Friday, 31 August 2018

मेरी पहली रेल यात्रा

आज भी याद आता है अपनी वो पहली रेल यात्रा...कक्षा एक की विद्यार्थी मैं, अशोक कुमार के स्वर में वो गीत 'रेलगाड़ी छुक-छुक-छुक,बीच वाली स्टेशन बोले रुक-रुक-रुक...' पता नही उस दौरान वातानुकूलित बोगी की सुविधा थी या नहीं...हम प्रथम श्रेणी कक्ष में प्रवेश लिए. 5 लोग तो हमहीं थे और छठा कोई एक और...फिर बाबूजी ने कक्ष का दरवाजा कुछ इस तरह से अंदर से बन किया जैसे अपने घर के मुख्य द्वार को रात के समय बंद करते हैं.तीन दिन का सफर...जमशेदपुर से दिल्ली और फिर जम्मू...,
स्टेशन पर बिकने वाले हर खाद्य पदार्थ चटखारे ही लगते, ट्रेन का खाना मानो किसी ने ससम्मान आमंत्रित किया हो...नदी,पहाड़,पठार, भोर,साँझ दुपहर हर कुछ नई ही तो लग रही थी.बड़ी बहनों ने जो इतिहास,भूगोल और समाजशास्त्र की किताबें पढ़ीं थी, सब पाठ सदृश्य हो रहे थे...वो देखो एटलस सायकिल का कारखाना,तो वो देखो चीनी मिल इत्यादि-इत्यादि.उस सब समय में यह मस्ती सी लगती थी,पिकनिक सी लगती थी और फिर वही रेल यात्रा कुछ खास से आमबातों सी  हो गई. क्योंकि हम बड़े ही हुए थे रेल की सफर करते हुए.बाबूजी की नौकरी कुछ समय सीमा पर स्थानों का स्थानांतरण नुमाया करती.

जब कॉलेज जाने लगे तो घर में भी एक स्थायित्व सा आ गया.और फिर सालों तक रेल को हमने देखा नहीं. गर्मी या सर्दी की छुटियों में होस्टल वाले विद्यार्थी 15 दिन पहले से रेल टिकट की कतार में लगने लगते तो क्लास बिल्कुल खाली हो जाता.मैं यूँही एक दिन मित्रों के समक्ष हंसी-मज़ाक में बोल उठी_" तुमलोग एक महीने पहले से रेलवे रिज़रवेशन की बातों से बोर करने लगते हो..." तभी एक मित्र मुंह बना कर बोल बैठा...कभी रेल में बैठी भी हो?"बड़ा अटपटा सा लगा था तब,कि वो ऐसा कैसे कह सकता था.बाबूजी तो हमे प्रथम श्रेणी और बाद में वातानुकूलित रेलगाड़ियों में सफर कराते थे जो कि हवाई जहाज के सफर से कम प्रतीत नहीं होता था.हाँ,ये बात तो तय थी कि इधर कुछ सालों से हम कहीं दूर सफर पर गये नहीं.

बचपन में रेल के सफर की दूसरी स्थिति मैंने तब महसूस किया जब मैं विवाह के पश्चात गुड़गांव बसने आई थी.किराए का मकान था.मकान मालिक के दो बच्चे थे, क्रमश: तीसरे और आठवीं कक्षा के छात्र.एक शाम दोनो बच्चे मेरे पास रोमांचित मुद्रा में आये.उनकी खुशी का ठिकाना न' था.कहने लगे कि वह जीवन में पहली बार रेलगाड़ी भी देखी और सफर भी किया.उनका रोमांच ठीक उसी प्रकार का था जैसा कि मैंने बचपन में अपने पहली रेल यात्रा में महसूस किया था.परन्तु मेरे मन में प्रश्न उठा कि भला ऐसे कैसे हो सकता कि अबतक इन बच्चों ने रेल नहीं देखी थी...फिर त्वरित मन में ख़याल आया कि ये लोग हम जैसे खानाबदोश थोड़े ही हैं कि नौकरी कहीं,घर कहीं, मां-बाप कहीं और ससुराल कहीं...इनका तो सारा ठौर-ठिकाना ही कुछ किलोमीटर की दूरी पर है...तो इन्हें रेलवे स्टेशन तक भी जाने की जरूरत क्यों?

तीसरी स्थिति बचपन के रेलगाड़ी का अनुभव तब हुआ जब बेटा शायद चार साल का रहा होगा.उससे पहले वह अपने टीवी पर टाइनी टीवी देखने का बड़ा शौकीन था.उसके किरदार उसे पूरी तरह से भा गए थे,बल्कि खान-पान,सोने उठने,बोलने के तरीके भी उसके पूर्णतया प्रभावित हो चुके थे.उस चैनल पर एक ट्रेन की भी कहानी चलती थी जिसके किरदार रेल ही थे जो आपस में बात करते थे.एक ट्रेन का नाम तो मुझे याद आ रहा है 'रिचर्ड्स' और, तीन और रेल गाड़ी थे.बेटा वह देख कर बड़ा खुश होता था. उसकी समझदारी आने के बाद जब हम अपने गाँव जाने दिल्ली के रेलवे स्टेशन पहुंचे,एक साथ इतनी रेलगाड़ियां वो भी इतनी बड़ी-बड़ी देख वो समझ ही नहीं पाया.और फिर टीवी पर तो गाड़ियां इतनी छोटी-छोटी दिखती...तो फिर ये क्या..! मैं समझ गई, फिर उससे कहा कि ये उनके पापा-मम्मी हैं इसलिये बड़े दिखते हैं और इसके रहने के लिए स्टेशन भी तो बड़ा चाहिये ना! वो तब मान गया.जब गाड़ी के अंदर आया और गाड़ी चलने लगी तो उसके ख़ुशी का ठिकाना ना था...किराए के मकान में,और किरायेदार होकर रहना और छोटी सी गाड़ी में इधर-उधर घूमना....ये सब उसकी कल्पना में भी कहां आने वाले थे.इतनी बड़ी गाड़ी में और इतने लोगों के संग सफर, उसने सोचना बन्द कर दिया,बस खुशियां और खुशियाँ,रोमांच और रोमांच की दुनिया उसमें सिमट कर आ गई थी.

मैंने ये तीन बचपन के उदारण पहली रेल यात्रा वृतांत की इसलिये दी कि मुझे लगता है यदि मैं तीनों की तुलना करूँ, जिसमें परिवेश बच्चों के पलने की बेशक थोड़ी अलग हो परन्तु आनंद और रोमांच रेलगाड़ी और इसके सफर की लगभग हरकिसी में एकही रही.रेलगाड़ी की यात्रा करना यानी कि समाज,संस्कृति को एक साथ जीना,अनेकों मनोभाव/दशा को जीना यानी अपने देश की विवधताओं के गुलदस्ते में,वीथिकाओं में खुद को खो देना और उन पलों में समा जाना जो हमेशा अनेक किस्सों,हकीकत को बयां करती हो और जीवन में कुछ खुशगवार पल बन आपको खुशियां देती रहे.यूँही नहीं रेलगाड़ी,साहित्य सिनेमा, और समाज के लिये प्रिय विषय रही.हर उम्र ने रेलगाड़ी की यात्रा का आनन्द अलग-अलग नज़रिए से लिया, परन्तु बचपन में की गई रेगाड़ी की यात्रा बस ऐसी ही रही, जिसका आनन्द ठीक दादी नानी के मुंह से कही लोक कथाओं और गीतों का आंनद ताउम्र केलिय...
अपर्णा झा

Tuesday, 28 August 2018

हमर स्मृति के गाम

की गाम आब ओ गाम रहल!
हम्मर गामक कल्पना में बाबा सब आदर के पात्र छलाह जे भोर साँझ अप्पन देश राग गाबथि छलाह,रामायण बाँचैत छलाह,बाबा धर्मग्रंथक सिद्धहस्त आ मैंयासब संस्कृति संरक्षिका, ओ लाल कक्का आ छोटका कक्का आ भैया सब हीरो छलाह जे गामक हर मुसीबत में एक जुट भ' स्थिति के सुतारि लैत छलाह.काकी,भौजी सब तेहेन बुझनुख जे किनको दलान पर पाहुन एलान आ घरे-घर से खान पाक सचार पाहुन के आगाँ लागि जाइत छल. साँझक भगवती डीह कत्ताको खिस्सा कहैत छल. कनिया-मनिया सबहक मिलन स्थान छल. नवतुरिया सबके भजन गान के संग क्रांति गीतक सेहो एतहि से आरम्भ होय.
अहि बात से मनाही नै कि प्रगति के बयार गाम में नहि चलल,मुदा अही के आड़ में विकृति समाज में ओहि से बेसी आयल अछि.
हम पहुलका गाम के मोन में बसेने छी,मुदा आब जहिया-कहियो गाम जेबाक मौका भेटैत अछि त' अंत परिणाम यहा बुझाइत अछि जे छोट कि पैघ कोठली शहर में,भूखल छी कि सुतल कम से कम शांति त' अछि.यदि हम नहि चाही हर-हर, खट-खट केनाय ता कियो उकसेबो त' नै करत...
अप्पन स्मृति में जे गाम बसल अछि ताहि लेल अपनाके भाग्यशाली बुझैत छि जे कम से कम ओहो दिन देखने छी.बीचक उदासीनता वला स्थिति बड्ड भयावह बुझाइत छल मुदा आब अप्पन देस,भाषा,संस्कृति आ इतिहास के पुनर्जागृत करबाक वर्तमान कालक प्रयास सराहनीय अछि.ख़ुशी के बात ई अछि जे आब ई जागरुकता अभियान नीक-नीक शिक्षित लोक सब अप्पन हाथ में उठा लेलैथ,जाहि में living legends के अप्पन आदर्श मानि बाहरी दुनिया के प्रगति से मिथिलांचल के जोड़बाक प्रयत्न भ' रहल अछि.हम वर्तमान मिथिला के एकटा नब आ पुरान कालक सोच के संधि काल मानैत छी जाहि से तपि के सोना कुन्दनक प्रमाण अवश्य देताह.
अपर्णा झा

*इमेज : आदरणीय गंगेश गुंजन जी के वाल स'

यादें

If l were the PM

मेरी नज़र में सेरोगैसी

मेरी नज़र में  "सेरोगेसी"
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      सुषमा स्वराज जी का  "सेरोगेसी " पर बयान अब बहस का मुद्दा हो चला है. अभी nd tv पर इसी मुद्दे पर बहस भी छिड़ी है सोचा एक नागरिक होने के नाते  अपनी भी बात कहूँ. कोख खरीदना सिर्फ रसूखदार लोगों का शौक बन गया है इससे किसी आम तबके के लोगों की जरुरत पूरी नहीं हो सकती है. मेरा अपना मत यह है कि क्या ऐसे लोगों के लिए अनाथाश्रम एक विकल्प नहीं हो सकता. जहाँ बच्चे माँ-बाप के लिए तरस रहे हैं, इनका शारीरिक और मानसिक शोषण भी होता है, कई बार गलत कार्यों में भी झोका जाता है. ऐसे बच्चों को यदि एक परिवार मिल जाए तो शायद समाज का भला तो होगा ही, भगवान के घर का इन्तजार भी नहीं होगा.
         एक तरफ जनसँख्या नियंत्रण की बात होती है और दूसरी तरफ अपने बच्चे होते हुए भी पैसे के बल पर कोख खरीदते हैं क्या यह उचित है? मेरी नज़र में ऐसे लोगों को सम्मान की दृष्टि से भी देखना मैं उचित नहीं समझती, और इस कारण जनाब सलीम खान साहब के लिए आदर बढ़ जाता है जिस तरह से उनहोंने अर्पिता को अपनाया.
  ऐसे विषयों पर बहुत ही सोच समझ कर निर्णय लेने की आवश्यकता है.@Ajha.

शरारत जो भुलाई ना गई(संस्मरण)

"मातृभाषा का असर"
(शरारत जो कभी भुलाई ना गई)

बात उन दिनों की जब मैं स्नातकोत्तर में थी.
जे एन यू क्लास करने जाती थी. मेरी बड़ी बहन का छोटा सा बेटा 'अनुज' भी हमारे साथ ही  रहता था. उसकी सारी जिम्मेदारी मेरे ही ऊपर थी. वह जिस स्कूल में पढ़ता था  वह मेरे यूनिवर्सिटी से थोड़ी और दूरी पर था और बीच मे था दिल्ली का आई आई टी संस्थान. यहां से उसके स्कूल तक जाने के लिए बस बदलनी होती थी.
            माँ का दिल्ली के बसों में  चढ़ने का तजुर्बा नहीं था. अनुज चूंकि prep-class l में पढ़ता होगा ,कई बार ऐसा भी होता था कि स्कूल की छुट्टी से घर वापसी के दौरान उसे बस में नींद आ जाती तो स्कूल बस वापिस उसे स्कूल छोड़ देता. मेरी नियमित ड्यूटी में दोपहर को मां से पब्लिक बूथ से फ़ोन कर बच्चे का हाल पूछना शामिल था. यदि वह घर पहुंचा तो ठीक, नहीं तो उसे स्कूल से लाने जाती. इसके अलावा उसके PTM में भी मुझे ही जाना होता. अनुज मुझे कभी भी सलवार कमीज में अपने स्कूल जाने नहीं देता, इसलिए मुझे जीन्स में ही जाना होता था.
    एक बार की बात है जब मैं अपने जीन्स और खादी के कुर्ते में उसके PTM में जा रही थी.जैसा कि मैंने कहा रास्ते में IIT के बस स्टॉप से बस बदल कर चढ़ी तो मेरे साथ  चार विद्यार्थी उस संस्थान से भी चढ़े, जिनमें से एक को सीट भी मिल गई. मैं भी उसी सीट के सामने खड़ी थी. बस चलने लगी और उनके बातों का सिलसिला भी. चारों अपनी मातृभाषा 'मैथिली' में बात कर रहे थे.चूंकि मैं भी मैथिल ठहरी तो उनकी बातों पर मेरे भी कान खड़े हो गए. मुझे देख वो आपस में चुटकियाँ ले रहे थे.तभी मेरे बगल में खड़े विद्यार्थी ने मैथिली में कहा_ "देखो हम लोग इस तरह बोल रहे हैं कहीं ऐसा ना हो, ये सब समझ रही हो ". तभी सीट पर बैठे विद्यार्थी ने बड़ी बहादुरी से कहा_"नहीं ऐसा हो नहीं सकता.अगर ऐसा हुआ तो मैं अपनी सीट से उठ जाऊंगा. " मुझे भी हंसी आ गई. मैंने मुस्कुराते हुए कहा _तखन तs अपने उठिए जौ ...."(तब तो आप उठ ही जाइये).
बाँकि तीनों विद्यार्थी किसी तरह हंसी रोके रहे और सीट पर जो बैठे थे वो एकदम से हतप्रभ हो उठ खड़े हुए.उन्हें हंसी भी आ रही थी और थोड़ा शरमाये हुए भी ...
बस में आसपास वाले सोच में पड़े कि आखिर यहां हो क्या रहा. तभी मैं ने उन विद्यार्थियों की चुप्पी तोड़ते हुए कहा..."आप लोगों को मज़ा आया या नहीं मुझे पता नहीं पर मुझे बहुत मजा आया .शैतानी जो आपलोगों को सूझी वो आपने की और मुझे भी जो सही लगा वो मैंने की. शायद और कोई होता तो मैं चुप रह जाती.पर ,शायद ये हमारी मातृभाषा का असर हो जो मैं अपनी अभिव्यक्ति को रोक ना सकी. आप लोगों से परिचय होना, कि आप यहां MTech के विद्यार्थी हैं बहुत अच्छा लगा और गौरवान्वित  भी हुई.अच्छा तो मैं चलूं ,मेरा स्टॉप आ चुका है."
ये वो शरारत थी जिसे मैं ना आज तक भूल पाई और शायद मुझसे कभी भुलाई ना जा सके .
Aparna Jha
स्वरचित,मौलिक रचना

शतरंज के खिलाड़ी

जीवन की सच्चाई यही है, ये खेल कभी खुद के लिये और कभी दूसरों की खैरख्वाही के लिये खेलते ही रहते हैं ता उम्र...ताउम्र यही सिलसिला चलता रहता है.बस वक्त ही इसका फैसला करता है कि चाल सही थी या गलत...प्यादे को चलना था या कि शाह की मौत...

माँ

मेरी भगवती मेरे घर टिकती ही नहीं.
विवाह पूर्व कभी भगवान के लिये समय नहीं,बस दौड़ भाग की जिंदगी.विवाह के पश्चात में बिल्कुल खाली हो गई.आहिस्ते-आहिस्ते पूजा पाठ करना अच्छा लगने लगा.सावन की सोमवारी और नवरात्र पूजा आहार से निराहार और फिर अखंड ज्योति...परन्तु घर की जिम्मेदारियां बढ़ीं और देखने में यह आया कि 365 के 360 दिन मुझे बेशक कुछ भी ना करना पड़े पर नवरात्र या पूजापाठ के दौरान कुछ ना कुछ जाचना आहि जाती.मैं अपने अधूरे कार्यों को देख चिरचिड़ि ना हो जाऊं,मन को माना लिया कि शायद मेरे इस गार्हस्थ्य जीवन औचित्य कुछ और हो, अपनी जमाई सारी बातों को धीरे-धीरे काम करती गई,भगवान को शायद यही मंजूर हो.दूसरी तरफ़ अपनी मां को देखती हूँ कि वो घंटों अपने ध्यान में मग्न है, अब उसका गार्हस्थ्य जीवन की जिम्मेदारी पूर्णता ले चुकी है.
माँ शायद इसी को कहते हों...
अपर्णा झा

लाल पत्रपेटी (संस्मरण)

नीरू जी जो कि विदेश में रहतीं हैं और भारत,अपने शहर शिमला जाने का जब भी अवसर मिलता है,वो जी जाना चाहतीं हैं उन सारे लम्हों को,उन सारे रिश्तों को,उन सारी वाकीफ़ियत को जो कि देश के ज़र्रे-ज़र्रे में वाबस्ता है.हालांकि उनके लिये देश और विदेश का अंतर बस इतना ही है कि कृष्ण के लिये जिस प्रकार से मथुरा जन्मभूमि और द्वारका कर्मभूमि  रही पर प्रेम तो उसकी भूमि से रही जो कि कहीं की हो...मौसम बेशक बदल जाएं धरा जो कि माँ कही जाती है वो अपनी प्रकृति कहाँ बदलती!यही हाल हमारी सखि का भी...
आज उनकी छवि उस लाल पत्रपेटी के सँग मुखपोथी पर देखी और कुछ अपने यादगार लम्हों को  भी उन्होंने साझा किया ...तो मुझे भी अपना बचपन याद हो चला...दादाजी का वो जोर जोर से खुशी से चिल्ला उठना कि फलाँ की माँ,तुम्हारे बेटे का विवाह तय कर दिया.लड़की को पढ़ना-लिखना भी आता है.वह पत्र लिख लेती है.
...और दादी हमारी खुश की बहू उनके लिये धार्मिक ग्रंथ पढ़ देगी, घर में कोई तो होगा जो जिसे अक्षर ज्ञान पढ़ने और लिखने दोनो में होगा.

मुझे याद आता है कि जब हमने पढना-लिखना सीखा था तो उसकी दो उपयोगिता नज़र आईं...
पढ़ने से तातपर्य यह रहा कि पत्रिकाओं को पढ़ने हेतु अब सहारा नहीं लेना होगा और दूसरा यह कि सिनेमा का नाम और हॉल का पता अखबारों से अपने से ही कर लेते.वो एक समय था जब सिनेमा देखना परिवार में किसी उत्सव से कम नहीं जान पड़ता...
लिखने की लालसा इस लिये जागृत हुई कि बाबूजी-माँ को अपने माता-पिता को चिट्ठी लिखते देखती और उनकी खुशियों को उनके मुखमंडल पर देखा जा सकता था.और कई दिनों के इन्तिज़ार के बाद जब वो अंतर्देशीय,पोस्ट कार्ड या लिफाफा  उनके नाम से जवाब में आता तो उनकी खुशी देखते बनती थी.कई घंटों के लिये पत्रों के मजमून गप्पबाज़ी का विषय बन जाते थे.
हमें भी अपने बाबा की रिश्तेदारी बहुत पसंद थी और चाहते थे कि बाबा हमारे नाम से भी चिट्ठी लिखें...बस बाबूजी से जिद्द कर बैठते कि हमें बाबा को पत्र लिखना है.हमारी लिखावट में बाबूजी हमारे स्तर की भावनात्मक बातें लिखवा देते.कुछ दिन तक पत्र लेखन ऐसा ही रहा.फिर कुछ बातों पर बाबुजी से इत्तिफ़ाक़ ना रखने पर, अपने भावों को बाबूजी की बताते और फिर बाबूजी उन्हें शब्दों का रूप दे देते और ऐसे करते -करते खुद ही पत्र लिखना आ गया.अपनी तो जो खुशी हुई सो हुई परन्तु उस खयशी चार्म बिंदु यह रहा कि बाबा को लोगों से कहते सुना कि पोती उनकी चिट्ठी भी लिखने लगी.लगाकि स्कूली कक्षा में  प्रथम स्थान पा उत्तीर्ण हुई.
अब पत्र लेखन का उत्साह तो थोड़ा बहुत कम हुआ,अब ये था कि पत्र लिखनाय है,लिफाफा या अंतर्देशीय में डालकर उसपर पता के सन बाएं किनारे पर अपना नाम लिखना फिर उसे चिपकाना और तत्पश्चात उसे पटरपेटी में गिराना था.हमारे घर के सामने वाली पटरपेटी का मुंह थोड़ा ऊंचा था तो बाबुजी के गॉड में चढ़ कर टैब पत्र को उस पेटी में गिराया करते थे.
डाकिया का उस पेटी के ताला को खोल पत्र निकालना देख,कितना आनन्दप्रद लगता था कि अब तो अमुक व्यक्ति को मेरा पत्र प्राप्त हो ही जायेगा.
आज जब इस आभासी दुनिया में हमने कडसम रखा है जहां मोबाइल, इंटरनेट की सुविधा ही संवाद का जरिया बन गई, मुझे लगता है जितने सुखतम अवधि में हमारा संवाद हो जाता है, शायद रिश्तों की बुनियाद भी उतनी ही सिकुड़ती जा रही है.एक पत्र के पीछे जीवन के कितने ही भाव समाहित रहते थे.खुशियां,सहिष्णुता,तप, जुड़ाव और शिक्षा सभी तो इससे बंधे होते थे.

मध्य युगीन भारत और स्वतंत्रतापूर्व एवं  उसके बाद भारत की स्थिति और विशेष कर महिलाओं की स्थिति काफी डियनेरी और सोचनीय थी.समाज को विकास पथ पर ले जाने हेतु स्त्री शिक्षा पर महत्व देना आवश्यक हुआ.पुरुषे वर्ग अब खेतीबाड़ी से ऊपर उठ शहरों की तरफ जाने लगे.परन्तु परिवार का  ढाँचा ग्रामीण ही रहा.ऐसे संवाद का एकमात्र माध्यम पत्र ही तो था.पत्नी या माँ को ऐसे घरेलू कार्यों के अलावा बाहर जाकर नौकरी करने वालों को हमेशा वस्तु-स्थिति से अवगत कराने की भूमिका पत्रों ने ही निभाई.मुझे लगता हैकि शिक्षित भारत और विकसित भारत की प्रगति में यदि लोग शिक्षित हुए तो इसके पहले पड़ाव में पत्र संवाद की भूमिका को कम नही आंका जा सकता...
आज भी वो पत्र लेखन,लाल पत्र पेटी, डाकिया और डाकिया का पत्र लेकर आने की समय सीमा...सभी रोमांचित कर जाती है.यह पत्र-पेटी संवाद का माध्यम ही नही बल्कि ढेरों भावनाओ से भरा पिटारा था,जिसमें बाबा-पोती के प्यार,भाई-बहन की राखी,नए वर्ष की शुभकामनाएं,बेटे-बेटी के विवाह की खुशखबरी,नौकरी और पढ़ाई में उत्तीर्ण होने की खुशखबरी और कुछ शो संतप्त संदेश भी...किसके हिस्से क्या आना है वह तो लिफाफा खुलने और पढ़ने के पश्चात ही पता चलता था...
फिर भी हम चाहे कितना भी कुछ कह लें,खुद को दिलासा दें कि प्रगति के राह पर जो कुछ आता और जाता है वह बेहतरी के लिये होता है,पर इस बात से इनकार भी नहीं कि पत्र जिसका कि चाहे हक़ीकी दुनिया से वास्ता हो,वो चाहे इतिहास की बातें हों या फसाना हो,साहित्य हो या चलचित्र में बेशक कुछ अवधि का दृश्य हो...मन को सुखकर तो लगता ही है...पत्र यानि शब्दों को जीती मेरी सखा सहेली जो युगों से कहती आ रही है तुम्हें शिक्षित होना है,तुम्हें दुनिया देखनी है और तुम्हे खुद के विश्वास को,खुद सशक्त बनाना है.चिट्ठी पत्रपेटी चाहे कितना भी रूप बदल लें लेकिन जब तक जीवन है,संसार है तब तक तुम्हारा अस्तित्व है और रहेगा, तुम्हारे अस्तित्व को कोई मिटा नहीं सकता.
अपर्णा झा.

Monday, 27 August 2018

संस्कार

कभी-कभी सोचती हूँ कि हमें विरासत में कैसे माँ और बाबूजी मिले जो पूरी तरह से एक-दूसरे के प्रति समर्पित और प्रेम में डूबे हुए होते भी एक समय के बाद अपनी मर्जी नहीं बता पाते...बल्कि ये जिम्मेदारी बेटे को दे देते हैं कि उनके बांकि के जीवन का फैसला बेटा ही करेगा...
इस अमर प्रेम को परिभाषित कोई करना भी चाहे तो कैसे करे!हमारे बच्चों को तो अपने दादा-दादी, नाना-नानी के इस रिश्ते का पता ही नहीं और फिर हमने उन्हें समझाया ही कब!हम तो उन्हें उच्च स्तरीय नौकरियों के लिये तैयार कर रहें हैं, जहाँ रिश्तों की अहमियत है ही कहाँ !
और अब जब घड़ा खुद पर फूट रहा है तो समय पर दोष आरोपित करते हैं...
वास्तविकता का ज्ञान हमें उम्र के आखिरी पड़ाव पर ही क्यों होता है???
काशकि इसके लिये भी कोई संस्थान होता जिसमे इसकी  शिक्षा दी जाती,जिसकी अनिवार्यता हर किसी के लिये होती.
अपर्णा झा

राजनगर,पधारो मिथिलांचल में

बिहार उदासीन,और उसपर से मिथिलाधाम का हाल मत पूछिए जनाब.कितनी सरकारें आईं और चलीं गईं और सरकारों की उदासीनता मिथिलांचल को 'heritage city' बना नहीं पाई.एक ऐसा इलाका जिसमें प्रकृति की प्रचुरता,साहित्य,संगीत,भाषा,संस्कृति और इतिहास का खज़ाना, गांव की हर महिला में सीता का वास (पाक शास्त्र संपन्ना जिस के लिए कभी उन्हें कोई शैक्षणिक संस्थानों का सहारा ना लेना पड़ा हो,विरासत संरक्षिका हर एक महिला)...विरासत ही काफी है ऐसी शिक्षा हेतु.
मुझे लगता है कि मिथिलांचल की गिरती स्थिति का कारण यह भी हो कि ना तो यह राजकीय राजधानी के नज़दीक है और केंद्रीय राजधानी तो कोसों कोस दूर... और इस कारण सरकारों का ध्यान दिलाने पर भी इस ओर नज़र नहीं जाती.
आज यदि राजस्थान और गुजरात की तरह इस पर भी ध्यान दिया होता तो मैं भी गर्व से बोलती,मेरा ससुराल 'राजनगर' है.'राजनगर' यानि
एक ऐसा नगर जिसमें ब्राह्मण राजाओं की पुश्त दर पुश्त ऐसी श्रृंखला बनी जो अपने समय से आगे की सोच रखते थे.जिन्होंने अपने शिक्षा संस्कृति और समाज के उत्थान हेतु विश्वस्तर के महारथियों को अपने यहाँ बाइज़्ज़त जगह दी.बुद्धिजीविता का प्रमाण पत्र भी यहीं आकर ही पूरा होता था....
काशकि सरकारों की नज़र  गंभीरतापूर्वक इस ओर भी जाए.वर्तमान में खुशी की बात इतनी है कि अब यहां के लोग खुद की सोच से उठ अपने गौरवपूर्ण इतिहास को झांकने लगे हैं,आँकने लगे हैं.देखना बस इतना है कि राजनीति इसे किस प्रकार से मदद करती है.हम भी सोचें,आप भी सोचिये और यदि जिज्ञासु हैं तो शामिल होइए 'मिथिला लिटरेचर फेस्टिवल,राजनगर,मधुबनी में जिसका मुख्य आयोजन 18-21दिसंबर '18 को आयोजित किया जाएगा.जिसमें मिथिलांचल से संबंधित हर पहलू पर विमर्श और सांस्कृतिक आयोजन भी किये जायेंगे.
तो पधारे मिथिला नगरी.
अपर्णा झा

छवि :#सविता झा खान के वाल से.

हक़ीक़तन...

उस मौत से डरना कैसा,जिसके बाद ज़िंदगी का पता ही नहीं.मेरे खयाल से दुनिया मे यदि लोगों को यह पता चल जाये कि मौत के बाद भी एक और जिंदगी होगी जिसे जीना होगा और उसका निर्धारण मौत से पहले के जीवन पर आधारित हो...लोग गलत काम करना कुछ हद तक छोड़ ही देंगे.
अपर्णा झा.

Saturday, 18 August 2018

मंडप के नीचे(संस्मरण)

"संस्मरण : मंडप के नीचे"
मेरे मंडप पर जाने का किस्सा कोई बहुत रोचक तो नहीं कि वह संस्मरण का रूप ले सके...फिर भी...संस्मरण के नाम पर बस इतना कि 23 फरवरी 2000 को रात 11.55 पर मुझे  मेरे मुंह को पूरी तरह से ढक विवाह वेदी(हमारे यहां मंडप नहीं होता,जयमाल नहीं होता.अब तो फोटोग्राफी का भूत जो कुछ ना करवाए )पर दूल्हे के बगल में बैठा दिया गया था जिसे ना मैं ना दूल्हे साहब ने ही एक दूसरे को कभी देखा और ना कभी बात की.विवाहस्थली रातभर  पंडितजी के मंत्रोच्चारण से गुंजायमान होता रहा और हम 103 बुखार में ऊंघते रहे.बीच-बीच में दूल्हे जी की मंत्रोच्चारण में कुछ आवाज़ सुनाई दी  तो मन को तस्सल्ली मिली....दूल्हा गूंगा नहीं है.उसके कुछ देर बाद मंत्रोच्चारण के बीच में अचानक सुनाई पड़ा..."वर अब वधू के पैर के अंगूठे को पकड़ इस शिला(सामने मसाला पीसने वाला पत्थर रखा हुआ था)उनके पैर को रखेंगे...खैर हो ऊपरवाले का, की चेहरे पर बनारसी साड़ी का इतना मोटा झाँपा(हमारे यहां सिंदूरदान  से पहले कन्याओं का सर ढाका नहीं जाता है) वरना लोगों को मेरी व्यंग वाली हंसी दिखाई पड़ जाती और ना जाने कितनी ही बातें आग की तरह फैल चुकी होती.अबतक तो मेरा मिज़ाज़ शांत भी हो गया था और मन ही मन सोच रही थी..."चलो भर जिंदगी दूल्हे मियां तुम कितना भी पैर पकड़वा लो श्रीगणेश तो आप से ही हुआ....और वो भी ससुराल वाले समाज के सामने... कोई बात नही इसी सोच से ही अपनी पूरी जिंदगी काट लूंगी."अंत में फेरों की बारी थी और फिर दुल्हन को तो औरतें फेरों के वक्त ऐसे सहारा देती हैं कि जैसे दुल्हन को चलना ही नहीं आता...और फिर चेहरा ढंका...मियांजी का पेट थोड़ा खाया-पिया,कद लगभग एक-सी ही बिचारे मुझे संभाल ही ना पाए और ये जो दो औरतें मुझे पकड़ी हुईं वो मुझे भगाए जा रही...बिचारे दूल्हे मियां के लिये वधू और धोती और ससुराल सब तो नया था... एक पर से भी ख्याल हटा तो जिंदगी भर की कीर कीरी...मैंने फिर सोचा कि अब फेरे जब ले ही रहे तो आधे जीवनसाथी हो ही गए तो क्यों न थोड़ी मदद की जाय.फिर भगाने वाली चाचियों को इशारा से बताया कि मैं चल नहीं पा रही...बस क्या था स्थिति संभल गई ...पर सच्चाई यही कि हम अबतक एकदूसरे को नहीं जानते थे और ना ही पहचानते थे....और ये मंडप का ऐसा क्या जादू हुआ कि आज तक हम साथ साथ हैं.
अब जब विवाहों के आडम्बर को देखती हूँ,बाज़ार और खरीदारी देखती हूं तो सोचती हूँ कि हमने तो कुछ ऐसा किया भी नहीं और नाहीं सोच सकते थे तो जीवन की गाड़ी मध्यम गति से चल ही रही है.पर आज इतनी बातों का ध्यान रखते हुए भी आये दिन अख़बार की ऐसी सुर्खियाँ....आखिर ऐसा क्यों???
अपर्णा झा

रिश्ता अछूत का

"रिश्ता अछूत का"
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(पहले के ग्रामीण परिवेश में
जातिय व्यवस्था की तारतम्यता जिसे
मैंने भी अपनी आँखों से देखा है और अनुभव किया
और अब लिख रही हूँ.)

                  साल 1980-81 का रहा होगा ,ऐसा लगता है जैसे कल ही की बात हो. तीन महीने की सर्दियो की छुट्टी में मैं परिवार संग कश्मीर से गाँव जा रही थी. रात के अँधेरे में जब गाँव पहुँची, किसी को जानती भी नहीं , तब बहुत छोटी थी मैं. उस समय में दरभंगा से अपने गाँव तक पहुँचने का एकमात्र साधन बस हुआ करता था. और यही नहीं वहाँ से अपने आँगन तक पहुचने के लिए कम से कम ढाई-तीन km पैदल चलना पड़ता था. पर बस से उतरने वाले राहगीर अनजान होते हुए भी इतना घुल-मिल चुके होते थे मानों एक काफिला बना लिया हो . लंबे रास्तों की थकावट का पता ही ना लगता. शहर बसने वाले हम जैसे लोगोँ के लिए ये बेशक अद्भुत अनुभव हो मगर उस रास्ते पर चलने वालों की तो मानों रोज की वाकफियत थी.
                मिलने-जुलने का सिलसिला रास्ते तक ही नहीं रहता बल्कि  रात के अंधियारे में भी घर पहुंचने पर भी कायम रहता. समाज के हर वर्ग के आशना हमसे मिलने आते थे. इस बार जब  जब गांव आई,रात नींद में बीती, सुबह ने अपनी रफ़्तार सूर्योदय से पहले ही पकड़ ली थी. दालान से तानपुरे पर रामधुन, आँगन से सीता-राम की सुर लहरियाँ, कहीं तुलसी चौरा को मिट्टी का लेप लगातीं बहु-बेटियां और फिर लालटेन और पीढ़ा(पाटा) को रोज की तरह साफ़ करती माएं.
तभी नाई का आना, मालिन का पूजा के लिए पान-फूल दे जाना, बहुओं के नित्य क्रिया और किचन के जरुरत के मुताबिक पानी कुँए या दूर के किसी नल से लाने के लिए पनिहारन , खेत में काम करने वाला धानुक का हाजिरी बजाना_हर कोई अपने गुजरे कल की कहानी के साथ उपस्थित होते और यहीं से शुरू हो जाता हंसी-ख़ुशी के माहौल में दैनिक कार्यों का सिलसिला. जीवन में एक अद्भुत तारतम्यता, इन सबके बीच मैं वर्णव्यवस्था को बड़ी सटीकता से पालन होते देख पा रही थी. उच्च वर्गीय व्यवस्था के अंदर आने वाले हर जाति के लोगों का  पालनहार बनना और पालनहार के प्रति विश्वासपात्र होने की जिम्मेदारी को मैं भली-भांति देख पा रही थी.
             इन सब के बीच एक व्यवस्था 'खबास' या 'संवदिया' का था .ये आमतौर पर स्त्री हुआ करती थीं और आगँन का जरुरी सन्देश दूसरो तक पहुंचाने का काम करती थीं. ऐसी महिलाएं मुझे काफी रोचक लगीं. होता यूँ था कि पर्दा प्रथा के अंतर्गत जब बहुएं घर के अन्य स्त्रियों से पर्दा करती थीं तो यही संवदिया या खबास इनके लिए एक सखा या मातृ रूप में  सुख-दुःख की सहभागी होती थी. घर के अंदर और बाहर का हाल जितना घर के सदस्यों को पता ना हो, इन्हें हर बात की जानकारी होती और इसलिए यह कहा जा सकता है की लोक लाज एवं सामाजिक दबाव बनाने में समाज में इनकी एक अहम भूमिका थी.
               आज लोग भौतिकतावाद के चपेट में खुद को जातीय संघर्षो में उलझा चुके हैँ. मैंने देखा है कि जो लोग गाँव में संयुक्त परिवार की सेवा पुश्त दर पुश्त करते आ रहे हैं वो उस परिवार का वह लोग हिस्सा होते थे और यही नहीं ,जब ऐसे लोग शहर आते थे तो हमारे घरों में ही रुकते और माँ उनके रहने ,खाने-पीने का पूरा इंतज़ाम करती थीं और प्रयास यह होता कि ये लोग घर से नाराज होकर ना जाएं. माँ जब भी गाँव जातीं तो तोहफे के तौर पर जो कुछ भी घर के सदस्यों के लिए ले जातीं ,उसमें एक हिस्सा इनका भी होता.
                       ये कैसा रिश्ता था जो ना खून का होते हुए भी जिसमें एक ऐसा जुड़ाव कि मिलन की ख़ुशी और बिछुड़ने की पीड़ा को हर कोई महसूस कर रहा होता था. क्या कहा जाय ऐसे लुप्तप्राय प्रेम के बंधन को जिसे किसी दीवार या डोर में बाँधने की जरुरत 'वक्त' ने भी महसूस नही किया था.हां एक रिश्ता अछूत का जिसे बंधनो की आवश्यकता नहीं थी.
@Ajha.04.07.16