Tuesday, 14 August 2018

कहाँ से कहाँ आ गए...

"बस यूं ही ,याद हो चला..."
मेरा बचपन कई तरह के माहौल से होकर गुज़रा.पहला, जब मैं स्कूल भी नहीं जाती थी,वो था जमशेदपुर...सामने साकची बाज़ार और दूसरी तरफ जुबली पार्क और घर के सामने वहां की लाइब्रेरी और आसपास में पारसी, बिहारी, बंगाली माहौल.पारसियों के घर प्रातः मुख्य द्वार धुलकर अल्पना से सज जाया करती. याद है कि जब ताज़िया निकलता तो माँ मेरी उस जुलूस को देख घबरा जाती.पर्व त्योहार घर में हम काफी धूम धाम से मनाते.फिर हम कश्मीर चले आये.झेलम नदी के मुहाने पर हमारा घर और उसी नदी पर बना एक मस्जिद...कानों को तो जैसे पांच वक्त के अज़ान की आदत ही पड़ गई थी,और शुक्रवार को एक आम मजलिस वहां बैठती,जहां सामूहिक नमाज और हफ्ते भर की सरगर्मियाँ मौलवी माइक पर लोगों से साझा करते.पूजा पाठ का जहां तक सवाल है वहां हर दिन मुसलमान, मस्जिद जाते,हिन्दू सुबह सुबह मंदिर और सिख अपने गुरु द्वारा और वापसी में एक झोले में नानवा(तंदूरी रोटीबनाने वाला) से लवासा और कुलचा खरीद कर घर लाते और फिर सामूहिक चाय का सुबह से ही सिलसिला शुरू हो जाता.
फिर जब '81 में पटना आई तो भी बच्ची ही थी.पड़ोसियों के घर से जब सुबह-सुबह सुंदरकांड का रिकॉर्ड बजता तो कहीं ना कहीं एक जुड़ाव सा महसूस होने लगता.मन शांत और शीतल...लगता कि भले ही पटना स्थांतरण हो गया.शायद अपने जड़ से मिलने का आनन्द जो आ रहा था.लोगों को हिंदी बिहारी तरीके से बोलते देख अपनी भी उर्दू मिश्रित हिंदी उसी तरफ मुड़ने की कोशिश करती... सारे जुमलेबाजी हमने भी सीख लिए थे और मस्तियों के क्षण में उसे वैसे ही नकल किया करते थे.बल्कि हुआ यूं भी कि गांवों से भी भलीभाती साक्षात्कार उसी दौरान हुआ था.औरतों की जब किसी बात पर लड़ाई होती तो उनके भाव-भंगिमाओं और शब्दों को भी ध्यान से देखते-सुनते और फिर उसी तरह से घर में कभी-कभी बोलना बड़ा रसप्रद लगता.फिर दिल्ली का सफर जिसने समय और सोच की चाल ही बदल दी,परन्तु आज भी मैं कह सकती हूँ कि वर्तमान को बेशक मैं जी रही हूं पर दिल के किसी कोने में अब भी अपने बचपन को मैं ने संजोए रखा है. 
"भये प्रकट कृपाला,दीनदयाला कौशलयारी हितकारी..."बाबा जब बचपन में जमशेदपुर आया करते थे तो हम तीनों बहनों को अपने आस पास बैठा कर बड़े ही सुर में रामायण की चौपाइयाँ सिखाया करते थे.उस ज़माने में रेडियो तो बाबुजी की सम्पत्ति हुआ करती थी और जब वो नहीं होते तो भैया और चाचा की.बाबा, चाचा ही मनोरंजन,संस्कार और संस्कृति के स्वरूप थे.आज तो बच्चों के लिए इंटरनेट यह संसाधन हो गया है.हम भी तो अब यही करते हैं...शहरी माहौल में कहाँ से अपने पहले वाला माहौल लाएं...तो बस यूट्यूब हम भी चला देते हैं और बचपन की यादें बच्चे संग साझा कर हम भी बच्चे बन थोड़ी देर के लिये ही सही उन मासूम पलों को जी जाते हैं....
अपर्णा झा

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