Tuesday, 14 August 2018

सीता यानी जीवन को जीना

"सीता यानी जीवन को जीना"
आज आदरणीय Sadhana Mishra जी की "आखिर क्यों" रचना पढ़ कर अभिभूत हुई और बिना टिप्पणी किये रहा नहीं गया.सीता को तो बचपन से ही हम भारतीयों को रटा दिया जाता है,(समय अब काफी बदल चुका है,वरना) पहले तो, विशेषकर महिलाओं को और कन्याओं को तो भविष्य की सीता बनने की अपने माँ-बाप के घर में ही शिक्षा मिलने लगती थी.जो भी वस्तु आया उसका भोग पहले पिता,दूसरा नम्बर बेटा फिर बेटी तब माँ. कई बार तो बेटी के बाद माँ के लिये कुछ बचता ही नहीं और वो मन ही मन शायद अपनी वेदना के आँसू अंदर ही अंदर पी जाती होगी,खुद को ये दिलासा देते हुए कि 'नारी' यानि जीवन के त्याग और समर्पण को कहते हैं.वो सोचती होगी परिवार को इसका इल्म आज ना कल तो होगा ही...पर यह कहाँ सोच पाती कि जब जिससे इस बात की आस लगाए बैठी है,तब तक तो फिर से एक नए पारिवारिक चक्र की शुरुआत हो जाती है और पिछले को सोचने की तब कहाँ किसको फुरसत!हाँ,जब तक ये सोच उस व्यक्तिविशेष में आती है तबतक वह भी बूढ़ा हो एक नए परिवार में खुद को भी इस चक्र में पाता है.
मैं जब बड़ी हुई और थोड़ी समझदारी आई तो मुझे सीता के त्याग और समर्पण से नफरत होने लगी और जाने अनजाने मार्क्स के सिद्धांतों को मानने लगी.तभी ठान लिया था कि अपने बच्चों को कोई धर्मग्रंथ की शिक्षा नहीं दूंगी.वह अपना धर्म,अपने सोच का धर्म  खुद ही बनाएगा. ब्राह्मणवादी मेरे इस घर में अस्पृश्यता जैसी भावना को मैंने आने नहीं दिया.बस जो लोगों से दूरियों वाली भावना आई वह स्वास्थ्य को लेकर...
तब की सोच और आज की सोच में नींव तो वही रहा पर सीता से मुझे अब नफरत नहीं...बल्कि आदर्श का रूप ले चली है.
'सीता' एक ऐसा विषय है,जो लेखनी  से निकला तीर-कमान है.यथार्थ है.जिसकी जितनी सोच वह सीता को उतना जीता है.सीता यानी जीवन को जीना....
आपने जीवन को कैसे जिया,
वो आपकी सोच का हिस्सा है
और वही सोच आपकी सीता है.
सीता मेरे लिये वो शक्ति है कि जब जीवन में हिलने लगती हूँ, जीवन से कांपने लगती हूँ तो,तभी लगता है कि सीता बन मुझे कोई पीछे से सहला रहा है और कह रहा है...
"चल उठ,ये तेरे जीवन का हिस्सा नहीं... तुम्हारा अस्तित्व ,तुम्हारा विश्वास ही तुम्हारा आत्मबल है...अभी तुम्हें बहुत कुछ साबित करना है.यूँही उदास होकर बैठ गई तो खुद से कैसे बात करोगी,खुद को फिर कैसे याद रखोगी,ऐसे में तुम्हारा अपने से रूठ जाना...शायद दुनिया से एक बार किनारा कर जी लो,पर खुद से किनारा कर एक पल भी जी नहीं पाओगी.चलो उठो और अपने अगले पड़ाव की तैयारी करो.
अपर्णा झा

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