Monday, 21 August 2017

कृष्ण, कहां तुम

"कृष्ण कहां हो "

"कान्हा! कहाँ हो तुम...
क्यों हर बार छुप जाते हो...देखो ना तुम्हारी नगरी कैसे सूनी- सूनी पड़ी है.…." टीवी पर प्रवचन हो रहा था और शीला(50-55 के उम्र की महिला) अपने सुबह के सारे काम निपटाने के पश्चात अपने लिए कुछ समय एक चाय के संग हाथ मे अखबार लिए बैठी हुई थी. नज़रें  खबरों को पढ़ती हुई और कान टीवी पर किसी सिद्ध पुरुष के प्रवचन को सुनते हुए,सुबह की यही तो दिन चर्या थी. शीला जज़्बाती होने के कारण खबरों को पढ़ने तक ही सीमित ना थी बल्कि जज़्बातों में  बह भी जाती थी.कई बार ऐसा भी हुआ कि अच्छी या संवेदनाविहीन खबरों को पढ़ उसके आँखों से अश्रुधार बहते हुए  परिवार वालों ने भी देखा था. अखबार में इधर कई दिनों से मन विचलित कर देने वाली खबरें अखबारों की मुख्य सुर्खियां बनी हुई थीं जिसे पढ़ते हुए  शीला काफी दुखी थी.आज जन्माष्टमी उत्सव मनाने उनकी मां और छोटी बहन लीला भी उसके घर आई हुई थी. सभी सुबह की चाय ले जन्माष्टमी पर प्रवचन देख रहे थे.
शीला_"देखो ना... कहते हैं देश तरक्की कर रहा है,सभी खुशहाल हो रहे हैं,अब औरत और मर्द कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं.राजनीति का रुख भी बदल रहा है..."
" फिर ये रेप,स्वार्थ सिद्धि के लिए खून, बच्चों संग दुर्व्यवहार एवम दुष्कर्म....ये सब क्यों हो रहा???पूरा अखबार ही इन्ही खबरों से धरा पड़ा है...
....और दुनिया भर के धर्म गुरु...नित्य नए-नए पूजा पद्धति को बताते हैं....तो फिर...
पाप ही पाप का इतना पसार क्यों???"
शीला की माँ_  "ये कलियुग ही तो है,आज सारी सुख-समृद्धि के होते हुए भी किसी घर में कोई खुशी नज़र नहीं आती. पूजा-पाठ का बाज़ार तो गर्म हो गया है पर भगवान कहीं नजर नही आते....शायद कलियुग की कहानी भी यही.... कि सर पर मां-बाप का साया तो है पर आशीर्वाद नहीं, मंदिरों में बेशकीमती मूर्ति,पूजा अर्चना तो है पर भगवान नहीं...."
शीला की बहन_ चलो आज इस जन्माष्टमी अपने खोए हुए कान्हा को ढूंढने की कोशिश करें.... हे कान्हा ! कहां हो तुम....एक बार फिर से गीता का ज्ञान करा जाओ...
Aparna Jha

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