"जिंदगी का ताना बाना एक दिवा स्वस्प्न नहीं, पकी पकाई खिचड़ी नहीं, बल्कि 'जिजीविषा ' है जिसमें जीवन के संघर्षों का मुकाबला करना होता है, उसमें खुद को झोंकता पड़ता है तब जा के जीवन के इन ताने बानों से कपड़ा बनता है और ऐसे ही में एक नया इंसान, एक साहित्यकार या कलाकार का जन्म होता है "
Aparna Jha
No comments:
Post a Comment