Wednesday, 28 March 2018

बदगुमानी

" बदगुमानी"

"अरे तुम कब आईं  और ये छोटा बच्चा कितना प्यारा है...अभिव्यक्ति ने आकृत की तरफ देखते हुए जिज्ञासावश पूछा था. आज अभिव्यक्ति और  आकृति शायद 24-25 साल के बाद मिले थे."नहीं-नहीं ....ना पोता ना ही नाती मेरा...बल्कि यह मेरे माली का बेटा है...." आकृति ने बच्चे की ओर  मुस्कुराते हुए कहा था  "....और अब यह मेरे साथ ही रहता है मेरे बेटे की मानिंद"'
            अभिव्यक्ति बड़ी हैरानी से आकृति की बातें सुन रही थी साथ ही उसके चेहरे के भावों को भी पढ़ना चाह रही थी. विवाह के पश्चात आकृति के व्यक्तित्व में बदलाव को देख कर ही अभिव्यक्ति अपने बचपन की सखी से दूरी बनाने लगी थी.उसे याद आ रहा था ,कैसे बचपन में दोनों अमीरी-गरीबी की बातों का खेल खेल जाते. कैसे दोनों अठखेलियाँ करती रहती थी.  स्कूल से आते-जाते बड़ी इमारतों  को देख मस्ती में ही 'ये तेरा घर ये मेरा घर,या फिर सामने से हवा से बातें करती हुई मोटर गाड़ियों का बँटवारा भी तभी हो जाता, यहीं से  सपनो का घर बनना शुरू हो जाता  और मंज़िल के पहुंचने तक इमारत पूरी भी हो जाती.बचपन उन्होंने ऐसे ही गुज़ारे थे. अभिव्यक्ति इन बातों के दौरान कभी यह समझ नहीं पाई कि जिन मस्तियों को वह खेल समझती थी , वह आकृति के मन की दबी हुई चाहत थी. शायद निम्न मध्यमवर्ग में पले बड़े होने के कारण ऐसा हो.
      आज इतने सालों के बाद मिलने पर अभिव्यक्ति  भूली बिसरी सब याद कर रही थी. "और बताओ, कैसे कट रही है जिंदगी!!! ऐसा कह अभिव्यक्ति ,आकृति के मन की बातों को जानना चाहती थी. जानकारी तो उसे सब बातों की थी किन्तु वह आकृति के शब्दों में सुनना चाहती थी. अमीरों में ब्याही, पति के बड़े पद पर आसीन होने से जैसे आकृति की सोच को ही बदल दी थी.गरीबी क्या ,मध्यम वर्गीय लोगों से भी वह बात करने में कतरातीं. ऐसा लगता था कि कहीं इन लोगों की उसे नज़र ना लग जाय .वहीं आकृति के पति (सुरेश)का स्वभाव ठीक उसके विपरीत था. सुरेश को अपनी बीते हुए कठिन दिनों की याद हमेशा साथ रहती और इस कारण पैसों की अमीरी उसे कभी भी पथभ्रमित नहीं कर पाई. सुरेश को हर किसी  के साथ उठना बैठना बहुत भाता था .आकृति को अपने पति की ये बातें खलती थी, या तो वह सुरेश के पिछले जीवन से अंजान थी या फिर पैसों से उसके सोच पर धूल की परत जम गई थी.बच्चे भी ठीक अपनी मां पर ही गए थे. पढ़ाई - लिखाई पूरी कर उसके बच्चे जब बाहरी देशों में स्थापित हो गए तो माँ-बाप के लिए इनके पास समय नहीं रहा,अपनी मस्तियों में झूमते इनमें भावुकता जैसी बात भी समाप्त हो चुकी थी. एक समय ऐसा भी आया कि आकृति के पति गंभीर बीमारी के हालत में , उन्हें अस्पताल तक उठा कर ले जाने वाला कोई भी नहीं, खून की जरुरत है  तो सगे- सम्बन्धी भी नदारद . वो कहते हैं ना कि समय की मार अच्छे-अच्छो को सबक सिखा जाता है .ऐसे में एक कमजोर और गरीब सा दिखने वाला माली जिसे आकृति ने कभी ठीक से देखा ना होगा, आज वह अपने मालिक को अस्पताल ले जाने से लेकर खून दान करना और  बेटे की तरह वहीं उनके पास बैठ , कई दिनों तक उनकी सेवा करता रहा.  इन विषम परिस्थितियों में माली का छोटा सा बेटा मालकिन का पूरी रह से ध्यान रख रहा था,इतना ही
नहीं, मालकिन जब तक गहरी नींद सो न जाती वह बच्चा उसके सर को सहलाते ही रहता.
         अपने जिन बच्चों और सगे-सम्बन्धियों संग आजतक खुशियां मनाती रही, उन्होंने ही ऐसे मौके पर अचानक से आकृति को अकेला कर छोड़ा था.अब उसे अपने बदगुमानी अहसास हो गया था .आज जब उस बच्चे संग इतने वर्षों बाद आकृति अपने मायके आई और अभिव्यक्ति के समक्ष इन घटनाओं का जिक्र कर रही थी तो उसे खुद में,अपने बदगुमानी का प्रायश्चित करने जैसा प्रतीत हो रहा था.
@Ajha.09.01.17
(स्वरचित,मौलिक रचना)
©अपर्णा झा.

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