"खबरों की खबर...."
सुबह गौरी लंकेशजी पर आधारित खबर एक चैनल पर देख रही थी...कई वरिष्ठ पत्रकार अपनी बातें रख रहे थे और रखना भी चाहिये.ऐसी नृशंश हत्या की यथासंभव भर्त्सना होनी चाहिए.मौत चाहे किसी की भी हो कभी भी अच्छा प्रतीत नहीं होता.
उस समय चैनल पर जो कुछ दिखाया जा रहा था वह चूंकि मुझे तर्कसंगत लगा तो दो घड़ी मैं भी वहां देखने बैठ गई.बंगलोर के एक बहुत ही वरिष्ठ पत्रकार ने जो कुछ भी अपनी बातें रखीं वह बहुत ही तर्कपूर्ण लगी. उन्होंने कहा कि पत्रकारिेता में अक्सर ऐसा होता है कि बेबाकी से लिखने वाले मारे जाते हैं परन्तु कितनो के लिए संज्ञान लिया जाता है,इन खतरों को तो आये दिन लोकल पत्रकार झेलते ही रहते हैं.परन्तु आवाजें उन्ही लोगों के लिए उठती हैं जो किसी राजनीति से जुड़े होते हैं.गौरी लंकेश भी कुछ इसी प्रकार की थीं. परन्तु उनके मौत के कारणों में राजनीतिक के अतिरिक्त उन का जमीन को लेकर अपने भाई बहनों से अनबन और प्रॉपर्टी डीलरों का एंगल का आसार भी होना बताया.उसका कारण उन्होंने बताया कि सिटी पॉइंट या सेंटर जैसा कोई बंगलोर की जमीन बताई जिसकी बराबरी दिल्ली के कन्नौट प्लेस के बराबर आंकी गई.जिसका रुपयों में 40 से 50 करोड़ आंका गया है
कहने का मतलब कि कोई भी इस तरह की दुर्घटनाएं होती हैं और न्यूज़ चैनल आपको लगातार इससे संबंधित अनाप शनाप बातों से लगातार अवगत कराता रहता है_ ये देखिए वो दीवार....वो दरवाज़े.... उनका वो कमरा....आपके समक्ष सबसे पहले हमारे न्यूज़ चैनल, आप तक ले आये हैं.....क्या मतलब निकलता है इन खबरों का.….
.. और इन सब के बीच अपने को सबसे ऊपर बताने की होड़ में ना जाने खबरों को किस तरह तोर मोड़ दिया जाता है की आपको पता भी नही लगता.आप भी खबरों के इंतिज़ार में क्या कुछ बेसिर पैर की बातें देख जाते हैं.
मेरे खयाल में खबर ऐसी बननी चाहिए जिसमें तर्क हो और तंत्र को हिलाने का माद्दा हो. नाकि हर बातों में राजनीति को बीच में ला TRP बटोरी जाय.
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना गया है जो तीनों स्तम्भों से समाज को जोड़ता है , एक आम राय बनाने में सहायक होता है. अपनी भागीदारी से समाज को मजबूत बनाता है.ऐसे में पत्रकारिता को समाज के लिए एक संवाद की कड़ी बनने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए ना कि खुद को ही एक खबर बनाने की होड़ में लगा रहना चाहिए.
Aparna Jha
Saturday, 16 September 2017
खबरों की खबर
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