आज आराध्या के शादी को हुए तीन दिन बीत चुके थे. मिथिलांचल की संस्कृति अनुसार आज चौथे रोज उसे पूरे विधि विधान से विवाह की सम्पन्नता को अंजाम देना था.प्रातः विवाह वेदी में बैठ अपने पति और पंडित जी संग वह विवाहजनित वैदिक श्लोकों को उच्चारित कर रही थी. अब विधि विधान की सम्पूर्णता के लिए वेदी में उपयोग की गई वस्तुओं को किसी नदी अथवा पोखर में स्नान संग सम्मान से प्रवाहित कारण था.वह समझ नहीं पा रही थी कि वह अपनी दुविधा आखिर बताये तो किसे?
आराध्या बड़े ही शांत स्वभाव की एक पढ़ी लिखी सुलझी लड़की थी.जिन भी बातों में उसकी असहमति होती उसे तत क्षण जता भी देती थी और मना भी लेती थी. पटना में रहते हुए उसने अपना शोध कार्य पटना यूनिवेर्सिटी से किया था .इस कारण किसी ना किसी बहाने उसे नदी (गंगाजी) के दर्शन हो ही जाते.उसे यह समझ नहीं आता कि वह जो नित्य गंगा जी को प्रणाम कर रही,वह वाकई उसकी इस नदी के प्रति आराधना थी या फिर वह आदम समाज से यह कहना चाह रही कि धन्य हैं आप! क्या इस नदी को अपवित्र करने में तनिक भी दर्द या शर्म का अहसास आपको नहीँ होता.
आराध्या हमेशा यही सोचा करती की लोग आखिर नदी के प्रति कैसे ऐसी आस्था रख पाए रहे जिसकी एक अजब ही रूप रेखा है.एक तरफ हाथ जोड़े जल में खड़े हो अपनी स्तुति में माफ़ी भी मांग रहे की " माफ़ करना मुझे मेरे पैरों से तुम्हारा स्पर्श हो रहा".परंतु दूसरी ओर मृत आत्मा की मुक्ति के लिये नदी ही सही स्थान होता ,फिर वह इंसानी अस्थियां हों या की मृत जानवर. कल कारखानों से निकलने वाले विषैले पदार्थ हों या जैविक मल मूत्र , सबों का विसर्जन तो यहीं होता है ना.फिर कैसे लोग इसमें स्नान कर जाते.मवेशियों को नहलाते भी और इसी का पानी भी पिलाते, धोबी भी कपड़ों का बोझा ला यंही धोता है और गंदगी से भरा झाग वाला पानी भी इसी में समाहित कर देता है.
गंगा जानती थी कि आजतक जिस स्नान से वह बचते आ रही थी , आज आस्थाओं की जकड़न से कोई भी उसे बचा नहीं पायेगा.आज इस बात के लिए वह ना तो बाबूजी को मना पाएगी और ना ही माँ को.बेटी के मन की बात को माँ समझ पा रही थी और अपनी मजबूरियों के कारण व अपनी बेटी से नज़रें बचा इधर उधर हो लेतीं.
आज आखिर वह समय आ गया था जब उसे आस्थाओं के नाम पर अपनी बलि देनी पड़ी थी. एक तरफ भजन और लोक गीतों के संग साजो सामान के लिए दादी नानी ने आराध्या को नदी में डुबकी लगवाया और तभी समय हो चला था म्युनिसिपेलिटी वालों का मल्ल मूत्र को नदी में छोड़ने का. आज आराध्या नहाते हुए यही सोच रही की आखिर मैं जो सोच रही वही यहां उपास्थित अन्य लोग क्यों नहीं सोच रहे ? ऐसी धर्मांधता क्यों ,जहां आस्था में सही और गलत का फर्क करने की सोच तक नहीं आ रही.
आज सारे दिन और ललगातार ऐसे कई दिनों तक वह यही सोचती रही कि जिस होने को वह रोज देखते आ रही थी और उसके लिए बहुत आम-सी बात हो गई थी आज वही बात उसके अन्तस् को कोस रही और मस्तिष्क पटल पर प्रश्न बन नाच रही और उत्तर भी साथ ही साथ दिए जा रही कि हाँ , इस कृत्य के हमही हैं कसूरवार.पाप और पुण्य की सोच ने जैसे नदी, पोखर ,तालाब को पावन होने से हम ही ने रोका है.
आज मैं खुद में ही प्राण लेती हूँ कि मुझसे जितना हो पायेगा अपनी आस्था नदियों के प्रति ,संग ही कोई भी सावजनिक स्थल हो ,अपने द्वारा गंदा नहीं होने दूंगी और साथ ही मेरी कोशिश यही रहेगी कि समाज के अन्य लोगों को भी अपने उत्तरदायित्व के प्रति जागरूक करने की कोशिश करुँगी,जिसकी शुरुआत अपने घर से करुँगी.ऐसा सोचते , सोचते ना जाने कई दिनों के बाद आज गंगा गहरी नींद सो रही थी.@Ajha.09.12.16
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