Thursday, 24 August 2017

प्रायश्चित

ओझाजी कहाँ हैं आप? आइये, आज ज़रा चैन की चाय पीते हैं.पिछले कई सालों से  चाय की चुस्की का मज़ा भूल चुका हूँ."बाबूजी सेवकराम की जिद्द के आगे कुछ बोल नहीं पाए थे.धनकुबेर सेवकराम अपनी नौकरी में ना जाने कितने पैसे कमा चुके थे. बाल-बच्चे और उनकी पत्नी जब भी घर से बाहर निकलते तो लोगों की आँखें चौंधिया जातीं.सेवकराम जी खुद बहुत ही सीधे विचार के इंसान थे.बस बात इतनी थी कि अपने ख्वाहिशों को गरीबी के कारण बचपन से ही उन्होंने दमन होते देखा था और इस कारण  मन में ठान ली थी कि चाहे जो भी हो अपने परिवार की ख्वाहिशों को अपने होते कभी घुटने नहीं दूंगा.     

       रात की खबर सुनने के बाद बाबूजी इस दुविधा में ,कि, आज बात भी हो तो किस विषय पर और नज़रें भी मिलाएं तो कैसे.खैर बाबूजी चाय के निमंत्रण पर गए ,कुछ बोलते भी, तभी सेवकराम जी बाबूजी के पाँव पर झुकते बोले_"बाबूजी आज मैं बहुत बड़े बोझ के तले से मुक्त हो गया.जो कुछ सरकार कर रही है वह सही है,काश कि यह मुहीम सफल हो जाए ,हमारे बच्चे इस कुकृत्य से बच जाएँ.मुझे इस में एक छोटी सी आशा की किरण दिखी दे रही है, इस मुहीम को सफल देखने की इच्छा है और इस कारण अपने कमाये धन का ब्यौरा incometax विभाग को दे दिया ,जेल जाने के लिए मैं तैयार हूँ, सोचा भविष्य के लिए आपसे आशीर्वाद लेता चलूँ."

@Ajha.

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