Thursday, 31 August 2017

बाबुल ना ब्याहो बिदेस

"बाबुल ना ब्याहो बिदेस"

स्मिता की आँखें पिछले कई दिनों से  अखबार के हर इक पन्नो को पढ़ते रहती, समाचार चैनलों पर, खुद पर हो रहे वज्रपात
को सह रही थी.हर एक हर्फ़ जो उसके बारे में कही सुनी जा रही थी , उनकी आवाजें दीवारों से टकरा उसके मस्तिष्क पटल पर जैसे जोरों का प्रहार किए जा रही थी.आखिर उसकी गलती कहां हुई, इसे वह समझ नही पा रही थी.एक आम से परिवार में पैदा हुई और आम से परिवारों के बच्चों जैसी परवरिश और सोच भी वैसी ही. माँ-पिताजी गुरु सेवा की परंपरा से बंधे जहां भक्ति, भक्ति ना हो अंधभक्ति हो गई.कितनी प्यारी और सुंदर सी बच्ची थी स्मिता. गुरुजी ने जो परिवार और वर स्मिता के लिए बताया नतमस्तक हो परिवार ने अपनी बेटी का ब्याह वहीं रचाया.गुरुजी के बारे में जो बातें आये दिन खबरों से मिलती उसके मुताबिक वो रसूखदार,अय्यास, जिसे भगवान , पाप-पुण्य,समाज कानून किसी भी बात का डर नहीं.जिसके अनुयायी एक बार भक्ति के दलदल में फंसे तो स्वर्ग और नर्क का फैसला उसके गुरुजी का.
दस साल तक अपने विवाह को संभालते हुए एक दिन घरेलू हिंसा से त्रस्त स्मिता गुरुजी के चरणों में आ गिरी.अब गुरुजी का उसके प्रति  ऐसा क्या व्यवहार रहा कि ना  परिवार में वह स्थान पा सकी , नाहि ससुराल में. और, ऐसे मजबूरी के हालात में एक अदना सी लड़की के पास विकल्प ही क्या ??? या तो आत्म हत्या या खुद को पत्थर बना हालात से समझौता ???
शायद मौत से वह घबरा गई हो और अंधेरों में भी रौशनी की मन में आस लिए आज वह जहां तक पहुंची , समाज उन रिश्तों की इजाज़त नहीं देता. आज स्मिता खुद से सवाल कर रही थी_ क्या मुझे न्याय मिलेगा?
क्या मैं गुनाहगार हूँ ? क्या मेरी भी कोई सुनेगा? क्या कोई है जो मेरी बातों पर यहीं कर मेरे लिए आंसू बहायेगा ???
       तभी किसी TV चैनल पर कोई कुछ कह रहा था जिसकी आवाज़ स्मिता के अंतरात्मा की आवाज़ को धीमी कर गया....
"जरूरी नहीं फैसला अदालत सुनाए, एक फैसला उसका भी जो 'वक्त' के रूप में आता है. तूने जो किया और दूसरे ने जो किया उसका हिसाब यही होता है." तभी पड़ोसियों ने चीखने की आवाज़ें सुनी.... बड़ी दर्दनाक सी आवाज़ें.....अचानक से स्त्रियां जो वहां एकत्रित हो गईं थीं, उनसे मिश्रित प्रतिक्रिया भी आने लगीं. उन्ही में से किसी ने कहा....
सच ही तो चिल्ला रही है, उसका गुनाहगार कौन और उसे उसके सवालों का जवाब भी कौन देगा???
स्मिता चीख-चीख कर यही आवाज़ें लगा रही थी_ "मेरी रचना स्त्री के रूप में किसने की...
क्यों की...???
इस जन्म को मैं  पाप समझूँ या पुण्य???
Aparna Jha

चित्रण : web image

Thursday, 24 August 2017

खुशी की तलाश

हैलो मंजू ,क्लास से फ्री हो गई क्या"

हाँ,हाँ ,हैल्लो भावना अभी आधे घंटे में छुट्टी हो जायेगी. बताओ कैसे फोन करना हुआ"

"कई दिन हो गए थे तुम से मुलाक़ात नहीं हो पा रही है क्यों ना आज कैंटीन में साथ कॉफ़ी हो जाए,थोड़ी सुनेंगे ,थोड़ा सुनाएंगे:)." भावना ने मंजू से कहा.

"चलो आज मुहूर्त निकल ही आया,इसी ख़ुशी में आओ गले मिलते हैं :):):):)" भावना ने मंजू से गले मिलते कहा.

_भावना क्या बात है आज तुम्हारी हंसी की वो खनक सुनाई नहीं दे रही???

_नहीं कुछ ख़ास नहीं , बस जिंदगी गुज़र रही.

समझ में नहीं आता क्या करूँ  जितना ही खुद को समझना चाहती हूँ उतना ही उलझते जा रही.

घर -परिवार की जिम्मेदारियां,नौकरी की गंभीरता ,सामाजिकता सभी तो निभाया मैंने  ,कभी किसी से उम्मीद की दरकार नहीं . फिर भी क्यों कोई मुझसे खुश नहीं.

वहीँ अनिता को देखो,सुनीता को देखो .सभी तो अपनी जिंदगी जी रहे, अपनी मर्जी का खाते पीते,पहनते ओढ़ते , हमेशा दूसरों की देखा देखी और प्रतिस्पर्धा में ही जीवन यापन कर रहे पर कितने खुश दीखते हैं .

मंजू हंसने लगी ,"अरे बावली किसी के चेहरे पर उसकी खुशी तुमने कैसे पहचान ली.तुम शायद अपने सोच में गलत भी तो हो सकती है."

तभी प्रिंसिपल मुस्कुराते हुए वहां पहुंचे_क्या बातें हो रही हैं ! क्या मैं भी कॉफी पी सकता हूँ."कुछ ही क्षणों में परिस्थितियों को भांपते उन्होंने मुस्कुराते हुए एक शेर दागा_

"ख़्वाबों के दरमियाँ थे

अब किनारा मिल गया"

"मैं ने तो जीवन से यही सीखा  कि बेकार की बातों में समय मत गंवाओ.खुदमें खुशी तलाशो.और बाकी को धुंए में उड़ाते चलो."

रिश्ते

आशा हाँफते-हाँफते आफिस पहुँची, तभी रेखा ने रोका_ "अरे कहाँ भागी -भाग जा रही हो ,एक कप चाय हमारे साथ पी तो लो !"

"अरे नहीं रेखा अभी-अभी ऑफिस पहुंची हूँ, ज़रा बॉस के सामने हाज़िरी बजा तो लूँ."

आशा बॉस (राजेश) के कमरे में पहुँचती है_"क्या बात है ,तबियत तो ठीक है, छुट्टी कर लेतीं."

"नहीं सर,ऐसी कुछ ख़ास बात नहीं . बस आज बहू की तबियत कुछ खराब हो गई थी, उस पर से कोई महत्वपूर्ण इंटरव्यू भी आज ही उसे देना था.डॉक्टर के पास जाने से उसने मना कर दिया था, शायद समय की कमी थी.ऐसे में उस उसके हाल पर तो छोड़ नहीं देती.फिर इंटरव्यू का मामला.अपने समझ  में जितना आया उतने घरेलु नुस्खे से अपनी बहू के तबीयत को ठीक करने का प्रयास भी किया.अभी उसे साक्षात्कार केंद्र पहुंचा कर आ रही हूँ.सोचा अब ऑफिस की फाइलों को भी ज़रा निबटा लूँ.

राजेश आशा की तरफ बड़े ही आश्चर्यचकित हो कर देख रहे थे.वह सोच रहे थे की इतनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी आशा अपने (प्रौढ़ावस्था)जीवन से कितनी संतुष्ट है.उसके चेहरे पर छाई ख़ुशी और तेज़ देखते बनता था.आशा भारतीय परिधान में रहने वाली ,अपने उत्तरदायित्व के प्रति ईमानदारी रखने वाली एक विदुषी महिला थी .आज राजेश की पत्नी ने ना जाने कितनी ही जली-कटी बातें अपने बहु को सुनाई थी.

राजेश अभी अपनी चिंतन की दुनिया में खये थे ,तभी आशा ने कहा _"आज शुभा (बहु का नाम)

अपनी मां के पास होती तो ममतामयी छाँव मिलती, भला एक कामकाजी सास, माँ की तरह कहाँ प्यार कर पाएगी.

अच्छा तो मैं चलूं अपनी सीट पर,कई सारे फाइल निपटाने हैं......."


आत्मबल

लघु कथा

      

          "आत्मबल"

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-अरे ललित तुम यहाँ !

-कब आये लंदन से ?

-बस एयरपोर्ट के रास्ते सीधे तुम्हारे स्कूल ही आ   रहा हूँ.

-ऐसी भी क्या जल्दी थी ?घर जाकर थोड़ा आराम कर लेते ,तब तक मैं भी स्कूल से वापिस लौट आई रहती. इतना लंबा सफर.... थक तो गए ही होगे.

- नहीं थका हूँ ,मैं जिस कारण से यहां आया हूँ , तुमसे मिलना मेरे लिए बेहद जरुरी था. बस अब तुम आज की छुट्टी ले मेरे साथ रहो. मुझे तुम से कुछ जरुरी बातें करनी है.

-और  ये ! ये तुमने अपनी हालत क्या बना रखी है?

श्वेत साड़ी, मोटे फ्रेम का चश्मा ,क्या हो गया है तुम्हे?

-अच्छा छोड़ो ये सब. तुम्हार यहां आने का प्रयोजन तो बताओ?

-हाँ रंजना, तुम से विदा ले जब मैं उच्च शिक्षा के लिए लंदन गया ,इस वादे के संग कि व्यवस्थित होते ही तुम्हें अपने साथ विवाह कर ले जाऊंगा.

पर वहां,  तुम्हारे अधूरेपन ने मुझे जेस्सी से मिला दिया.

- जेस्सी से विवाह कर ,माँ से आशीर्वाद लेने जब यहां आया था, तुम्हें मिलाया भी तो था उससे....

-बिलकुल स्वभाव में तुम्हारी ही तरह .....

- हाँ ललित, बड़ी प्यारी सी परी है वो. कैसी है वो अब!!!

- रंजना कुछ भी ठीक नहीं. जेस्सी का तुमसे  मिलना ,प्रभावित होना और मेरी हालत कुछ भी तो उससे छिपी नहीं है. बहुत जिद्दी स्वाभाव की है जेस्सी.जिस बात का जिद्द लगा बैठती है उसे पूरा करके ही छोड़ती है. और अब वह जिद्द लगा बैठी है कि मैं तुम्हें ब्याह कर अपने पास ले आऊँ.

-रंजना क्या तुम जेस्सी के इस जिद्द को पूरा करोगी.मेरी खातिर ना सही जेस्सी के लिये तो मान जाओ.

-ललित,  बचपन से ही मैं तुम्हारे साथ पली बढ़ी,पर तुम्हारे साथ का अहसास दसवीं कक्षा में ही हुआ था.तबसे सर्वस्व मैंने तुम्ही को माना. तुम लन्दन गए,उन्ही दिनों इतिहास में मैंने अपनी पीएचडी कर डाली.मुझे प्रोफ़ेसर की नौकरी भी मिल गई थी.

-जानते हो , जब तुमने अपनी और जेस्सी की बात बताई, धक्का तो मुझे बहुत जोरों का लगा था. सर्वस्व त्याग चुकी थी मैं ,परन्तु मेरे अंदर का आत्मबल मुझे टूटने से बचा लिया.तभी मैंने प्रण ले लिया था कि स्कूल के 10वीं कक्षा की बच्चियों को ही इतिहास पढ़ाऊंगी ,तब से ये बच्चियां ही मेरी रंग-बिरंगी दुनिया हो गईं.इतिहास पढ़ाने का लक्ष्य भी तो यही सोचा था कि बच्चो में जैसे भी हो  आत्मबल पैदा कर पाऊँ ताकि बीते पल की कमजोरियों इन बच्चों पर कभी हावी ना हो.

-ललित ,अब तुम ही बताओ, अपने बनाये हुए इस दुनिया से निकल कर जीना क्या तुम से ,या अपने अस्तित्व के साथ न्याय कर पाउंगी?????

आज ललित के संग रंजना का ये रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अपनी धरा से मिलन की खातिर जैसे "झुक गया हो आसमान."

@Ajha.24.01.17

(स्वरचित,मौलिक रचना)

©अपर्णा झा

क्या आलोचना और समालोचना एक ही हैं ? आलोचना का स्वरूप कैसा होना चाहिए ?

​ क्या आलोचना और समालोचना एक ही हैं ? आलोचना का स्वरूप कैसा होना चाहिए ?

आलोचना अपने आप में नकारात्मक नहीं बल्कि कालांतर में इसका दुरुपयोग ही आलोचना के स्वरूप को नकारात्मक कर दिया है. आलोचना और समालोचना किसी व्यक्ति विशेष , तथ्य  या विषय पर समीक्षा का तरीका है. 

       आलोचना में किसी विषय में व्याप्त खामी को उजागर किया जाता है , उद्देश्य उसके गुणवत्ता को बढ़ाना होना और उसे सही तौर पर लक्ष्य तक पहुचाना होता है.

        जहां तक समालोचना की बात आती है तो यहाँ किसी विषय के गुण और दोष दोनों की चर्चा की जाती है , लक्ष्य यही कि,उस विषय पर सही निर्णय  लेने के वक्त दोनों ही तर्क (पक्ष और विपक्ष) मददगार साबित हों.

*आलोचना वही व्यक्ति सही कर सकता है जो अमुक विषय पर पूरी जानकारी रखता हो और समसामयिक स्थिति में विषय की महत्ता को समझता हो और किसी भी विचारधारा से  प्रभावित ना हो ,यानी, तटस्थ हो कर अपनी बात रख सकता हो(हालांकि ऐसा होना एक अपवाद ही होगा).

आज की परिस्थिति में आलोचक हर कोई है जबकि समय की मांग समालोचकों की है@Ajha.22.12.16

कांटा

"काँटा भी , बँटवारा भी"

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        बचपन की मासूमियत जहाँ खुद के होने का वजूद ही नहीं, फिर भी खुशगवार थी जिंदगी. कितने थप्पड़ माँ बाप से खाये ,रो लिए और फिर वही मासूम सी शैतानियां. मुझे आज भी याद है मेरा बचपन जो मैं ने कश्मीर में गुजारे थे. पड़ोस में मनहास अंकल का घर, एक ही दीवार, थोड़ी कच्ची-पक्की. कच्ची -पक्की इस लिए की उस दीवार में एक दरार आई हुई थी और ये दरार मनहास साहब की दो बेटियां और हमारे बीच संवाद का काम भी कर जाती. खेलने का समय कभी- कभी इसी माध्यम से तय हो जाता और कभी हमारी चोरी पकड़ी जाती. सामने हाजी साहब का घर जिसमें कई रिश्तेदारियां बसती थीं. उनके घर कई मुर्गे और मुर्गियां पलते. ये मुर्गियाँ हमारे ही आँगन में विचरण करती थी. चूँकि बाबूजी का आवासीय ऑफिस था  तो एक बड़ा हिस्सा ऐसा था जिसमे चेरी, अखरोट, खुबानी इत्यादि के अनेकों पेड़ बागीचे के तौर पर थे और एक बड़ा हिस्सा क्रीड़ास्थल के लिए था.

                हालांकि हम छोटे तो  थे पर बहुत कुछ शैतानियां उस ऑफिस के कार्यरत नवयुवकों से ही सीखी थी. ये जो पड़ोसियों की मुर्गियां विचरती तो कुछ ये युवक शैतानी के तौर पर दाना का प्रलोभन मुर्गीयों को दिखाते अपने आँगन में ले आते और फिर जो जान बूझ की उक्साई लड़ाई का हम लुत्फ़ उठाते उसका मज़ा ही कुछ और था.

             पड़ोस में एक सरदार का भी परिवार था, जिसमें चार भाई ही थे _ कुग्गे, पम्मे, राजू....  दो भाई तो हमसे बड़े और दो हमारे ही जैसे, कितना ख़याल करते थे हमारा, कहीं किसी से बाता-बाती हुई और ये चारों दोस्तों की तरफदारी बिलकुल 'सरदारों वाली बात' के साथ खड़े हो जाते. कैसे एक बार अनुराधा को जोर से पाँवों में काँटा चुभा था और कुग्गे-पम्मे ने पूरी तीमारदारी ही कर डाली.

              सामने हाजी साहब का घर, अक्सर त्योहारों सा माहौल. ईद-बकरीद के अलावा कभी शादी तो कभी जनमोत्स्व तो कभी कुछ. अक्सरहा दावतों का दौर चलते रहता. कितनी दफे ऐसा भी कि खाने में मेनू हमारे तौर का ना हुआ तो कच्चे अन्न ही हमें भेज दिया जाता.

             तीन तरफ से हम अपने पड़ोसियों से जुड़े और घर के सामने से होकर झेलम नदी बहती थी जहां पांच बार के नमाज़ और जुम्मे वाली नमाज़ की तो जैसे हमें आदत ही हो गई थी. सामने मुख्य स्टेडियम जहाँ हमेशा अनेकों जलसे और खेल हुआ करते.अनन्तनाग का वो इलाका हालांकि छोटा तो बहुत था पर राजनीतिक सरगर्मियाँ काफी सक्रिय थीं. हर कोई एक-दूसरे को जानता - पहचानता था. इतने छोटे भी थे तो भी कभी किसी बात का खौफ ना था, ना ही चोरी -डकैती का डर और ना ही किसी भी बात का कहर. तो फिर आज ऐसा क्या हुआ कि बात मारने मिटाने की हो गई. जिन घरों में हमने कितने प्यारे-प्यारे लम्हे गुजारे , उन घरों की हवाएं बदल गईं ऐसा कभी ख्यालों में भी नहीं आता. आज वो पाँव में काँटों की चुभन में प्यार ही याद आता है ,रिश्तों में ऐसे काँटे होंगे इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल. जहां लड़ाइयां होती थीं हाँ मुर्गियां चुराने को लेकर तब भी कोई दरो-दीवार खड़े करने की बात नहीं सोची, बीच घरों की दीवारों में दरारें थीं पर घरों में राज़ की बात हो और दीवारें भरने की नौबत आ जाए ऐसा भी नहीं, और आज ये हालात लाहॉल बिला कूवत! इतने सालों बाद भी वो स्कूल जिसमे दाखिला बच्चों का होना ही शान की बात थी , "hanfiya islamia college " जिसमें हम बहनों ने भी तालीम पाई थी, जिसका अपना एक इतिहास था ,आज उसे जल के ख़ाक होना पड़ा. इससे पीड़ादाई और इंतिहाई बात , और क्या हो सकती? परेशानियां और दुश्वारियाँ तो हर प्रदेश और कौम की होती है , इसका क्या मतलब कि खून-खराबा और  तक्सीमियत(partition) ही हल निकले. आज मेरी भावनाएँ ज्वार भाटा की  वेग में है जहाँ बचपन की यादें अब भी जीवन के विभिन्न दहलीजों को ना पार करना चाहती है और ना बूढी होना चाहती है.

बस काँटों की चुभन भी वही जो प्यारे पलों को याद करा जाए, ऐ वक्त ! बस रुक जा तूँ बस यहीं.

@Ajha.

Photo courtesy : somebody posted on my timeline.

गंगा तूँ बहती है क्यों

   आज आराध्या के शादी को हुए तीन दिन बीत  चुके थे. मिथिलांचल की संस्कृति अनुसार आज चौथे रोज उसे पूरे विधि विधान से विवाह की सम्पन्नता को अंजाम देना था.प्रातः विवाह वेदी में बैठ अपने पति और पंडित जी संग वह विवाहजनित वैदिक श्लोकों को उच्चारित कर रही थी. अब विधि विधान की सम्पूर्णता के लिए वेदी में उपयोग की गई वस्तुओं को किसी नदी अथवा पोखर में  स्नान संग सम्मान से प्रवाहित कारण था.वह समझ नहीं पा रही थी कि वह अपनी दुविधा आखिर बताये तो किसे?

             आराध्या बड़े ही शांत स्वभाव की एक पढ़ी लिखी सुलझी लड़की थी.जिन भी बातों में उसकी असहमति होती उसे तत क्षण जता भी देती थी और मना भी लेती थी. पटना में रहते हुए उसने अपना शोध कार्य पटना यूनिवेर्सिटी से किया था .इस कारण किसी ना किसी बहाने उसे नदी (गंगाजी) के दर्शन हो ही जाते.उसे यह समझ नहीं आता कि वह जो नित्य गंगा जी को प्रणाम कर रही,वह वाकई उसकी इस नदी के प्रति आराधना थी या फिर वह आदम समाज से यह कहना चाह रही कि धन्य हैं आप! क्या इस नदी को अपवित्र करने में तनिक भी दर्द या शर्म का अहसास आपको नहीँ होता.

                  आराध्या हमेशा यही सोचा करती की लोग आखिर नदी के प्रति कैसे ऐसी आस्था रख पाए रहे जिसकी एक अजब ही रूप रेखा है.एक तरफ हाथ जोड़े जल में खड़े हो अपनी स्तुति में माफ़ी भी मांग रहे की " माफ़  करना मुझे मेरे पैरों से तुम्हारा स्पर्श हो रहा".परंतु दूसरी ओर मृत आत्मा की मुक्ति के लिये नदी ही सही स्थान होता ,फिर वह इंसानी अस्थियां हों या की मृत जानवर. कल कारखानों से निकलने वाले विषैले पदार्थ हों या जैविक मल मूत्र , सबों का विसर्जन तो यहीं होता है ना.फिर कैसे लोग इसमें स्नान कर जाते.मवेशियों को नहलाते भी और इसी का पानी भी पिलाते, धोबी भी कपड़ों का बोझा  ला यंही धोता है और गंदगी से भरा झाग वाला पानी भी इसी में समाहित कर देता है.

             गंगा जानती थी कि आजतक जिस स्नान से वह बचते आ रही थी , आज आस्थाओं की जकड़न से कोई भी उसे बचा नहीं पायेगा.आज इस बात के लिए वह ना तो बाबूजी को मना पाएगी और ना ही माँ को.बेटी के मन की बात को माँ समझ पा रही थी और अपनी मजबूरियों के कारण व अपनी बेटी से नज़रें बचा इधर उधर हो लेतीं.

          आज आखिर वह समय आ गया था जब उसे आस्थाओं के नाम पर अपनी बलि देनी पड़ी थी. एक तरफ भजन और लोक गीतों के संग साजो सामान के लिए दादी नानी ने आराध्या को नदी में डुबकी लगवाया और तभी समय हो चला था म्युनिसिपेलिटी वालों का मल्ल मूत्र को नदी में छोड़ने का. आज आराध्या नहाते हुए यही सोच रही की आखिर मैं जो सोच रही वही यहां उपास्थित अन्य लोग क्यों नहीं सोच रहे ? ऐसी धर्मांधता क्यों ,जहां आस्था में सही और गलत का फर्क करने की सोच तक नहीं आ रही.

                   आज सारे दिन और ललगातार ऐसे कई दिनों तक वह यही सोचती रही कि जिस होने को वह रोज देखते आ रही थी और उसके लिए बहुत आम-सी बात हो गई थी आज वही बात  उसके अन्तस् को कोस रही और मस्तिष्क पटल पर प्रश्न बन नाच रही और उत्तर भी साथ ही साथ दिए जा रही कि हाँ , इस कृत्य के हमही हैं कसूरवार.पाप और पुण्य की सोच ने जैसे नदी, पोखर ,तालाब को पावन होने से हम ही ने रोका है.

           आज मैं खुद में ही प्राण लेती हूँ कि मुझसे जितना हो पायेगा अपनी आस्था नदियों के प्रति ,संग ही कोई भी सावजनिक स्थल हो ,अपने द्वारा गंदा नहीं होने दूंगी और साथ ही मेरी कोशिश यही रहेगी कि समाज के अन्य लोगों को भी अपने उत्तरदायित्व के प्रति जागरूक करने की कोशिश करुँगी,जिसकी शुरुआत अपने घर से करुँगी.ऐसा सोचते , सोचते ना जाने कई  दिनों के बाद आज गंगा गहरी नींद सो रही थी.@Ajha.09.12.16

प्रदूषण(जल)

आज आराध्या अपने घरके ड्राइंग रूम में बैठी  ना जाने क्यों बार बार अपने विवाह वाले अल्बम को पलटे जा रही थी .अचानक काफी तूफ़ान सा उठा और ऐसे में वह खिड़कियों को बंद करने चली गई.चूँकि उसका घर गंगा के मुहाने पर ही था ,तो नित्य वहां पर घटते घटना क्रम को वह देख पाती थी . वह हमेशा सोचती रहती कि जैसा मैं सोचती ,वैसी सोच औरों की क्यों नही."मैं नदी स्नान के लिए नहीं जाऊंगी,वह प्रदूषित है"लाख मनवाने की कोशिश बेकार गई.घर वालों के आस्था एवं धर्मांधता ने सारे तर्क को बेमायनी साबित कर दिया था.जिस बुआजी ने सबसे तीखे बाण चलाये थे ,शिक्षित होने का मज़ाक उड़ाया था,नदी में सबसे ज्यादा डुबकी लगाईं थी. उन्हीं बुआजी का घर पहुँचने के रास्ते में मूर्छा आने लगी, "कोई बचाओ ,बेचैनी हो रही है,देखो शरीर पर यह कैसे फफोले."बीच रास्ते से ही बुआजी को अस्पताल ले जाया गया.जहाँ उनकी स्थिति नाजुक बताई गई .डॉक्टरों की टीम ने घटनाक्रम को जानते ही पूरे परिवार को उनके दकियानूसी विचारों और जल प्रवाह को दूषित करने हेतु डांट लगाईं .आज जिन तथ्यों को आराध्या समझाने में असमर्थ थी एक घटनाचक्र ने सबों को सबक दे डाला था.

         

प्रायश्चित

ओझाजी कहाँ हैं आप? आइये, आज ज़रा चैन की चाय पीते हैं.पिछले कई सालों से  चाय की चुस्की का मज़ा भूल चुका हूँ."बाबूजी सेवकराम की जिद्द के आगे कुछ बोल नहीं पाए थे.धनकुबेर सेवकराम अपनी नौकरी में ना जाने कितने पैसे कमा चुके थे. बाल-बच्चे और उनकी पत्नी जब भी घर से बाहर निकलते तो लोगों की आँखें चौंधिया जातीं.सेवकराम जी खुद बहुत ही सीधे विचार के इंसान थे.बस बात इतनी थी कि अपने ख्वाहिशों को गरीबी के कारण बचपन से ही उन्होंने दमन होते देखा था और इस कारण  मन में ठान ली थी कि चाहे जो भी हो अपने परिवार की ख्वाहिशों को अपने होते कभी घुटने नहीं दूंगा.     

       रात की खबर सुनने के बाद बाबूजी इस दुविधा में ,कि, आज बात भी हो तो किस विषय पर और नज़रें भी मिलाएं तो कैसे.खैर बाबूजी चाय के निमंत्रण पर गए ,कुछ बोलते भी, तभी सेवकराम जी बाबूजी के पाँव पर झुकते बोले_"बाबूजी आज मैं बहुत बड़े बोझ के तले से मुक्त हो गया.जो कुछ सरकार कर रही है वह सही है,काश कि यह मुहीम सफल हो जाए ,हमारे बच्चे इस कुकृत्य से बच जाएँ.मुझे इस में एक छोटी सी आशा की किरण दिखी दे रही है, इस मुहीम को सफल देखने की इच्छा है और इस कारण अपने कमाये धन का ब्यौरा incometax विभाग को दे दिया ,जेल जाने के लिए मैं तैयार हूँ, सोचा भविष्य के लिए आपसे आशीर्वाद लेता चलूँ."

@Ajha.

बीता कल

नही ,बस और नहीं ,मुझे नहीं लिखना और मुझे नहीं जुड़ना किसी से भी," आज रीता अपनी बातों पर जैसे जिद्द कर बैठी थी. सीता औए गीता के लाख मनाने पर भी रीता अपनी मनमानी पर तुली थी.

रीता स्वभाव से निर्मल ,दोस्ती निभाने वाली भावुक साहित्यकार थी.अपने बातों को सटीक रूप में रखने के लिए मशहूर, फिर उसे उसका खामियाजा ही क्यों ना भुगतना पड़े. सीता एवं गीता उसे ,साहित्यकार होने के कारण मित्र मिले थे, और ना जाने किस तार से जुड़े  कि दूरियां कोई मायने नहीं रखती. ऐसे में नित्य इन तीनो के बीच साहित्य की महफ़िल चल पड़ी और देखने वाले भी हैरान- परेशान. एक दिन ऐसा भी आया जो इनकी दोस्ती एक अनजान राजनीति की शिकार हुईं.

खुशियां जो सीता और गीता के हिस्से आई पर वह उन खुशियों की अनुभूति नहीं ले पा रहे थे,सिर्फ कारण यह कि रीता के साथ ज्यादतियां हुई. अब सीता और गीता एक तरफ तो रीता के साथ रही और दूसरी तरफ साहित्यिक मार्ग से अपनी बातों को साहित्यिक पटल पर तक तब तक रखती रहीं जबतक कि लक्ष्य में उन्हें सफलता ना मिली.दूसरी तरफ प्रेम के मोह पाश जो कि पवित्र और निःस्वार्थ थे ,भला गीता कब तक अपनी जिद्द पर अडी रहती, अपने दोस्तों में फिर से मिल गई.

आज साल का अंतिम दिन ,सर्दी की धूप में अलसाये

मंद मुस्कान लिए गीता सोच रही ,दोस्ती तो कइयों से बनती हैं पर असलियत से परिचय कराने वाले दोस्त शायद कुछ के ही नसीब में होता है , आज शायद कितने प्यारे दोस्तों को मैं खो देती यदि अपनी अकड़ पर रहती.@Ajha.27.12.16

इंद्रधनुष का आठवां रंग

अरण्या"

"कर्मण्ये वाधिकारे माँ फलेषु कदाचन", आज अरण्या इस कहे का सही मायने में अर्थ समझ चुकी थी. शायद इस कारण से ही तो आज वह दुनयावी चाहतों और उम्मीदों से दूर,संतुष्ट एवं सुखमय जी पा रही थी. सात सन्तानों में सबसे छोटी होने के कारण घर -बाहर सबों में छोटी बच्ची ही बनी रही. माँ-बाबूजी से सीधे तौर पर कभी बात करने का उसका मौका ही नहीं आया. अपने बड़े भाई बहनों की बातें सुनते और उन्हीं को अनुसरण करते बड़ी हो रही थी. परन्तु परिवार और समाज में होते उठा-पटक ने ना जाने कब का उसे परिक्व बना दिया था ,परन्तु उसकी सोच को भी कोई समझ पाता,किससे बताती वह,उसने अपने लिए मन ही मन एक कल्पना की दुनिया बना ली थी और उस दुनिया में हकीकी समस्याओं को कल्पना पटल पर रख खुद ही सवाल बन जाना ,आत्म मंथम करना और खुद ही में समाधान पा मन ही मन खुश हो जाना, यही उसके जीवन का तरीका बन गया था. उसकी यह विशेषता उसे विषम से विषम परिस्थितियों में भी सकारात्मक जीना सुझा जाती थी.उसकी इस विशेषता को लोग शायद उसकी कमजोरी अथवा डर मान बैठे थे जबकि खुद में वह इसे आत्मबल मानती थी और इस कारण अरण्या कभी टूटी नही थी.इसी कल्पनाशील दुनिया में एक उसने परिवार का सपना देखा था जिसे वह हकीकी जामा पहनाना चाहती थी. उसने सोचा था कि समर्पण की भावना ही सुखी पारिवारिक जीवन का सूत्र है, पर यह क्या यहाँ तो  सूत्र ही उलटे पर गए.सारी सृजनशीलता और कल्पनाशीलता मौन पड़ गई , अरण्या ने भी जीवन से समझौता कर लिया था कि बाकि का जीवन भी वह आशाओं और उम्मीद की ख्वाहिश में ही बिता लेगी.

बच्चों की सर्दियों की छुट्टी चल रही थी.आज काफी दिनों की ठंडक के बाद धूप की तपिश में बच्चे अपने स्कूली घरकाम कर रहे थे , तभी अरण्या की नज़र इंद्रधनुष के उस अधूरे से चित्र पर पड़ी, जिसे उसका बेटा बड़ी लीनता से उसे पूरा करने में लगा था. अरण्या के मन में भी एक बिजली सी कौंधी , उसने भी एक कैनवास ले कूची से ना जाने कितने ही रंग बिखेरे और बिखेरती चली गई.आज शायद उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान हो आया था . इंद्रधनुष में तो सात ही रंग होते है पर अरण्या इन रंगों के सहारे ना जाने कितने सारे और रंग बिखेरती गई और जहां कैनवास को भी अपनी सीमा बढ़ानी पड़ी.@Ajha.05.01.17©अपर्णा झा

साहित्य: विलासिता (मनोरंजन) या तत्त्वबोध

तत्वबोधक"

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          आज जब हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में बात करतें हैं तो पाते हैं कि नित्य नई घटनाएं आये दिन घटित हो रही , जिसके लिए यहां पर विभिन्न महकमों  के लोग हैं जो खुद को इन परिस्थितियों के अनुकूल  तैयार नहीं कर पाए हैं. हर किसी की अपनी एक अलग सोच निकल कर आती है,जोकि सही भी है . इसे हम इस तरह से कह सकते हैं कि यह प्रगति के राह पर उठाया गया सही कदम है.

         विगत कुछ दिनों से मन में एक द्वन्द-सा  चल रहा है कि , आज हम साहित्यकार जो कुछ भी लिख रहे ,उसे हम किस कसौटी पर सही मानें_ भाषा के अलंकरण पर या विषय के चयन पर जो उसे क्रियाशीलता प्रदान करती है. क्यों कोई भाषा-साहित्य समय से पहले दम तोड़ जाता है?

             आज अनायास ही गोआ की गवर्नर , श्रीमती मृदुला सिन्हा जी के टाइम लाइन को पढ़ रही थी_ "हिंदी _ह्रदय की भाषा".इस लेख को पढ़ने के क्रम में जो बातें मुझे अच्छी लगीं ,वो आप सब से साझा करने की इच्छा है.

                इस आलेख में साफ़ तौर पर यह इच्छा जाहिर की गई कि साहित्य का सृजन मात्र मनोरंजन और विलासिता का माध्यम ना हो बल्कि यह ऐसा हो जिससे हममें गति,संघर्ष और बेचैनी पैदा कर दे ,जो कि समाज के हित में हो.इसमें जीवन की सच्चाई और प्रगति पथ पर चलने की प्रेरणा हो.

साहित्य समाज का सिर्फ आइना बनकर ही ना रहे बल्कि एक पथ प्रदर्शक का माध्यम भी बना रहे.

                सच ही तो है. राजतंत्र हो चाहे प्रजातंत्र साहित्य को हमने दरबारी भी होते देखा है और क्रांति के पथ पर अग्रसर करने वाला भी.समाजवाद की लहर चाहे वो रूस में हुआ या नेपोलियन की निरंकुशता,अकबर का सर्वधर्म संभव हो या संस्कारो का धरोहर ,"पञ्चतंत्र", दादी नानी के लोक किस्से हों या लोरियां ,प्रेमचंद की कथाएं हों या बापू की आत्मकथा सभी तो साहित्य है और इनके आधार पर इतिहास में कई पन्ने जुड़े हैं. और इतिहास वह जो कल की सीख है और जिन पर वर्तमान और भविष्य की नींव रखी जाती है.

                    इन सबों का निचोड़ यही कि हम जो कुछ भी लिख रहे , वह बड़े ही सोच समझ के संग लिखना है, ताकि आने वाला भविष्य हम पर गर्व कर सके.@Ajha.06.12.12