँही...
अंतसस्थल में चल रहे उथल-पुथल,शोर और कोलाहल को शब्दों में पिरो जाना इतना आसान नहीं होता, परन्तु जो यह कर पाता है उसकी आत्मिक संतुष्टि और परमानंद की कोई सीमा नहीं होती.फिर क्या फर्क पड़ता है कि विद्वतजन उसे किसी परिधि में लाएं या ना लाएं. आरम्भ बिंदु तो हो कहीं...
कितने ही स्थापित साहित्यकारों को पढ़ती हूँ और यह बात मेरे मन में स्थापित हो चुकी है कि जैसे हर महान बल्लेबाज हर गेंद पर चौका या छक्का नहीं मार सकता और कभी यूँ भी कि शून्य पर भी आउट हो जाता है. यही बात साहित्य में या कहें जिंदगी के मोड़ पर यह स्थिति आती ही है.
बस कोशिश यह हो कि जो जिस मार्ग पर ईमानदारीपूर्वक चल रहा है,खामियां उसमें चाहे कितनी भी हो पथप्रदर्शक बन निश्चितरूप से उसे सही रास्ता दिखाने में हम संकोच ना करें.
अपर्णा झा
Saturday, 28 July 2018
बस यूँ ही
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