Saturday, 28 July 2018

समीक्षक

बस यूँही...

अच्छा डॉक्टर वही होता है कि आपको अपने प्यार के दो बोल से कड़वी दवा भी पिला जाता है और गंभीर से गंभीर बीमारी को भी जड़ से ठीक कर देता है.

समीक्षक की भूमिका भी ठीक वैसी ही होती है.एक तरफ तो उसे विषय का ज्ञान होता है और दूसरी तरफ किसी रचनाकार की लेखनी को पढ़ते ही उसे रचनाकार की लेखन के प्रति गंभीरता का भी पता लग जाता है.ऐसे में लेखक की लेखन के प्रति गंभीरता और समर्पण भाव को देखते हुए उसे सही राह ले जाने में  एक समीक्षक की खुद की भी परीक्षा हो जाती है.

एक समीक्षक का संतुलित होकर समीक्षा करना ही उसके सफल समीक्षक की निशानदेही करता है.लेखन हर कोई बेहतर कर सकता है पर सही समीक्षा करना सबके बस की बात नही और इसके ठीक पलट यह भी कि जो समीक्षा बेहतर करता हो,जरूरी नहीं कि वह साहित्य लेखन भी उस कोटि का करे.
अपर्णा झा

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