Thursday, 24 August 2017

प्रदूषण(जल)

आज आराध्या अपने घरके ड्राइंग रूम में बैठी  ना जाने क्यों बार बार अपने विवाह वाले अल्बम को पलटे जा रही थी .अचानक काफी तूफ़ान सा उठा और ऐसे में वह खिड़कियों को बंद करने चली गई.चूँकि उसका घर गंगा के मुहाने पर ही था ,तो नित्य वहां पर घटते घटना क्रम को वह देख पाती थी . वह हमेशा सोचती रहती कि जैसा मैं सोचती ,वैसी सोच औरों की क्यों नही."मैं नदी स्नान के लिए नहीं जाऊंगी,वह प्रदूषित है"लाख मनवाने की कोशिश बेकार गई.घर वालों के आस्था एवं धर्मांधता ने सारे तर्क को बेमायनी साबित कर दिया था.जिस बुआजी ने सबसे तीखे बाण चलाये थे ,शिक्षित होने का मज़ाक उड़ाया था,नदी में सबसे ज्यादा डुबकी लगाईं थी. उन्हीं बुआजी का घर पहुँचने के रास्ते में मूर्छा आने लगी, "कोई बचाओ ,बेचैनी हो रही है,देखो शरीर पर यह कैसे फफोले."बीच रास्ते से ही बुआजी को अस्पताल ले जाया गया.जहाँ उनकी स्थिति नाजुक बताई गई .डॉक्टरों की टीम ने घटनाक्रम को जानते ही पूरे परिवार को उनके दकियानूसी विचारों और जल प्रवाह को दूषित करने हेतु डांट लगाईं .आज जिन तथ्यों को आराध्या समझाने में असमर्थ थी एक घटनाचक्र ने सबों को सबक दे डाला था.

         

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