तत्वबोधक"
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आज जब हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में बात करतें हैं तो पाते हैं कि नित्य नई घटनाएं आये दिन घटित हो रही , जिसके लिए यहां पर विभिन्न महकमों के लोग हैं जो खुद को इन परिस्थितियों के अनुकूल तैयार नहीं कर पाए हैं. हर किसी की अपनी एक अलग सोच निकल कर आती है,जोकि सही भी है . इसे हम इस तरह से कह सकते हैं कि यह प्रगति के राह पर उठाया गया सही कदम है.
विगत कुछ दिनों से मन में एक द्वन्द-सा चल रहा है कि , आज हम साहित्यकार जो कुछ भी लिख रहे ,उसे हम किस कसौटी पर सही मानें_ भाषा के अलंकरण पर या विषय के चयन पर जो उसे क्रियाशीलता प्रदान करती है. क्यों कोई भाषा-साहित्य समय से पहले दम तोड़ जाता है?
आज अनायास ही गोआ की गवर्नर , श्रीमती मृदुला सिन्हा जी के टाइम लाइन को पढ़ रही थी_ "हिंदी _ह्रदय की भाषा".इस लेख को पढ़ने के क्रम में जो बातें मुझे अच्छी लगीं ,वो आप सब से साझा करने की इच्छा है.
इस आलेख में साफ़ तौर पर यह इच्छा जाहिर की गई कि साहित्य का सृजन मात्र मनोरंजन और विलासिता का माध्यम ना हो बल्कि यह ऐसा हो जिससे हममें गति,संघर्ष और बेचैनी पैदा कर दे ,जो कि समाज के हित में हो.इसमें जीवन की सच्चाई और प्रगति पथ पर चलने की प्रेरणा हो.
साहित्य समाज का सिर्फ आइना बनकर ही ना रहे बल्कि एक पथ प्रदर्शक का माध्यम भी बना रहे.
सच ही तो है. राजतंत्र हो चाहे प्रजातंत्र साहित्य को हमने दरबारी भी होते देखा है और क्रांति के पथ पर अग्रसर करने वाला भी.समाजवाद की लहर चाहे वो रूस में हुआ या नेपोलियन की निरंकुशता,अकबर का सर्वधर्म संभव हो या संस्कारो का धरोहर ,"पञ्चतंत्र", दादी नानी के लोक किस्से हों या लोरियां ,प्रेमचंद की कथाएं हों या बापू की आत्मकथा सभी तो साहित्य है और इनके आधार पर इतिहास में कई पन्ने जुड़े हैं. और इतिहास वह जो कल की सीख है और जिन पर वर्तमान और भविष्य की नींव रखी जाती है.
इन सबों का निचोड़ यही कि हम जो कुछ भी लिख रहे , वह बड़े ही सोच समझ के संग लिखना है, ताकि आने वाला भविष्य हम पर गर्व कर सके.@Ajha.06.12.12
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