बचपन से ही सीता और द्रौपदी को ले हमेशा मन में सवाल उठते रहते थे पर डरती थी कि कहीं धर्म से जुड़ी बातें हैं कहीं तूफ़ां बरपा ना कर दे. परन्तु आज की बुद्धिजीवी स्त्री वर्ग संग कुछ बुद्धिजीवी पुरुष वर्ग भी इस चर्चा में भाग ले रहे हैं , बहुत खुशी हो रही है. हमारी महिलाएं इस विषय पर अपना पक्ष रख पा रहीं हैं ,अत्यंत हर्ष की बात. सच्चाई सब जानते हैं कि राम को राम बनाया सीता ने और धर्मराज युधिष्ठिर की भी कहानी यही ,वरना एक ने स्त्री को जंगल दिखाया और दूसरे ने जुए के दांव लगा दी. इतिहास गवाह है कि स्त्री के चारित्रिक सुदृढ़ता के बल पर तब सीता ,द्रौपदी आबाद किया और समय-समय पर ना जाने आजतक कितनी ही महिलाओं ने समाज निर्माण में योगदान किया है.
परन्तु सवाल तब भी यही था और अब भी यही कि स्त्री के पिछड़ापन के जिम्मेदार कौन ????
समाज या परिवार, या दोनों ही?
@Ajha.24.04.17.
Monday, 16 October 2017
जवाब किसके पास....
Wednesday, 4 October 2017
दुर्गति नाशिनी : अजीब सी परिस्थिति !!!"
" दुर्गति नाशिनी :
अजीब सी परिस्थिति !!!"
हर बार की तरह इस बार भी रवीश के माँ-बाबूजी ने साल भर दशहरा पूजा के आने का इंतिज़ार किया ....
वो इस इंतिज़ार में थे कि शायद इस बार त्योहारों की छुट्टी में बेटा अपने परिवार संग उनसे मिलने आएगा....बेटे ने भी यही दिलासा दी थी उन्हें... पिछले साल ना आने पर...
क्या पता था वो छुट्टियां तो उसके अपने पाले हुए कुत्ते के लिए और परिवार के घूमने के लिए होती है...
पिता का इंतिज़ार...
और फिर रहा ना गया...
हेलो बेटा ... कहां हो! माँ तुम्हारे लिए खाना बना कर तुम्हारी राह देख रही है....
बाबूजी...घर में सभी तीन चार दिन के लिए बाहर गए हैं....आपलोग खा लीजिये....
मेरा आना जरा मुश्किल है...
मेरी तबियत ज़रा खराब हो गई है..
क्या हुआ बेटा???
मां कह रही है ऐसे में अकेले तुम परेशान हो जाओगे...हमलोग तुम्हारी देखभाल करेंगे....टैक्सी करके आ जाओ...
नहीं बाबूजी....कोई चिंता की बात नहीं....
तभी बाबूजी को फ़ोन पर कुत्ते की आवाज़ सुनाई पड़ी...भौं-भौं-भौं...
Aparna Jha