Thursday, 31 August 2017

बाबुल ना ब्याहो बिदेस

"बाबुल ना ब्याहो बिदेस"

स्मिता की आँखें पिछले कई दिनों से  अखबार के हर इक पन्नो को पढ़ते रहती, समाचार चैनलों पर, खुद पर हो रहे वज्रपात
को सह रही थी.हर एक हर्फ़ जो उसके बारे में कही सुनी जा रही थी , उनकी आवाजें दीवारों से टकरा उसके मस्तिष्क पटल पर जैसे जोरों का प्रहार किए जा रही थी.आखिर उसकी गलती कहां हुई, इसे वह समझ नही पा रही थी.एक आम से परिवार में पैदा हुई और आम से परिवारों के बच्चों जैसी परवरिश और सोच भी वैसी ही. माँ-पिताजी गुरु सेवा की परंपरा से बंधे जहां भक्ति, भक्ति ना हो अंधभक्ति हो गई.कितनी प्यारी और सुंदर सी बच्ची थी स्मिता. गुरुजी ने जो परिवार और वर स्मिता के लिए बताया नतमस्तक हो परिवार ने अपनी बेटी का ब्याह वहीं रचाया.गुरुजी के बारे में जो बातें आये दिन खबरों से मिलती उसके मुताबिक वो रसूखदार,अय्यास, जिसे भगवान , पाप-पुण्य,समाज कानून किसी भी बात का डर नहीं.जिसके अनुयायी एक बार भक्ति के दलदल में फंसे तो स्वर्ग और नर्क का फैसला उसके गुरुजी का.
दस साल तक अपने विवाह को संभालते हुए एक दिन घरेलू हिंसा से त्रस्त स्मिता गुरुजी के चरणों में आ गिरी.अब गुरुजी का उसके प्रति  ऐसा क्या व्यवहार रहा कि ना  परिवार में वह स्थान पा सकी , नाहि ससुराल में. और, ऐसे मजबूरी के हालात में एक अदना सी लड़की के पास विकल्प ही क्या ??? या तो आत्म हत्या या खुद को पत्थर बना हालात से समझौता ???
शायद मौत से वह घबरा गई हो और अंधेरों में भी रौशनी की मन में आस लिए आज वह जहां तक पहुंची , समाज उन रिश्तों की इजाज़त नहीं देता. आज स्मिता खुद से सवाल कर रही थी_ क्या मुझे न्याय मिलेगा?
क्या मैं गुनाहगार हूँ ? क्या मेरी भी कोई सुनेगा? क्या कोई है जो मेरी बातों पर यहीं कर मेरे लिए आंसू बहायेगा ???
       तभी किसी TV चैनल पर कोई कुछ कह रहा था जिसकी आवाज़ स्मिता के अंतरात्मा की आवाज़ को धीमी कर गया....
"जरूरी नहीं फैसला अदालत सुनाए, एक फैसला उसका भी जो 'वक्त' के रूप में आता है. तूने जो किया और दूसरे ने जो किया उसका हिसाब यही होता है." तभी पड़ोसियों ने चीखने की आवाज़ें सुनी.... बड़ी दर्दनाक सी आवाज़ें.....अचानक से स्त्रियां जो वहां एकत्रित हो गईं थीं, उनसे मिश्रित प्रतिक्रिया भी आने लगीं. उन्ही में से किसी ने कहा....
सच ही तो चिल्ला रही है, उसका गुनाहगार कौन और उसे उसके सवालों का जवाब भी कौन देगा???
स्मिता चीख-चीख कर यही आवाज़ें लगा रही थी_ "मेरी रचना स्त्री के रूप में किसने की...
क्यों की...???
इस जन्म को मैं  पाप समझूँ या पुण्य???
Aparna Jha

चित्रण : web image

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