Wednesday, 23 August 2017

क्या फेसबुक पर likes का खेला होना चाहिए

"क्या फेसबुक पर likes के खेला से प्रभावित होना चाहिए???"
कविता एक ऐसी विधा है जहां लोगों के समझ की परख हो जाती है. कवि अथवा कविताओं का आकलन इस बात से नही कि भीड़ कितनी जमी या likes कितने मिले. कविताओं की सफलता इस बात से आंकी जा सकती है कि पाठक या श्रोता के समझ में आ गई , उसके दिल को छू वह गई और भावावेश में दो बातें खुद की भी वो कह गए. कविता, इंसान दो ही परिस्थितियों में करता है _पहला _आत्म अनुभूति एवम परम् सुख को पाने की इच्छा हो या फिर धन दौलत या इनाम पाने की प्रबल अभिलाषा हो.पहली स्थिति व्यक्ति को परमसुख की ओर ले जाता है और दूसरी स्थिति व्यक्ति को भौतिकता की ओर ले जाते हैं जो व्यक्ति को चाटुकारिता,प्रलोभन एवम महत्वाकांक्षा  जैसे नकारात्मक दिशा में ले जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति के सोचने का स्तर बहुत ही सीमित हो जाता है.हालांकि ऐसे लोग अल्पावधि में ही प्रसिद्धि को प्राप्त कर लेते है.
याद रखें कुंदन को अपनी शुद्धता  बताने के लिए किसी जौहरी की आवश्यकता नही होती. वैसे ही likes की दुनिया देख कभी घबराना नही चाहिए.संख्यात्मकता के छलावे में कभी-कभी  लोग अपनी गुणात्मकता को खोने लगते हैं.इस बात से भला क्यों कोई परेशान हो कि कविता को लेकर एक दुकान खुली है या समूह बना है जिसमें एक कुनबा मात्र को ही महत्व दिया जा रहा है.

*ये उद्गार किसी पोस्ट को पढ़ते हुए मेरे मन में आया. जहां लोगों के cmts दोस्ताना को तरजीह देते हुए किसी ने भी बातों को काटने की हिमाकत नही की.आधे से अधिक लोग इस पोस्ट को like कर छोड़ दिये थे बाकियों ने जवाब भी कुछ इस तरह का दिया था_"क्या लेखनी है आपकी,कमाल का लिखते हो".

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