एक थी ममता"
अंखियों के झरोखों से:यादें
अपर्णा झा
कितनी खुश थी आज वो, हंसती-खिल-खिलखिलाती, चहकती छोटी सी लड़की_ 'ममता'. हाँ, शायद यही नाम था उसका. आज उसके ख़ुशी का कारण कोई तोहफा मिलना नहीं था अपितु आज वह शादी के मंडप में बैठने वाली थी, उसका विवाह होने वाला था. अभी दिन के समय माँ की साड़ी पहन , इस आँगन से उस आँगन उछलती- फुदकती भागती ,मानो पाँव जमीन पर पड़ने को तैयार ना हो.
दुबली पतली कद काटी , गौर वर्ण और सुन्दर काया की धनी और उस पर मासूमियत बेमिसाल, ममता एक गरीब बनिया की सबसे बड़ी बेटी थी. उम्र तकरीबन 14 साल रहा होगा. इससे छोटी तीन और बहनें व एक छोटा सा भाई था. ये परिवार मेरे गाँव वाले घर के पीछे कीआँगन की दीवाल से लगे घर में रहते थे. गरीबी ऐसी कि ममता ने कभी स्कूल में पढ़ा नहीं .बस माँ के कामों में हाथ बंटाती और बच्चों को संभालती. कम उम्र में ही वह समझ चुकी थी कि चार बेटियों का विवाह उसके बाबूजी पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और इसी कारणवश उसका विवाह हो रहा है. अपने पिता के बोझ को कम करने के साथ वह इस बात से भी खुश थी की गहने, नए कपड़े पहनने और सजने संवरने का भी मौक़ा मिलेगा.
जिंदगी के हालातों और मजबूरियों से अनभिज्ञ आज ममता दुल्हन बनी थी. लोग उसे निहार रहे थे, पूछ रहे थे क्योंकि घर के जिम्मेदारियों की चाभी भी तो उसी के पास ही रहती थी.मज़ाक- मज़ाक में वह यह भी कह उठती_"अब तो मेरी जान छोड़ो, कब तक मेरे ही सहारे रहोगे आप सब". उसकी इन बातों पर माँ-बाबूजी अश्रुपूर्ण आँखों से मुस्कुरा जाते. आज आँगन में चहल-पहल,स्त्रियों के गीत-नाद और शहनाई की धुन मंडप की सजावट और भोज के सचार की तैयारी ज़ोरों से हो रही थी. इन सबके बीच विवाह गीत 'शुभे हे शुभे, भइले जनक नगरिया में शोर, जनक नगरिया से आइल हे बरयतिया,शुभे हे शुभे' की मंगल ध्वनियों ने माहौल को आंनद से सराबोर कर रखा था.
भर रात विवाह देखने के पश्चात् फिर वही बात मेरे लिए ,कि अगले गंतव्य कीओर प्रस्थान करना. दो-तीन महीने बीत चुके थे और सारी यादें धूमिल हो चुकी थीं. तभी एक दिन माँ चाय के संग बड़े भारी मन से मेरे पास बैठ गई. मैं भी थोड़ी हैरान सी थी, कुछ पूछती की वो खुद ही बोल पड़ी "ममता याद है ना तुझे?"हाँ , पर क्या हुआ?मैंने पूछा. "ममता का पति अब इस दुनिया में नहीं रहा. गौना भी नहीं हुआ था और अब उसके ससुराल वाले इस हाल में अपने पास लाने वाले भी नहीं."माँ ने बताया. मुझे याद है कि तब भी मैं मन ही मन उसके इस कच्चे उम्र में विवाह के पक्ष में नहीं थी.आज के इस संवाद ने मुझे पूरी तरह से हिला दिया था, मन आक्रोशित हो अनेकों सवालों के सैलाब में डूबने लगा था. यह सोच रही थी कि जिस पर्दा प्रथा के तहत उसने अपने पति को भी ठीक से निहारा नहीं , ससुराल ना देखा ना जाना और नाहि समझा, इतनी छोटी सी उम्र ,इतने बहिष्कार लिए वह कैसे अपना जीवन व्यतीत करेगी. ममता तो अपने पिता का बोझ कम करना चाहती थी तो यह क्या हो गया? अब कैसे हो पायेगा बाँकी तीन बहनों का विवाह?
उस घटना के ठीक तीन साल बाद मुझे अपने गाँव जाने का मौक़ा मिला तो, सबसे पहले मैंने ममता से मिलने की इच्छा व्यक्त की. जब उसे देखा तो हैरान हो गई. उसने तो वैधव्य को जीना सीख लिया था. अपने 20 के दशक में अपने उम्र से दोगुनी लग रही थी. उसके जीवन में एक ठहराव सा आ चुका था. ना कोई लालसा, ना ही उम्मीद कोई और ना ही कुछ नया करने की उमंग . मेरा मन इस अबला को देख सोचता रहा की आगे भी जिंदगी पड़ी है कैसे उसे माँ-बाप के सहारे जियेगी.
बात यह बस एक ममता की नहीं पर देश के हर प्रांतों और गाँवों की है जहाँ विवाह ही स्त्री जीवन का मुख्य पड़ाव है. समाज अपनी गलत सोच के कारण नारी को सबला ना बना ,अबला बन जीने को मजबूर करती है. गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले लोगों की सोच तो बदली पर इनकी संख्या गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले के मुकाबिले बहुत कम है.
मेरा मानना है अब समय आ चुका है जब देश के कानून और समाज की सोच में बदलाव आना चाहिए. जातिगत आरक्षण छोड़ समाज के उन तबकों को मदद पहुचनी चाहिए जिससे लिए वह असली हकदार हैँ, और इसी बदलाव से ही समाज के दोनों पहिये सुचारू रूप से चल सकेंगे.
अपर्णा झा
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