Wednesday, 28 March 2018

विद्यार्थी या शरारती

"विद्यार्थी या शरारती"
(अंधेरे के अवगुंठन शीर्षक पर
391)

आद्या और काम्या शाम की चाय पीने के लिये अपने छात्रावास से बाहर निकले ही थे कि... आद्या_"अरे पुलिस अंकल! यहां कैसे ?आज यूनिफॉर्म में भी नहीं...लगता है आराम का एक दिन आप को मिल ही गया.वैसे आप अचानक यहाँ...!सब ठीक तो है?"
"बेटा चाय-शाय भी पिलाओगी या खड़े-खड़े सब पूछ लोगी. क्या कोई ढाबा है नज़दीक में?"
"बात-बात में हम पूछना ही भूल गए.आइये-आइये,वैसे भी हमलोग चाय पीने ही निकले
थे.बैठिये अंकल.वैसे बात क्या है?"
"क्या तुम राजन,अमन, चंदन को जानती हो?"
"जी अंकल,बड़े ही होनहार विद्यार्थी हैं ये और उतना ही इनका व्यवहार भी दोस्ताना...वैसे आप इन्हें कैसे जानते हैं?"
"बड़े ही शातिर दिमाग हैं ये सब.रात के अंधेरों में विदेशी खुफिया के लिए खबर पहुंचाने का काम करते हैं.ड्रग माफियाओं के साथ इनकी सांठ गांठ है.इतना ही नहीं ये अपने इस काम में पैसे कमाने का झांसा दे अन्य विद्यर्थियों को भी इस राह पर लाने का काम कर रहे हैं."
"तब तो ये देशद्रोही हुए"
"बिल्कुल सही कहा आद्या तुमने."
माथे पर हाथ रखते हुए काम्या_हे भगवान !विद्यार्थी के रूप में शरारती!किसकी नज़र लग गई?
अपर्णा झा

मूर्तितोड़

(398 'शीर्षक अनुभूति
का ताप')

"मूर्ति तोड़ "
आज रविवार का दिन और सभी दोस्तों को एकत्रित कर श्यामनन्द अपने घर पर अवकाश की मस्ती ले रहे थे। हंसी और शोरगुल के मध्य अपने कमरे से बाहर आते हुए शायमानन्द के बेटे ने बताया _" पापा लेनिन के बाद आज फिर से एक मूर्ति टूटी है ... आंबेडकर की...."
" ये सब हो क्या करहा है... अबतक राजनीति पर धर्मान्धता का आरोप लग रहा था ...और अब ये 'वाद' ने भी विकृत रूप ले लिया.. " श्यामनन्द ने कहा।
तभी किसी दोस्त ने तंज़ कस्ते हुए कहा _ "मार्केटिंग का ज़माना है ,राजनीति भला इससे अछूती कैसे रह सकती है... "
"ये भी कोई मार्केटिंग हुआ और यदि सच में यह रूप तो बहुत ही घिनौना है। कितनी ओछी राजनीति है। आखिर चुनावों में आपने  कौन सा चेहरा जनता के समक्ष लेकर जाएंगे। ये लोग जनता कि नब्ज़ जानते हैं और ये भी जानते हैं आम जनता बहुत भावुक होती हैं. '
"अरे किन बातों में हम समय बर्बाद कर रहे हैं.... "
तभी किसी दोस्त ने कहा.... " अरे हमारे  पूर्वज कोई बेवकूफ थोड़े ही ना थे जो अपने इतिहास,व्यवस्था और ज्ञान की बातों को लिखित में ना  रख बल्कि इन सारी  बातों का दृश्य एयर श्रव्य के माध्यम से अपने भविष्य को याद कराते रहे. वो जानते थे की समाज में कुछ ऐसे भी लोग होंगे जो लिखित नियमावली का गलत
उपयोग कर सकते हैं....हे मानव मस्तिष्क आप महान है...आज से आपकी एक उपाधि और_ 'मूर्ति तोड़ '. "
अपर्णा झा

किस्सा सृजन

"किस्सा सृजन"

चलो आज एक खयाली फिल्म शूट करते हैं....मैं ने सीता से कहा.
"कहाँ चलना होगा!!!!"
"लाल किले...."
" तो फिर आज बस में लदा जाय ....कुछ कहानी तो सोचनी  होगी ना... और दिल्ली के बस से अच्छी जगह हो ही नहीं सकती.😊😊
"कितनी ही तो कहानियां कल ही मैंने जी ली थी मुनिरका से कनॉट प्लेस के रास्ते में"☺☺☺_मैंने कहा.
एक खुंसट से अंकल ....
वो मोटी वाली आंटी ... कैसे भीड़ में दब कर
चिल्लाने लगी थी !!!😢
और हाँ वो साहब जो बात-बात में बेवजह ही लड़
पड़ते ☺
कैसे मैंने चुटकी ली थी_ "क्या बात है भाई साहब!
बड़े गुस्से में हो ,कहीं सुबह-सुबह भाभी जी से लड़ाई तो नहीं हो गई"☺😊☺☺
"कैसे तड़ेडा था मुझ उन्होंने??? ....और फिर शान्ति से बैठ गए थे वो साहब."
मेरी सीट कंडक्टर के साथ थी. तो हर आने जाने वाले चेहरों के भाव पढने में मुझे मजा आ रहा था, कि तभी एक प्यारी सी अनजानी सी सुनी सुनाई आवाज़..... "कंडक्टर साहब हमको हौज़ ख़ास जाना है ....बताइयेगाsss कहाँ उतरें हम?
"यही उत्तर जा रे मेरे भाई, और हाँ , आग्गे की मुह करके उतरियो".
मेरी तरफ मुंह करके कंडक्टर साहब हँसते हुए बोले _ बिहारी साला....पहली बार आया है...😊
बस से उतारते मैंने भी उस कंडक्टर की वाट लगा दी थी....भई देख मैं भी बिहारी ही ठहरी 😊😊😊😊चेहरा बिलकुल देखने वाला हो गया था उसका".
" अब जरा बताओ सीते !दिल्ली के बसों से अच्छी कोई जगह कहानी सृजन के लिए हो सकती है भला???" मैंने कहा
"बिलकुल नहीं ..... चलो आज फिर इक कहानी ढूंढ लाते हैं ,लाल किला की सैर दिल्ली के बस से कराते है.".....
@Ajha.05.02.17
©अपर्णा झा.

बदगुमानी

" बदगुमानी"

"अरे तुम कब आईं  और ये छोटा बच्चा कितना प्यारा है...अभिव्यक्ति ने आकृत की तरफ देखते हुए जिज्ञासावश पूछा था. आज अभिव्यक्ति और  आकृति शायद 24-25 साल के बाद मिले थे."नहीं-नहीं ....ना पोता ना ही नाती मेरा...बल्कि यह मेरे माली का बेटा है...." आकृति ने बच्चे की ओर  मुस्कुराते हुए कहा था  "....और अब यह मेरे साथ ही रहता है मेरे बेटे की मानिंद"'
            अभिव्यक्ति बड़ी हैरानी से आकृति की बातें सुन रही थी साथ ही उसके चेहरे के भावों को भी पढ़ना चाह रही थी. विवाह के पश्चात आकृति के व्यक्तित्व में बदलाव को देख कर ही अभिव्यक्ति अपने बचपन की सखी से दूरी बनाने लगी थी.उसे याद आ रहा था ,कैसे बचपन में दोनों अमीरी-गरीबी की बातों का खेल खेल जाते. कैसे दोनों अठखेलियाँ करती रहती थी.  स्कूल से आते-जाते बड़ी इमारतों  को देख मस्ती में ही 'ये तेरा घर ये मेरा घर,या फिर सामने से हवा से बातें करती हुई मोटर गाड़ियों का बँटवारा भी तभी हो जाता, यहीं से  सपनो का घर बनना शुरू हो जाता  और मंज़िल के पहुंचने तक इमारत पूरी भी हो जाती.बचपन उन्होंने ऐसे ही गुज़ारे थे. अभिव्यक्ति इन बातों के दौरान कभी यह समझ नहीं पाई कि जिन मस्तियों को वह खेल समझती थी , वह आकृति के मन की दबी हुई चाहत थी. शायद निम्न मध्यमवर्ग में पले बड़े होने के कारण ऐसा हो.
      आज इतने सालों के बाद मिलने पर अभिव्यक्ति  भूली बिसरी सब याद कर रही थी. "और बताओ, कैसे कट रही है जिंदगी!!! ऐसा कह अभिव्यक्ति ,आकृति के मन की बातों को जानना चाहती थी. जानकारी तो उसे सब बातों की थी किन्तु वह आकृति के शब्दों में सुनना चाहती थी. अमीरों में ब्याही, पति के बड़े पद पर आसीन होने से जैसे आकृति की सोच को ही बदल दी थी.गरीबी क्या ,मध्यम वर्गीय लोगों से भी वह बात करने में कतरातीं. ऐसा लगता था कि कहीं इन लोगों की उसे नज़र ना लग जाय .वहीं आकृति के पति (सुरेश)का स्वभाव ठीक उसके विपरीत था. सुरेश को अपनी बीते हुए कठिन दिनों की याद हमेशा साथ रहती और इस कारण पैसों की अमीरी उसे कभी भी पथभ्रमित नहीं कर पाई. सुरेश को हर किसी  के साथ उठना बैठना बहुत भाता था .आकृति को अपने पति की ये बातें खलती थी, या तो वह सुरेश के पिछले जीवन से अंजान थी या फिर पैसों से उसके सोच पर धूल की परत जम गई थी.बच्चे भी ठीक अपनी मां पर ही गए थे. पढ़ाई - लिखाई पूरी कर उसके बच्चे जब बाहरी देशों में स्थापित हो गए तो माँ-बाप के लिए इनके पास समय नहीं रहा,अपनी मस्तियों में झूमते इनमें भावुकता जैसी बात भी समाप्त हो चुकी थी. एक समय ऐसा भी आया कि आकृति के पति गंभीर बीमारी के हालत में , उन्हें अस्पताल तक उठा कर ले जाने वाला कोई भी नहीं, खून की जरुरत है  तो सगे- सम्बन्धी भी नदारद . वो कहते हैं ना कि समय की मार अच्छे-अच्छो को सबक सिखा जाता है .ऐसे में एक कमजोर और गरीब सा दिखने वाला माली जिसे आकृति ने कभी ठीक से देखा ना होगा, आज वह अपने मालिक को अस्पताल ले जाने से लेकर खून दान करना और  बेटे की तरह वहीं उनके पास बैठ , कई दिनों तक उनकी सेवा करता रहा.  इन विषम परिस्थितियों में माली का छोटा सा बेटा मालकिन का पूरी रह से ध्यान रख रहा था,इतना ही
नहीं, मालकिन जब तक गहरी नींद सो न जाती वह बच्चा उसके सर को सहलाते ही रहता.
         अपने जिन बच्चों और सगे-सम्बन्धियों संग आजतक खुशियां मनाती रही, उन्होंने ही ऐसे मौके पर अचानक से आकृति को अकेला कर छोड़ा था.अब उसे अपने बदगुमानी अहसास हो गया था .आज जब उस बच्चे संग इतने वर्षों बाद आकृति अपने मायके आई और अभिव्यक्ति के समक्ष इन घटनाओं का जिक्र कर रही थी तो उसे खुद में,अपने बदगुमानी का प्रायश्चित करने जैसा प्रतीत हो रहा था.
@Ajha.09.01.17
(स्वरचित,मौलिक रचना)
©अपर्णा झा.

Tuesday, 27 March 2018

आत्मबल

"आत्मबल"

-अरे ललित तुम यहाँ !
-कब आये लंदन से ....
-बस एयरपोर्ट के रास्ते सीधे तुम्हारे स्कूल ही आ   रहा हूँ.
-ऐसी भी क्या जल्दी थी ?घर जाकर थोड़ा आराम कर लेते ,तब तक मैं भी स्कूल से वापिस लौट आई रहती. इतना लंबा सफर.... थक तो गए ही होगे.
- नहीं थका हूँ ,मैं जिस कारण से यहां आया हूँ , तुमसे मिलना मेरे लिए बेहद जरुरी था. बस अब तुम आज की छुट्टी ले मेरे साथ रहो. मुझे तुम से कुछ जरुरी बातें करनी है.
-और  ये ! ये तुमने अपनी हालत क्या बना रखी है?
श्वेत साड़ी, मोटे फ्रेम का चश्मा ,क्या हो गया है तुम्हे?
-अच्छा छोड़ो ये सब. तुम्हार यहां आने का प्रयोजन तो बताओ?
-हाँ रंजना, तुम से विदा ले जब मैं उच्च शिक्षा के लिए लंदन गया ,इस वादे के संग कि व्यवस्थित होते ही तुम्हें अपने साथ विवाह कर ले जाऊंगा.
पर वहां,  तुम्हारे अधूरेपन ने मुझे जेस्सी से मिला दिया.
- जेस्सी से विवाह कर ,माँ से आशीर्वाद लेने जब यहां आया था, तुम्हें मिलाया भी तो था उससे....
-बिलकुल स्वभाव में तुम्हारी ही तरह .....
- हाँ ललित, बड़ी प्यारी सी परी है वो. कैसी है वो अब!!!
- रंजना कुछ भी ठीक नहीं. जेस्सी का तुमसे  मिलना ,प्रभावित होना और मेरी हालत कुछ भी तो उससे छिपी नहीं है. बहुत जिद्दी स्वाभाव की है जेस्सी.जिस बात का जिद्द लगा बैठती है उसे पूरा करके ही छोड़ती है. और अब वह जिद्द लगा बैठी है कि मैं तुम्हें ब्याह कर अपने पास ले आऊँ.
-रंजना क्या तुम जेस्सी के इस जिद्द को पूरा करोगी.मेरी खातिर ना सही जेस्सी के लिये तो मान जाओ.
-ललित,  बचपन से ही मैं तुम्हारे साथ पली बढ़ी,पर तुम्हारे साथ का अहसास दसवीं कक्षा में ही हुआ था.तबसे सर्वस्व मैंने तुम्ही को माना. तुम लन्दन गए,उन्ही दिनों इतिहास में मैंने अपनी पीएचडी कर डाली.मुझे प्रोफ़ेसर की नौकरी भी मिल गई थी.
-जानते हो , जब तुमने अपनी और जेस्सी की बात बताई, धक्का तो मुझे बहुत जोरों का लगा था. सर्वस्व त्याग चुकी थी मैं ,परन्तु मेरे अंदर का आत्मबल मुझे टूटने से बचा लिया.तभी मैंने प्रण ले लिया था कि स्कूल के 10वीं कक्षा की बच्चियों को ही इतिहास पढ़ाऊंगी ,तब से ये बच्चियां ही मेरी रंग-बिरंगी दुनिया हो गईं.इतिहास पढ़ाने का लक्ष्य भी तो यही सोचा था कि बच्चो में जैसे भी हो  आत्मबल पैदा कर पाऊँ ताकि बीते पल की कमजोरियों इन बच्चों पर कभी हावी ना हो.
-ललित ,अब तुम ही बताओ, अपने बनाये हुए इस दुनिया से निकल कर जीना क्या तुम से ,या अपने अस्तित्व के साथ न्याय कर पाउंगी?????
@Ajha.24.01.17
(स्वरचित,मौलिक रचना)
©अपर्णा झा.

खत लिख दे सांवरिया के नाम..

"खत लिख दे सांवरिया के नाम......"

               आज पूरी रात सोई तो रही पर प्रातः जब नींद खुली तो भगवान् का ध्यान करने की जगह यह गाना गुनगुनाते पाया _ खत लिख दे...
शायद सच भी तो यही था कि मैं हमेशा आप से जिद्द करते रहती कि झूठ ही सही, मुझे आप पत्र लिखें ताकि मैं भी उन लम्हों को सोचूँ कि कैसे कोई पति अपने पत्नी को पत्र में क्या -क्या लिखते हैं☺, पर मेरी इन बातों को सुन आप मुस्कुरा जाते और टाल जाते.परन्तु सच्चाई तो यही कि आपके भी मन के कोने में  मेरी ही तरह ख़याल आते होंगे और आस भी रही होगी ,लेकिन आपको कभी जाहिर करना नहीं आया.चलो आज जब आप मेरे पास नहीं तो मैं आपकेे इस चाह को पूरा कर देती हूँ.
              बचपन में भाई -बहनों के संग रह यह पता ही नहीं लग़ा 'लगाव ' या 'जुड़ाव' सही अर्थों में होता क्या है . हमेशा ही हमने पूरा परिवार तबतक जीवन संग ही बिताया था जबतक एक दिन ऐसा आया कि बाबूजी का दिल्ली तबादला हो गया. हम भाई-बहनें पढ़ाई के उस मोड़ पर थे जहां बाबूजी का हमसे अलग रहना तय हो गया.बाबूजी घर के मुखिया थे और माँ सलज्ज भारतीय स्त्री ,जिन्होंने हमारे समक्ष अपनी भावनाओं से खुद को कमजोर प्रतीत होने नहीं दिया.
               बाबूजी की अनुपस्थिति खलती थी,तब भी भावनाओं को परिभाषित नहीं कर पाई. बाबूजी 4-6 महीने पर आया करते  और जब सामने होते तो मैं समझ नहीं पाती कि क्यों दो तीन दिन लग जाते मुझे अपने अश्रु धारा के प्रवाह को उनके समक्ष रोक पाने में.और तब भी मैं इस बात को समझ नहीं पाई कि आखिर मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा जबकि बाकि सभी सदस्य भावावेग से प्रभावित नहीं होते. माँ को कभी हमने आज के परिप्रेक्ष्य में पति-पत्नी के रिश्ते में देखा नहीं. कभी यह भी सोच नहीं पाई कि उनकी भी ऐसी कोई निजी जिंदगी  हो सकतीहै. बाबूजी और बच्चों के वार्तालाप ,रोज की घटित सभी सदस्यों की बातें माँ के सामने पूरा जाहिर कर देना और उस पर माँ का वकीलों वाली प्रतिक्रिया.हालांकि प्रतिक्रियाएं जरुरी नहीं थी की हमें पसंद आये ही.😊 फिर भी पता नहीं हममें से कोई भी अपनी बात घर से छुपा नहीं पाते,हर किसीकी कमी-बेसी सबों को पता  थी.शायद माँ बाबूजी ने हमारे जीने का तरीका यही तय किया था.
                आज जब इतने सालों बाद फिर से उसी मुकाम पर खड़ी हूँ  जहाँ आज एक पत्नी हूँ, माँ हूँ और अनेकों सामाजिक दायित्वों से बंधी हूँ. सात समंदर पार की बातें बचपन में बहुत आकर्षित करतीं थीं और काश..... को सोचती रहती.शायद आपकी सोच भी मुझ से मेल खाती हो, फिर ऐसा क्या हुआ तय तारीख के करीब आने से आप भी  अनजान बातों से घिरे थे और जाने के दिन शायद थोड़े बुझे-बुझे भी लग रहे थे.और इन सब के बीच मैं खुद को माहौल में संतुलन बनाये रखने की कोशिश कर रही थी. आज जब आप मेरे साथ नहीं और यह भी जानती हूँ की यह दूरी चंद  दिनों की है .इन सब के बीच मुझे 'लगाव', 'जुड़ाव'और  माँ के उन  मौन अहसासों को भी समझ पा रही हूँ. आपके उस श्यामवर्णी चेहरे की रंगत को भी पढ़ सकती हूँ और यह भी कि आज आपका सात समंदर पार मुझ से दूर रहना क्यों नहीं भा रहा.परन्तु यह भी जानती हूँ की आप मुझ से ही जुड़ हुए नहीं ,बल्कि अपने माँ-बाबूजी के सपनों के किरदार भी और कुछ सामाजिक व्यवस्थाएं जिन से हो कर गुज़रना पड़ता है.
          और इन सब के बीच संतान , जो हमारे जीवन की धुरी होती है और चेहरे की मुस्कराहट भी .ऐसी परिस्थितयो में मेरा अपने बच्चे के साथ रहना मेरे लिए आप में एक सुरक्षा का आभास दे जाती है . बच्चों की बातें आपको बता -बता मैं आपके चेहरे की मुस्कराहट पढ़ने की कोशिश करते रहती हूँ. और इन सब के बीच हैरान होते रहती हूँ कि प्रकृति का यह कैसा नियम और समाज का यह कैसा ताना-बाना कि परिस्थितियां चाहे जैसे भी हो चिर निरंतर चलते रहती है , शाश्वत है.
               चलो अब मेरे लिये सुबह के रोजगार का समय हो चुका है और अब आप भी अपने अस्थाई घोंसले का रुख कर चुके होंगे , सोने की तैयारियां भी हो रही होगी .शुभ रात्रि ,भगवान आपके साथ और हमारी दुआएं भी.@Ajha

शाम्भवी

"चाह"

         " शाम्भवी कहाँ हो तुम ? इतनी ठण्ड में एक कप चाय तो बनता है"_ दो दिन से बीमार की अवस्था में बिस्तर पर पड़े -पड़े शिवम तंग आ चुके थे और फिर आज क्रिसमस का दिन , भला कौन अपने आप को रोक सकता था.
" ये लो चाय, और भी कुछ चाहिए तो बता दो , घर के सारे काम निपटाने हैं"_ शाम्भवी ने कहा.
"चाय तो अच्छी बनी है,चलो इसी ख़ुशी में आज तुम्हें बाहर कहीं घुमा लाता हूँ , वैसे भी आज क्रिसमस का माहौल है,अच्छा लगेगा..."शिवम् ने कहा.
       शाम्भवी ने शिवम् की बात मान तैयार होने चली गई.
शिवम् ने भी गाडी निकाली और फिर दोनों इस कड़ाके की ठण्ड में भी घूमने निकल पड़े.गाडी में दोनों शांत बैठे गुलाम अली की ग़ज़ल का लुत्फ़ ले रहे. तभी एक स्कूटर पर पति-पत्नी और गोद में छोटा सा बच्चा, माँ से चिपका हुआ. तभी शाम्भवी चुप्पी तोड़ते हुए_
"देखो इतनी ठण्ड में भी......."
"क्यों क्या तुमने ये दिन नहीं देखे ??? तुम ने भी तो इस तरह से........" शिवम ने शाम्भवी की और देखते हुए कहा.
हाँ ,सच ही तो कहा था शिवम ने. वो कड़ाके की ठण्ड हो या फिर तीखी धूप, नश्तर चलाती हुई, बारिश का मौसम कभी बादल -बिजली  की गर्जना डरा जाता तो कभी मूसलाधार बारिश में भीगते हुए ही शिवम् को अपने नौकरी के सिलसिले में दूर -दूर की भाग-दौड़ में ही तो देखा था शाम्भवी ने. पर उन दोनों ने कभी किसी बात की एक दूसरे से शिकायत नहीं की.
शाम्भवी _"याद है ऑफिस से वापिस लौटते हुए कैसे पहले तुम पार्क में मुझे ढूंढते, मेरी सहेलियों का तुम्हें देख लेना ,फिर मुझे छेड़ना और उनका मुस्कुराना तुम्हारे चेहरे को सुर्ख कर जातीं. वहां से फिर तुम मुझे किसी रेस्तरों में ले जाते. ऐसा करना ,तुम्हारा हमेशा की दिनचर्या ही हो चली थी. और सच पूछो तो तुम्हारा ऐसा करना मुझे भी भाता था. सर्दियों और बारिश के मौसम में समोसा और गुलाब जामुन ,गर्मियों में स्पंज रसगुल्ला लगभग तय सा ही था."
शिवम शांत मुद्रा में गाड़ी चलाते हुए शाम्भवी की बातें चुप चाप सुन रहा था . तभी फिर से शाम्भवी_
"आज हम यहाँ तक पहुंचे हैं , भगवान् का दिया सबकुछ है पर वो ख़ुशी ......! आज हर बात में तुलनात्मकता का आभास हो आया .ख़ुशी हो या दुःख उसके भी पैमाने तय हो गए हैं _छोटी और बड़ी में"
शिवम ने थोड़ी हामी तो भरी परन्तु चुपचाप ही रहा.
शाम्भवी_ शायद .....शायद तब की ख़ुशी में हमारे और तुम्हारे सिवा और कुछ भी ना था.शायद हमने एक दूसरे को पाने को ही जन्नत की ख़ुशी मानी थी.हमारी दुनिया हमारे-तुम्हारे वजूद से थी. वहां भविष्य की चिंताएं , प्रतिस्पर्धा की मार इत्यादि जैसे शब्दों की छुअन मात्र भी ना थी. हम अपनी दुनिया के शहंशाह भी,हुक्मरान भी. और आज ये .........
क्या आप भी ऐसा ही सोचते थे/हैं जैसा कि मैं...."
शाम्भवी ने उत्सुकतावश पूछा.
शिवम ने शाम्भवी के चेहरे को देखा तो जरूर पर वह फिर भी चुपचाप गाडी चलाते हुए..........
©@Ajha.30.12.16

ट्रेनक ओ यात्रा(मैथिली में)

"ट्रेनक ओ यात्रा..."
(मैथिली में)

"गार्गी सखि अहाँ एत्तs! एत्तेक समानक संग, बुझाईया कत्तहु दूरक यात्रा पर छलहुँ."
"अरे कामख्या सखि अहाँ! की हाल,हम ता घबराए गेलहुँ.अहूँ ता बुझाइया कत्तहु जाय लेल छी."
"हँs सखि,कनि पटना कॉलेजक किछु काज से जा रहल छी. आ देखियो ने एत्तs आबि के ज्ञात भेल जे ट्रेन दू घंटा लेट से चलि रहल अछि.कोहुना समय ता काटय पड़तै."
"अहाँ उदास कीया भेलहुँ,ईश्वर चाहलैथ तैं एत्तेक दिन बाद एत्तs भेट भेल.चलू अपना सब कनि मोनक गप्प करी. समय ता तुरत कटि जायत."
"ठीके कहलहुँ सखि हमरो अहि में ईश्वरे के किछु प्रयोजन बुझा रहल अछि.चलू ओहि बेंच पर बैसी."दुनू सखि हँसैत-बाजैथ ओ बेंच पर जा बैसली.
कामख्या कनि हंसी करैत कहलीह_गप्प ता आरो हेतै मुदा हमरा ई बताओ जे ट्रेन से उतरै के पश्चातो अहाँ ओहि ट्रेन के आ बादो तक ओहि पटरी के अनन्त तक निहारि रहल छलिये... की कोनो खास बात."
"नहि सखि कोनो बात नहि".धकचुकैते गार्गी कहली.
"नहि सखि हमरा ता ओ वला बात बुझाइत अछि_'बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी..."
"नहि मानब अहाँ बिन बुझने... अहाँ ठीके बुझलहुँ. हम अप्पन कल्पना में डूबल छलहुँ.गत सांझ ,राति आ भोर चंद्रेशक बजलाहा सब गप्प मस्तिष्क पटल पर ओहिना नाचि रहल.हम्मर दुनू के कात दिसन के उप्पर आ निच्चा वाला सीट छल. ओ दिल्ली के कोनो कॉलेजक विद्यार्थी छल.नहि जानि जेठ बहिनक एहेन कोन गुण हमरा में देखल जे दीदी-दीदी कही मायक हाथक रोटी सा लs बहिनक विवाह आ कालेज प्रकरण सब सुनेने गेल. ना चाय ना भोजन के कोनो तकलीफ होम s देलक.राति सूतs लेल ता गेल मुदा फेर आपस हमरा सीट पर बैसी जगा देलक..."दीदी घर जा के सूति रहब".अप्पन फोन नम्बर पकड़ाबैत कहलक_"दीदी बिसैर ता नै जायब हमरा?"आय भोरे जखन हमर स्टेशन आयल ता सबटा समान अपने हाथे उतारि नम आँखि से गोर लागलक आ चुपचाप वापस ट्रेन में चढ़ि गेल. तखन सs हम चंद्रेशक  छवि के ट्रेनक पटरी के अनन्त में ताकि रहल छी कि भरिसक कोनो छवि बनि उभरि आबय..."
"सखि की आकस्मिक बनल एहेन संबंध के कोनो भविष्य होइतो अछि वा नहि...?"अचानक वातावरण में शांति पसरि गेल. तखने पाछु से कोनो ट्रेनक सीटी के आवाज भेल.ओ ट्रेन अप्पन गंतव्य लेल प्रस्थान कs रहल छल.सामने वला सीट पर बैसल व्यक्ति अप्पन मोबाइल पर गीत सुनी रहल छल जकर पाँति  हल्का-हल्का  सखि सब के सेहो सुनाई दs रहल छल_"नेहक डोरी कोना बंधतै... गाम तोहर बड़ दूर बटोही.."
अपर्णा झा

*(हिंदी में लिखल हमर एकटा लघुकथा के मैथिली में अनुवाद.मैथिली में कनि कमजोर छी, भाषा आ शब्दक एकटा मर्म होइत अछि, तकर शायद कमी बुझायत ताहि लेल माफी माँगैत छी आ सुधारक उम्मीद करैत छी)

ट्रेन का वो सफर

ट्रेन का वो सफर
('अपेक्षित पृष्ठ' के अंतर्गत)

"अरे गार्गी कहां से आ रही हो! और अब तो वो ट्रेन भी आंखों से ओझल हो चुकी है ,तो फिर किसे निहार रही हो?"
"अरे हाँ कामाख्या! कैसी हो?यहाँ...कहीं जाना है क्या?"
"हाँ गार्गी, मुझे पटना जाना है कॉलेज से कुछ सर्टिफिकेट की कॉपी निकलवानी है.बस ट्रैन के इन्तिज़ार में हूँ जो कि 2 घंटे लेट से चल रही है."
"चलो कामख्या तो आज 2 घंटे दोनों सखियाँ कुछ बतिया लें."
"अच्छा पहले ये तो बताओ गार्गी....किसके खयालों में पटरियों को दूर तक निहारे जा रही थी...."
"अरे नहीं रे...बस यूं ही..."
"नहीं-नहीं,यूँ ही वाली तो बात नहीं लगती.…ये तो  लगता है जैसे "बात निकलेगी दूर तलक जाएगी..." वाली बात जान पड़ती है कामख्या!"
"तुम ऐसे ही नहीं मानोगी, चलो बता ही देती हूं.मैं जब ट्रेन से उतर रही थी तो बीते शाम से लेकर रात और सुबह तक चंद्रेश से हुई बातें याद आने लगी.मेरे से हालांकि उम्र में छोटा था,कालेज का विद्यार्थी ठहरा  और दीदी कहकर ही पुकार रहा था.अपने माँ के हाथों की रोटी,तो बहन की शादी के किस्से और अपनी जीविका को चलाने हेतु विद्यार्थी होकर भी कैसे संघर्षरत रहना...शाम की चाय उसने मुझे ला कर दी, रात में भी खाने और सोने की व्यवस्था करता ऊपर अपनी बर्थ पर सोने चला गया."
"कामख्या उसे मुझमें दीदी के ऐसे कौन से गुण दिखाई दिए कि जैसे ही वह सोने गया था वापस फिर से मेरी बर्थ पर आ बैठा."दीदी क्या सच में आप सो गईं.... छोड़िए ना....सुबह तो फिर आप चली ही जायेगा.पहले तो मेरा फोन नम्बर लें...आप मुझे फोन तो करेंगी ना...."
"कामख्या आज जब स्टेशन पर मेरे सामान को उतारते उसने नम आंखों से पांव छुए और फिर अपने गंतव्य के लिए वापिस ट्रेन से मुझे देखता रहा...वह जो तुम मुझे दूर तक पटरियों को निहारते देख रही थी ना... मैं उस अनन्त में उसकी छवि तलाशने लगी थी कि शायद फिर से उभर आये...."
"कामाख्या  ऐसे रिश्ते भविष्य में कभी जुड़ भी पाते हैं क्या???" अचानक से दोनों के बीच एक चुप्पी सी....तभी फिर से स्टेशन से किसी ट्रेन के छूटने की सीटी सुनाई दी.पास की सीट पर बैठे मुसाफिर के मोबाइल से हल्की-हल्की गीत की आवाज़ सुनाई देने लगी_"चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था...."
अपर्णा झा