Friday, 29 December 2017

अनन्त

"अनन्त???"
(विषय चित्र पर आधारित)

कितने सालों बाद आज रवि परदेस से घर लौटा था. आज सुबह जब वह नींद से जागा तो वही सूर्य की किरणें, मंदिर की घंटी, आरती,चिड़ियों की चहचहाहट सब स्पष्ट सुनाई दे रही थी... और कर्ण प्रिय भी प्रतीत हो रहीं थीं...
मां का कहना सवेरे-सवेरे कि "बेटा सुबह हो गई चाय पी लो..." मानो कानों में  चाशनी से सराबोर वो शब्द...
आजकल रवि अपने किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले  को ले अपने शहर अपने माँ-बाबूजी के घर कुछ दिन के लिये आया हुआ था.परदेस में उसे इतनी फुर्सत कहाँ कि मां-बाबूजी से इधर-उधर की बातें सुनता...हर बार फ़ोन पर वार्तालाप इसी बात पर आकर रुकती..."अच्छा तो सब ठीक-ठाक ना..मैं फिर बात करता हूँ..."
माँ-बाबूजी अक्सर आपस में बातें करते ....हमने कमी में रहकर भी बच्चों को पढ़ाया-लिखाया कि शायद साहब बन  कम से कम वो सुख-चैन की जिंदगी जिएंगे...पर ये क्या??? ये कौन सा मोह-जाल है जिसमें हमारे बच्चे फंसते जा रहे...जिसकी शुरुआत तो है पर अंत का पता नहीं."
रवि अपने इन दिनों को कुछ इस तरह से बिताया मानों सदियों बाद उसने बचपन जिया हो.उसे अपने इस जुड़ाव से अलग होने का जी नही कर रहा था..."बाबूजी ! चलिये ना हमारे साथ ...सब एक साथ रहेंगे..."
बेटा तुम्हें तुम्हारी खुशियां मुबारक हो...आप और आगे बढ़ो...ऊंचाइयों को छुओ..
पर एक बात बताते जाना ... घर-परिवार, समाज और फिर खुद की भी जरा सोचो...तो उसके लिए तुम्हारे पास समय नहीं...ये कैसा और कौन सा संघर्ष है जिसे तुम जिये जा रहे हो !!! इन ऊंचाइयों का कोई तो लक्ष्य होगा?"
"भविष्य निर्माण की बात बचपन से सुनता आया...पर...बाबूजी...आज...बस यही तो पता नही..."
Aparna Jha

कैद या आज़ादी

"कैद या आजादी"
विषय चित्र पर आधारित

"पता नहीं तुम्हें क्या होता जा रहा है....
ना अपनी सुध ,ना ही कोई दुनियादारी की...
मान जाओ तुम्हें मोबाइल ने खुद में कैद कर लिया है...नशेड़ियों की तरह हमेशा अपने मोबाइल में डूबी रहती हो..." पति ने पत्नी से कहा.
पत्नी_"अच्छा !तो अब ये तुम कह रहे हो...
विवाह होकर आई थी ...हज़ारों ख्वाहिशों के संग...तुम्हारे रोज़गार और छुटियों में अंतर्जाल में व्यस्त होना ...अपनी भावनाओं का मैंने कितना दमन किया था.लोगों में मिलना-जुलना तुम्हें पसंद ना था ,खुद से बाज़ार तक गई तो मैं खर्चीली हो जाती...अपने बच्चों और घर में मेरा ध्यान नहीं जाता...
अब तो मैं घर पर ही रहती हूं...ना अब मैं  खर्चीले भी नही ... तो फिर अब क्यों परेशान होते हो!कभी तुमने सोचा कि एक पढ़ी-लिखी महिला कैसे खुद को इस चाहर दीवारी में कैद कर तुम्हारे सारे सपनों को जीती थी जिसकी तुम्हें कभी परवाह ही नहीं रही.अब इस एनरोइड मोबाइल ने मेरे सृजन को फिर से जगाया है...घर बैठे मैं अपनी क्षमता को जगा पा रही हूं. हाँ, मुझे सकारात्मक जीवन  जीने का तरीका आ गया है...अब मुझे अपनी खुशियों के लिए सहारे की जरूरी नहीं...क्योंकि मैं पढ़ना लिखना जानती हूं...दुनिया को अपने और दुनिया के नज़रिए से देखना जानती हूं.
मुझे कैदी तो तुमने बना दिया था ...पर इसने तो अर्थपूर्ण जीना सीखा दिया है.आज मैं एक साहित्यकार हूँ.
पता है... आज 20 साल बाद मेरे एक मित्र मिले...हैरान थे ...कहा "कमाल की बात है !स्त्रियाँ जिस उम्र में अस्तित्व की खोज में ना जाने कहाँ-कहाँ भटकने लगतीं हैं ...इतना सब कुछ होते हुए भी...तुम अपने जीवन के इस पड़ाव में भी इतनी सृजनशील और व्यस्त हो !!!"
Aparna Jha
स्वरचित,मौलिक रचना.

अनमोल पिंजड़ा

"बेटी प्रिया ....
यह पिंजड़ा तुम्हें कहां मिला!मैंने तो इसे छुपा कर रखा था..."
"मां, उस तह खाने वाले कमरे में, उस पुरानी सी चौकी के पीछे..."
"मां, मैं भी एक पंछी पिजड़े में पालना चाहती हूं...उसे दाना दूँगी और इंसानो की बोली सिखाऊंगी...कितना अच्छा लगेगा ना ... जब वह हम जैसी बोली बोलेगी...
अरे बेटा ! अरे बेटा, ना रे ना...
यह उस पक्षी के लिए कैद होगा ...चाहे उसे कितना ही सुख देना चाहो... अपने परिवेश से कटकर रहना ही तो कैद है बेटा...
तभी मां बेटी के संवाद मध्य नानाजी चाय की फरमाइश करते हुए..."अरे ये पिंजरा !!! अभी तक.… "
"हाँ बाबूजी ...यह पिंजड़ा अभी तक मैंने सम्भाल रखा है मुझे याद है आपकी कही वो  बातें..."
...."मुझे भी याद है बेटा..."
" जब, तुम अपनी पढ़ाई के अंतिम पड़ाव पर थीं  और भविष्य की ओर कदम बढ़ा रही थी , तब,मैंने तुझे यह छोटे से खिलौने वाला पिंजड़ा दिया था(हालांकि सुंदर था और उसमें प्यारे से तोते की मूरत भी थी)... कहा था तुझसे .... अब तुम्हे अपने जीवन का चुनाव खुद ही करना होगा... लक्ष्य तुम्हारे  सामने है."
अपर्णा झा

Monday, 16 October 2017

जवाब किसके पास....

बचपन से ही सीता और द्रौपदी को ले हमेशा मन में सवाल उठते रहते थे पर डरती थी कि कहीं  धर्म से जुड़ी बातें हैं कहीं तूफ़ां बरपा ना कर दे. परन्तु आज की बुद्धिजीवी स्त्री वर्ग संग कुछ बुद्धिजीवी पुरुष वर्ग भी इस चर्चा में भाग ले रहे हैं , बहुत खुशी हो रही है. हमारी महिलाएं इस विषय पर अपना पक्ष रख पा रहीं हैं ,अत्यंत हर्ष की बात. सच्चाई सब जानते हैं कि राम को राम बनाया सीता ने और धर्मराज युधिष्ठिर की भी कहानी यही ,वरना एक ने स्त्री को जंगल दिखाया और दूसरे ने जुए के दांव लगा दी. इतिहास गवाह है कि स्त्री के चारित्रिक सुदृढ़ता के बल पर तब  सीता ,द्रौपदी  आबाद किया और समय-समय पर ना जाने आजतक कितनी ही महिलाओं ने समाज निर्माण में योगदान किया है.
परन्तु सवाल तब भी यही था और अब भी यही कि स्त्री के पिछड़ापन के जिम्मेदार कौन ????
समाज या परिवार, या दोनों ही?
@Ajha.24.04.17.

Wednesday, 4 October 2017

दुर्गति नाशिनी : अजीब सी परिस्थिति !!!"

" दुर्गति नाशिनी :
अजीब सी परिस्थिति !!!"

हर बार की तरह इस बार भी रवीश के माँ-बाबूजी ने साल भर दशहरा पूजा के आने का इंतिज़ार किया ....
वो इस इंतिज़ार में थे कि शायद इस बार त्योहारों की छुट्टी में बेटा अपने परिवार संग उनसे मिलने आएगा....बेटे ने भी यही दिलासा दी थी उन्हें... पिछले साल ना आने पर...
क्या पता था वो छुट्टियां तो उसके अपने पाले हुए कुत्ते के लिए और परिवार के घूमने के लिए होती है...
पिता का इंतिज़ार...
और फिर रहा ना गया...
हेलो बेटा ... कहां हो! माँ तुम्हारे लिए खाना बना कर तुम्हारी राह देख रही है....
बाबूजी...घर में सभी तीन चार दिन के लिए बाहर गए हैं....आपलोग खा लीजिये....
मेरा आना जरा मुश्किल है...
मेरी तबियत ज़रा खराब हो गई है..
क्या हुआ बेटा???
मां कह रही है ऐसे में अकेले तुम परेशान हो जाओगे...हमलोग तुम्हारी देखभाल करेंगे....टैक्सी करके आ जाओ...
नहीं बाबूजी....कोई चिंता की बात नहीं....
तभी बाबूजी को फ़ोन पर कुत्ते की आवाज़ सुनाई पड़ी...भौं-भौं-भौं...
Aparna Jha

Monday, 25 September 2017

मुट्ठी बार बादाम

मुट्ठी बार बादाम

विवाह के कई साल बाद गोपाल के घर संतान सुख प्राप्त हुआ .ना जाने कितनी मन्नत और तम्मनाओं की पोटली बन जन्म लिया था फेंकन... नाम भी ऐसा की किसी की नज़र ना लगे बच्चे को...गोपाल को जब जो जैसे उस की खुशनसीबी और लंबी उम्र के लिए सलाह देता वह उन बातों को अमल करने पर तैयार हो जाता.आखिर गोपाल को उसमें अपना भविष्य जो दिख रहा था.
एक दिन ऐसे ही फौज से सेवानिवृत्त रामू काका भी गोपाल के घर पहुंचे और अपना विदेशी ज्ञान गोपाल को बघार कर चल दिये..." देख गोपाल...अगर तो इस बच्चे को बुद्धिमान और दीर्घायु बनाना चाहता है तो इसे बादाम खिलाया कर...."
बिचारा गोपाल एक तो किसान और वह भी गाँव का रहनेवाला... बादाम के कभी दर्शन भी नही हुए थे... फिर शहर जा किसी तरह मुट्ठी बाहर बादाम महंगे दामों में खरीद लाने लगा.बच्चे को इस आशा में खिलता कि बुद्धिमान बन भविष्य बना लेगा...घर के हालात सुधर जाएंगे...पर ये क्या अब जवान हुआ है तो घर के लाड़-प्यार ने तो उसे इतना बिगाड़ दिया है कि वह परिवार की क्या सुध लेगा,वो तो अपनी भी सुध नहीं ले पा रहा है....इस शोक ने गोपाल की जान ले ली...अब सारा बोझ फेंकन पर...आज घर की सारी जिम्मेवारी सर पर उसके पड़ी, वो और उसका परिवार दाने-दाने को तरसने लगे...
अब लोग भी गोपाल के घर की हालत देख कहने लगे...काश कि मुट्ठी भर बादाम खिलाने की बजाय आज फेंकन की पढ़ाई पर पैसे खर्च किये होते....
Aparna Jha
स्वरचित,मौलिक रचना.

तुम लिखते तो...

http://www.amarujala.com/kavya/mere-alfaz/aparna-jha-tum-likhte-to

Sunday, 24 September 2017

आपो दीपो भव

"आपो दीपो भव"
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"तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः सः पन्थाः।।"
(जीवन जीने के असली मार्ग के निर्धारण के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं है, श्रुतियां (शास्त्रों तथा अन्य स्रोत) भी भांति-भांति की बातें करती हैं, ऐसा कोई ऋषि/चिंतक/विचारक नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें। वास्तव में धर्म का मर्म तो गुहा (गुफा) में छिपा है, यानी बहुत गूढ़ है। ऐसे में समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति जिस मार्ग को अपनाता है वही अनुकरणीय है।
प्रतिष्ठित वह है जो चरित्रवान् हो, कर्तव्यों की अवहेलना न करता हो, दूसरों के प्रति संवेदनशील हो, समाज के हितों के प्रति समर्पित हो)

    आज के परप्रेक्षय में दो प्रकार के विद्वान :
1. एक वो जो वकीलों की तरह अपने बातों को सत्यापित करने के लिया बात-बात पर किताबों/ग्रंथों को संदर्भ बना अपनी तार्किकता को प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं, बेशक वो समसामयिक परिस्थिति के लिए प्रायोगिक हो ना हो...
2. दूसरे वो विद्वान जिन्होंने किताबें तो बहुत पढ़ीं हैं पर आंखें मूंदे उन्हीं रास्तो पर नहीं चलता बल्कि विभिन्न परिस्थितियों में संदर्भो को साथ ले अपने मस्तिष्क का भी उपयोग करते है और व्यवहारिक जीवन पर अपनी पैनी नज़र रखते हैं, सही और गलत का विचार करते हुए  उसी अनुरूप समाजहिक हित की बातें करते हैं.उनके लिए चिंतन का स्वरूप 'धारणा-प्रतिधारणा-समन्वय' पर आधारित होता है.
मेरे ख्याय से पहले प्रकार के विद्वान खुद में ही भ्रमित रहते हैं और लोगों को भी भ्रमित करते हैं...उनके पास कोई समाधान नहीं होता...  बस विद्वता का सहारा....जो कि भ्रांति फैलाने वाला और समाज के लिये घातक होता है. ऐसे में आवश्यक है कि व्यक्ति अपने को जागरूक रखे.
"आपो दीपो भव"(आप खुद के दीपक बनो).
Aparna Jha

Saturday, 16 September 2017

खबरों की खबर

"खबरों की खबर...."
सुबह गौरी लंकेशजी पर आधारित खबर एक चैनल पर देख रही थी...कई वरिष्ठ पत्रकार अपनी बातें रख रहे थे और रखना भी चाहिये.ऐसी नृशंश हत्या की यथासंभव भर्त्सना होनी चाहिए.मौत चाहे किसी की भी हो कभी भी अच्छा प्रतीत नहीं होता.
     उस समय चैनल पर जो कुछ दिखाया जा रहा था वह चूंकि मुझे तर्कसंगत लगा तो दो घड़ी मैं भी वहां देखने बैठ गई.बंगलोर के एक बहुत ही वरिष्ठ पत्रकार ने जो कुछ भी अपनी बातें रखीं वह बहुत ही तर्कपूर्ण लगी. उन्होंने कहा कि पत्रकारिेता में अक्सर ऐसा होता है कि बेबाकी से लिखने वाले मारे जाते हैं परन्तु कितनो के लिए संज्ञान लिया जाता है,इन खतरों को तो आये दिन लोकल पत्रकार झेलते ही रहते हैं.परन्तु आवाजें उन्ही लोगों के लिए उठती हैं जो किसी राजनीति से जुड़े होते हैं.गौरी लंकेश भी कुछ इसी प्रकार की थीं. परन्तु उनके मौत के कारणों में राजनीतिक के अतिरिक्त उन का जमीन को लेकर अपने भाई बहनों से अनबन और प्रॉपर्टी डीलरों का एंगल का आसार भी होना बताया.उसका कारण उन्होंने बताया कि सिटी पॉइंट या सेंटर जैसा कोई बंगलोर की जमीन बताई जिसकी बराबरी दिल्ली के कन्नौट प्लेस के बराबर आंकी गई.जिसका रुपयों में 40 से 50 करोड़ आंका गया है
       कहने का मतलब कि कोई भी इस तरह की दुर्घटनाएं होती हैं और न्यूज़ चैनल आपको लगातार इससे संबंधित अनाप शनाप बातों से लगातार अवगत कराता रहता है_ ये देखिए वो दीवार....वो दरवाज़े.... उनका वो कमरा....आपके समक्ष सबसे पहले हमारे न्यूज़ चैनल, आप तक ले आये हैं.....क्या मतलब निकलता है इन खबरों का.….
.. और इन  सब के बीच अपने को  सबसे ऊपर बताने की होड़ में ना जाने खबरों को किस तरह तोर मोड़ दिया जाता है की आपको पता भी नही लगता.आप भी खबरों के इंतिज़ार में क्या कुछ बेसिर पैर की बातें देख जाते हैं.
         मेरे खयाल में खबर ऐसी बननी चाहिए जिसमें तर्क हो और तंत्र को हिलाने का माद्दा हो. नाकि हर बातों में राजनीति को बीच में ला TRP बटोरी जाय.
    पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना गया है  जो तीनों स्तम्भों से समाज को जोड़ता है , एक आम राय बनाने में सहायक होता है. अपनी भागीदारी से समाज को मजबूत बनाता है.ऐसे में पत्रकारिता को समाज के लिए एक संवाद की कड़ी बनने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए ना कि खुद को ही एक खबर बनाने की होड़ में लगा रहना चाहिए.
Aparna Jha

Thursday, 14 September 2017

शाम्भवी दी (हिंदी दिवस के बहाने एक संस्मरण)

"शाम्भवी दी"
हिंदी दिवस के बहाने(संस्मरण)

"अरे कहाँ हो मंजू, सोना, मोना !कोई तो दया करो इस गरीब पर.....मुँह टेढिया टेढिया के बोलकर थक गई हूँ....."
"ऐसा क्या हुआ....शाम्भवी दी???
"अरे कुछ नहीं सोना...बस कुछ इतिहास के विभाग में अहिन्दी भाषी लोग आए थे....बात चीत थोड़ी लंबी खींच गई.....वो भी अंग्रेज़ी में.....अब तो चाय पिला दो."
हम सबकी चहेती, गंगा होस्टल में रहने वाली 'शाम्भवी दी'. बिल्कुल  ठेठ बिहारी मस्ती वाला अंदाज़...कैम्प्स में जहां से वो गुज़रती, विद्यार्थी लोग उनकी सादगी और बोलने केअंदाज़ के कुछ इस तरह दीवाने थे कि होस्टल तक उनका पीछा करते...और इस बीच किसी को उन्होंने टोक क्या दिया बस शर्म से मानों सैंकड़ों घड़ा पानी उस बच्चे पर पड़ जाता.
शाम्भवी दी पटना की एक अमीरघर की बेटी थी जिन्होंने मिशनरी स्कूल से शिक्षा ले उच्च शिक्षा दिल्ली के लेडीज़ श्रीराम कॉलेज से की और फिर जेएनयू में शोधकर्ता के रूप में रहीं.
वो छात्र जो दूसरे राज्यों से हिंदी माध्यम से पढ़कर आते उनके लिए शाम्भवी दी तो मानो वरदान से कम नहीं.ऐसा इसलिए कि इस युनिवर्सिटी में लोगबाग अंग्रेजी ही खाते-पीते,उठते-बैठते और सांस भी अंग्रेज़ी में ही लेते.ऐसे में कुछ दिनों के लिये नये प्रवेश लिए हुए हिंदी भाषियों  का तो जैसे अंग्रेज़ी संग सामना मानो कान बहरा हो जाना शरीर फूल जाना ,ऐसी ही हालत हुई रहती.
हालांकि शाम्भवी दी जितनी ही सुंदरता से हिंदी बोलती उतने ही सौम्यता से अंग्रेजी.परन्तु ज्यादा समय उनका वो अजबे-गजबे वाला भोजपुरिया हिंदी ... क्या गज़ब ढाता... इस बात के गवाह वहां का हर एक विद्यार्थी और प्रशिक्षक थे.
उनसे जब भी कोई हैरानीवश पूछ बैठता की तब जब कि वह इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हैं और इतनी कुशाग्र बुद्धि भी, फिर भी जानबूझ कर अपनी ऐसी छवि उन्होंने क्यों बना रखी हैं?तब वह पूरी गंभीरता से यही कहतीं .... "जैसे जीवन के लिये आक्सीजन जरूरी है वैसा ही महत्व भाषा का भी हमारे जीवन पर है.वो भाषा जिसे बोलकर अपना बचपन, अपनी जवानी अपने ढलते उम्र को जिया है उसकी जगह, समय की जरूरत अनुसार जिस नई भाषा को अंगीकार किया वो उसकी जगह भला कैसे ले सकता.वह तो हमारे आत्मा की आवाज़ है जो हमें उस तक पहुंचाती है, हमारे और उसके बीच एक रिश्ता कायम कराती है...रिश्ता करीबी का....प्रेम का...अपनेपन का...
उससे भला मुझे कोई कैसे अलग कर सकता???मुझ से मेरी भाषा का खोना यानि मेरे शरीर को मेरी आत्मा से अलग करना.....अच्छा,
तुम ही लोग  बताओ...क्या ऐसा कभी संभव है भला!!!
तीन वर्षों का सानिध्य उनसे और फिर देश के सर्वोच्च सेवा की परीक्षा में राष्ट्रीय स्तर पर 19सवें स्थान को प्राप्त कर अपने कर्मक्षेत्र की ओर शाम्भवी दी चल पड़ीं.कितना कुछ सीखने को मिला,कितना कुछ सिखा गईं उन तीन वर्षों में. हिंदी भाषा उनकी अपने जमीन से जुड़ाव और अक्षुण्ण प्रेम की अभिव्यक्ति का रूप थी जिसे वो भरपूर जीती थीं और इसे कभी अपने से अलग देखना भी नहीं चाहती थीं...
बस ऐसी ही थीं हमारी 'शाम्भवी दी'.
Aparna Jha

Monday, 4 September 2017

तूफान

"तूफान"
"हाँ माँ, अब बहुत हो चुका, नैना को जहां जाना हो वो जाए."
"अरे बेटा ! वो हमारी बहु है , वो भला कहां जाएगी...."
"माँ ,ये आप ऐसा सोचती हैं ना...परन्तु सुनैना कुछ और ही सोचती है.तंग आ गया हूँ  उसके अपने परिवार और दोस्तों की प्रशंसा सुनते सुनते...."
".....समय का अब और इंतिज़ार नही कर सकता...ना तुम उसकी अच्छी सास और ना ही मैं अच्छा पति बन पाया."
"ये भी बात सही है कि हम उसकी नादानियां भी समझते हैं और फिर उससे प्यार भी करते हैं."
"तो फिर ऐसा फैसला क्यों???"
"माँ समझा करो..."
"हम अपने प्यार के लिए उसकी जिंदगी तबाह तो नहीं कर सकते ना!
वैसे भी घर में तो अशांति ही तो छाई रहती है...."
"अब मैं क्या कहूँ..... जैसा तुम ठीक सोचो बेटा...."
तभी सुनैना की आवाज़ आई.वह अपने सूटकेस संग मायके विदा हो गई.
तीन-चार चार दिन बाद ....
"हैलो, नैना बोल रही हूँ....
तुम सुन रहे हो ना मेरी बात....
अजय मुझे प्यारी हवाओं के झोंकों की आदत है, ये मुझे किस तूफान में झोंक किनारे लग गए हो....
मुझे तुमलोगों की आदत है, मैं ऐसे में जी नहीं पाऊंगी....
तुम आते क्यों नहीं.... मुझे अपने और तुमलोगों के प्यार का अंदाज़ा ना था ...
आये तूफान को तुम्हीं टाल सकते हो....
सुन रहे हो ना मेरी बात....
हैलो....हैलो...."

Thursday, 31 August 2017

बाबुल ना ब्याहो बिदेस

"बाबुल ना ब्याहो बिदेस"

स्मिता की आँखें पिछले कई दिनों से  अखबार के हर इक पन्नो को पढ़ते रहती, समाचार चैनलों पर, खुद पर हो रहे वज्रपात
को सह रही थी.हर एक हर्फ़ जो उसके बारे में कही सुनी जा रही थी , उनकी आवाजें दीवारों से टकरा उसके मस्तिष्क पटल पर जैसे जोरों का प्रहार किए जा रही थी.आखिर उसकी गलती कहां हुई, इसे वह समझ नही पा रही थी.एक आम से परिवार में पैदा हुई और आम से परिवारों के बच्चों जैसी परवरिश और सोच भी वैसी ही. माँ-पिताजी गुरु सेवा की परंपरा से बंधे जहां भक्ति, भक्ति ना हो अंधभक्ति हो गई.कितनी प्यारी और सुंदर सी बच्ची थी स्मिता. गुरुजी ने जो परिवार और वर स्मिता के लिए बताया नतमस्तक हो परिवार ने अपनी बेटी का ब्याह वहीं रचाया.गुरुजी के बारे में जो बातें आये दिन खबरों से मिलती उसके मुताबिक वो रसूखदार,अय्यास, जिसे भगवान , पाप-पुण्य,समाज कानून किसी भी बात का डर नहीं.जिसके अनुयायी एक बार भक्ति के दलदल में फंसे तो स्वर्ग और नर्क का फैसला उसके गुरुजी का.
दस साल तक अपने विवाह को संभालते हुए एक दिन घरेलू हिंसा से त्रस्त स्मिता गुरुजी के चरणों में आ गिरी.अब गुरुजी का उसके प्रति  ऐसा क्या व्यवहार रहा कि ना  परिवार में वह स्थान पा सकी , नाहि ससुराल में. और, ऐसे मजबूरी के हालात में एक अदना सी लड़की के पास विकल्प ही क्या ??? या तो आत्म हत्या या खुद को पत्थर बना हालात से समझौता ???
शायद मौत से वह घबरा गई हो और अंधेरों में भी रौशनी की मन में आस लिए आज वह जहां तक पहुंची , समाज उन रिश्तों की इजाज़त नहीं देता. आज स्मिता खुद से सवाल कर रही थी_ क्या मुझे न्याय मिलेगा?
क्या मैं गुनाहगार हूँ ? क्या मेरी भी कोई सुनेगा? क्या कोई है जो मेरी बातों पर यहीं कर मेरे लिए आंसू बहायेगा ???
       तभी किसी TV चैनल पर कोई कुछ कह रहा था जिसकी आवाज़ स्मिता के अंतरात्मा की आवाज़ को धीमी कर गया....
"जरूरी नहीं फैसला अदालत सुनाए, एक फैसला उसका भी जो 'वक्त' के रूप में आता है. तूने जो किया और दूसरे ने जो किया उसका हिसाब यही होता है." तभी पड़ोसियों ने चीखने की आवाज़ें सुनी.... बड़ी दर्दनाक सी आवाज़ें.....अचानक से स्त्रियां जो वहां एकत्रित हो गईं थीं, उनसे मिश्रित प्रतिक्रिया भी आने लगीं. उन्ही में से किसी ने कहा....
सच ही तो चिल्ला रही है, उसका गुनाहगार कौन और उसे उसके सवालों का जवाब भी कौन देगा???
स्मिता चीख-चीख कर यही आवाज़ें लगा रही थी_ "मेरी रचना स्त्री के रूप में किसने की...
क्यों की...???
इस जन्म को मैं  पाप समझूँ या पुण्य???
Aparna Jha

चित्रण : web image

Thursday, 24 August 2017

खुशी की तलाश

हैलो मंजू ,क्लास से फ्री हो गई क्या"

हाँ,हाँ ,हैल्लो भावना अभी आधे घंटे में छुट्टी हो जायेगी. बताओ कैसे फोन करना हुआ"

"कई दिन हो गए थे तुम से मुलाक़ात नहीं हो पा रही है क्यों ना आज कैंटीन में साथ कॉफ़ी हो जाए,थोड़ी सुनेंगे ,थोड़ा सुनाएंगे:)." भावना ने मंजू से कहा.

"चलो आज मुहूर्त निकल ही आया,इसी ख़ुशी में आओ गले मिलते हैं :):):):)" भावना ने मंजू से गले मिलते कहा.

_भावना क्या बात है आज तुम्हारी हंसी की वो खनक सुनाई नहीं दे रही???

_नहीं कुछ ख़ास नहीं , बस जिंदगी गुज़र रही.

समझ में नहीं आता क्या करूँ  जितना ही खुद को समझना चाहती हूँ उतना ही उलझते जा रही.

घर -परिवार की जिम्मेदारियां,नौकरी की गंभीरता ,सामाजिकता सभी तो निभाया मैंने  ,कभी किसी से उम्मीद की दरकार नहीं . फिर भी क्यों कोई मुझसे खुश नहीं.

वहीँ अनिता को देखो,सुनीता को देखो .सभी तो अपनी जिंदगी जी रहे, अपनी मर्जी का खाते पीते,पहनते ओढ़ते , हमेशा दूसरों की देखा देखी और प्रतिस्पर्धा में ही जीवन यापन कर रहे पर कितने खुश दीखते हैं .

मंजू हंसने लगी ,"अरे बावली किसी के चेहरे पर उसकी खुशी तुमने कैसे पहचान ली.तुम शायद अपने सोच में गलत भी तो हो सकती है."

तभी प्रिंसिपल मुस्कुराते हुए वहां पहुंचे_क्या बातें हो रही हैं ! क्या मैं भी कॉफी पी सकता हूँ."कुछ ही क्षणों में परिस्थितियों को भांपते उन्होंने मुस्कुराते हुए एक शेर दागा_

"ख़्वाबों के दरमियाँ थे

अब किनारा मिल गया"

"मैं ने तो जीवन से यही सीखा  कि बेकार की बातों में समय मत गंवाओ.खुदमें खुशी तलाशो.और बाकी को धुंए में उड़ाते चलो."

रिश्ते

आशा हाँफते-हाँफते आफिस पहुँची, तभी रेखा ने रोका_ "अरे कहाँ भागी -भाग जा रही हो ,एक कप चाय हमारे साथ पी तो लो !"

"अरे नहीं रेखा अभी-अभी ऑफिस पहुंची हूँ, ज़रा बॉस के सामने हाज़िरी बजा तो लूँ."

आशा बॉस (राजेश) के कमरे में पहुँचती है_"क्या बात है ,तबियत तो ठीक है, छुट्टी कर लेतीं."

"नहीं सर,ऐसी कुछ ख़ास बात नहीं . बस आज बहू की तबियत कुछ खराब हो गई थी, उस पर से कोई महत्वपूर्ण इंटरव्यू भी आज ही उसे देना था.डॉक्टर के पास जाने से उसने मना कर दिया था, शायद समय की कमी थी.ऐसे में उस उसके हाल पर तो छोड़ नहीं देती.फिर इंटरव्यू का मामला.अपने समझ  में जितना आया उतने घरेलु नुस्खे से अपनी बहू के तबीयत को ठीक करने का प्रयास भी किया.अभी उसे साक्षात्कार केंद्र पहुंचा कर आ रही हूँ.सोचा अब ऑफिस की फाइलों को भी ज़रा निबटा लूँ.

राजेश आशा की तरफ बड़े ही आश्चर्यचकित हो कर देख रहे थे.वह सोच रहे थे की इतनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी आशा अपने (प्रौढ़ावस्था)जीवन से कितनी संतुष्ट है.उसके चेहरे पर छाई ख़ुशी और तेज़ देखते बनता था.आशा भारतीय परिधान में रहने वाली ,अपने उत्तरदायित्व के प्रति ईमानदारी रखने वाली एक विदुषी महिला थी .आज राजेश की पत्नी ने ना जाने कितनी ही जली-कटी बातें अपने बहु को सुनाई थी.

राजेश अभी अपनी चिंतन की दुनिया में खये थे ,तभी आशा ने कहा _"आज शुभा (बहु का नाम)

अपनी मां के पास होती तो ममतामयी छाँव मिलती, भला एक कामकाजी सास, माँ की तरह कहाँ प्यार कर पाएगी.

अच्छा तो मैं चलूं अपनी सीट पर,कई सारे फाइल निपटाने हैं......."


आत्मबल

लघु कथा

      

          "आत्मबल"

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-अरे ललित तुम यहाँ !

-कब आये लंदन से ?

-बस एयरपोर्ट के रास्ते सीधे तुम्हारे स्कूल ही आ   रहा हूँ.

-ऐसी भी क्या जल्दी थी ?घर जाकर थोड़ा आराम कर लेते ,तब तक मैं भी स्कूल से वापिस लौट आई रहती. इतना लंबा सफर.... थक तो गए ही होगे.

- नहीं थका हूँ ,मैं जिस कारण से यहां आया हूँ , तुमसे मिलना मेरे लिए बेहद जरुरी था. बस अब तुम आज की छुट्टी ले मेरे साथ रहो. मुझे तुम से कुछ जरुरी बातें करनी है.

-और  ये ! ये तुमने अपनी हालत क्या बना रखी है?

श्वेत साड़ी, मोटे फ्रेम का चश्मा ,क्या हो गया है तुम्हे?

-अच्छा छोड़ो ये सब. तुम्हार यहां आने का प्रयोजन तो बताओ?

-हाँ रंजना, तुम से विदा ले जब मैं उच्च शिक्षा के लिए लंदन गया ,इस वादे के संग कि व्यवस्थित होते ही तुम्हें अपने साथ विवाह कर ले जाऊंगा.

पर वहां,  तुम्हारे अधूरेपन ने मुझे जेस्सी से मिला दिया.

- जेस्सी से विवाह कर ,माँ से आशीर्वाद लेने जब यहां आया था, तुम्हें मिलाया भी तो था उससे....

-बिलकुल स्वभाव में तुम्हारी ही तरह .....

- हाँ ललित, बड़ी प्यारी सी परी है वो. कैसी है वो अब!!!

- रंजना कुछ भी ठीक नहीं. जेस्सी का तुमसे  मिलना ,प्रभावित होना और मेरी हालत कुछ भी तो उससे छिपी नहीं है. बहुत जिद्दी स्वाभाव की है जेस्सी.जिस बात का जिद्द लगा बैठती है उसे पूरा करके ही छोड़ती है. और अब वह जिद्द लगा बैठी है कि मैं तुम्हें ब्याह कर अपने पास ले आऊँ.

-रंजना क्या तुम जेस्सी के इस जिद्द को पूरा करोगी.मेरी खातिर ना सही जेस्सी के लिये तो मान जाओ.

-ललित,  बचपन से ही मैं तुम्हारे साथ पली बढ़ी,पर तुम्हारे साथ का अहसास दसवीं कक्षा में ही हुआ था.तबसे सर्वस्व मैंने तुम्ही को माना. तुम लन्दन गए,उन्ही दिनों इतिहास में मैंने अपनी पीएचडी कर डाली.मुझे प्रोफ़ेसर की नौकरी भी मिल गई थी.

-जानते हो , जब तुमने अपनी और जेस्सी की बात बताई, धक्का तो मुझे बहुत जोरों का लगा था. सर्वस्व त्याग चुकी थी मैं ,परन्तु मेरे अंदर का आत्मबल मुझे टूटने से बचा लिया.तभी मैंने प्रण ले लिया था कि स्कूल के 10वीं कक्षा की बच्चियों को ही इतिहास पढ़ाऊंगी ,तब से ये बच्चियां ही मेरी रंग-बिरंगी दुनिया हो गईं.इतिहास पढ़ाने का लक्ष्य भी तो यही सोचा था कि बच्चो में जैसे भी हो  आत्मबल पैदा कर पाऊँ ताकि बीते पल की कमजोरियों इन बच्चों पर कभी हावी ना हो.

-ललित ,अब तुम ही बताओ, अपने बनाये हुए इस दुनिया से निकल कर जीना क्या तुम से ,या अपने अस्तित्व के साथ न्याय कर पाउंगी?????

आज ललित के संग रंजना का ये रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अपनी धरा से मिलन की खातिर जैसे "झुक गया हो आसमान."

@Ajha.24.01.17

(स्वरचित,मौलिक रचना)

©अपर्णा झा