Friday, 29 December 2017

अनन्त

"अनन्त???"
(विषय चित्र पर आधारित)

कितने सालों बाद आज रवि परदेस से घर लौटा था. आज सुबह जब वह नींद से जागा तो वही सूर्य की किरणें, मंदिर की घंटी, आरती,चिड़ियों की चहचहाहट सब स्पष्ट सुनाई दे रही थी... और कर्ण प्रिय भी प्रतीत हो रहीं थीं...
मां का कहना सवेरे-सवेरे कि "बेटा सुबह हो गई चाय पी लो..." मानो कानों में  चाशनी से सराबोर वो शब्द...
आजकल रवि अपने किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले  को ले अपने शहर अपने माँ-बाबूजी के घर कुछ दिन के लिये आया हुआ था.परदेस में उसे इतनी फुर्सत कहाँ कि मां-बाबूजी से इधर-उधर की बातें सुनता...हर बार फ़ोन पर वार्तालाप इसी बात पर आकर रुकती..."अच्छा तो सब ठीक-ठाक ना..मैं फिर बात करता हूँ..."
माँ-बाबूजी अक्सर आपस में बातें करते ....हमने कमी में रहकर भी बच्चों को पढ़ाया-लिखाया कि शायद साहब बन  कम से कम वो सुख-चैन की जिंदगी जिएंगे...पर ये क्या??? ये कौन सा मोह-जाल है जिसमें हमारे बच्चे फंसते जा रहे...जिसकी शुरुआत तो है पर अंत का पता नहीं."
रवि अपने इन दिनों को कुछ इस तरह से बिताया मानों सदियों बाद उसने बचपन जिया हो.उसे अपने इस जुड़ाव से अलग होने का जी नही कर रहा था..."बाबूजी ! चलिये ना हमारे साथ ...सब एक साथ रहेंगे..."
बेटा तुम्हें तुम्हारी खुशियां मुबारक हो...आप और आगे बढ़ो...ऊंचाइयों को छुओ..
पर एक बात बताते जाना ... घर-परिवार, समाज और फिर खुद की भी जरा सोचो...तो उसके लिए तुम्हारे पास समय नहीं...ये कैसा और कौन सा संघर्ष है जिसे तुम जिये जा रहे हो !!! इन ऊंचाइयों का कोई तो लक्ष्य होगा?"
"भविष्य निर्माण की बात बचपन से सुनता आया...पर...बाबूजी...आज...बस यही तो पता नही..."
Aparna Jha

कैद या आज़ादी

"कैद या आजादी"
विषय चित्र पर आधारित

"पता नहीं तुम्हें क्या होता जा रहा है....
ना अपनी सुध ,ना ही कोई दुनियादारी की...
मान जाओ तुम्हें मोबाइल ने खुद में कैद कर लिया है...नशेड़ियों की तरह हमेशा अपने मोबाइल में डूबी रहती हो..." पति ने पत्नी से कहा.
पत्नी_"अच्छा !तो अब ये तुम कह रहे हो...
विवाह होकर आई थी ...हज़ारों ख्वाहिशों के संग...तुम्हारे रोज़गार और छुटियों में अंतर्जाल में व्यस्त होना ...अपनी भावनाओं का मैंने कितना दमन किया था.लोगों में मिलना-जुलना तुम्हें पसंद ना था ,खुद से बाज़ार तक गई तो मैं खर्चीली हो जाती...अपने बच्चों और घर में मेरा ध्यान नहीं जाता...
अब तो मैं घर पर ही रहती हूं...ना अब मैं  खर्चीले भी नही ... तो फिर अब क्यों परेशान होते हो!कभी तुमने सोचा कि एक पढ़ी-लिखी महिला कैसे खुद को इस चाहर दीवारी में कैद कर तुम्हारे सारे सपनों को जीती थी जिसकी तुम्हें कभी परवाह ही नहीं रही.अब इस एनरोइड मोबाइल ने मेरे सृजन को फिर से जगाया है...घर बैठे मैं अपनी क्षमता को जगा पा रही हूं. हाँ, मुझे सकारात्मक जीवन  जीने का तरीका आ गया है...अब मुझे अपनी खुशियों के लिए सहारे की जरूरी नहीं...क्योंकि मैं पढ़ना लिखना जानती हूं...दुनिया को अपने और दुनिया के नज़रिए से देखना जानती हूं.
मुझे कैदी तो तुमने बना दिया था ...पर इसने तो अर्थपूर्ण जीना सीखा दिया है.आज मैं एक साहित्यकार हूँ.
पता है... आज 20 साल बाद मेरे एक मित्र मिले...हैरान थे ...कहा "कमाल की बात है !स्त्रियाँ जिस उम्र में अस्तित्व की खोज में ना जाने कहाँ-कहाँ भटकने लगतीं हैं ...इतना सब कुछ होते हुए भी...तुम अपने जीवन के इस पड़ाव में भी इतनी सृजनशील और व्यस्त हो !!!"
Aparna Jha
स्वरचित,मौलिक रचना.

अनमोल पिंजड़ा

"बेटी प्रिया ....
यह पिंजड़ा तुम्हें कहां मिला!मैंने तो इसे छुपा कर रखा था..."
"मां, उस तह खाने वाले कमरे में, उस पुरानी सी चौकी के पीछे..."
"मां, मैं भी एक पंछी पिजड़े में पालना चाहती हूं...उसे दाना दूँगी और इंसानो की बोली सिखाऊंगी...कितना अच्छा लगेगा ना ... जब वह हम जैसी बोली बोलेगी...
अरे बेटा ! अरे बेटा, ना रे ना...
यह उस पक्षी के लिए कैद होगा ...चाहे उसे कितना ही सुख देना चाहो... अपने परिवेश से कटकर रहना ही तो कैद है बेटा...
तभी मां बेटी के संवाद मध्य नानाजी चाय की फरमाइश करते हुए..."अरे ये पिंजरा !!! अभी तक.… "
"हाँ बाबूजी ...यह पिंजड़ा अभी तक मैंने सम्भाल रखा है मुझे याद है आपकी कही वो  बातें..."
...."मुझे भी याद है बेटा..."
" जब, तुम अपनी पढ़ाई के अंतिम पड़ाव पर थीं  और भविष्य की ओर कदम बढ़ा रही थी , तब,मैंने तुझे यह छोटे से खिलौने वाला पिंजड़ा दिया था(हालांकि सुंदर था और उसमें प्यारे से तोते की मूरत भी थी)... कहा था तुझसे .... अब तुम्हे अपने जीवन का चुनाव खुद ही करना होगा... लक्ष्य तुम्हारे  सामने है."
अपर्णा झा