एकटा सवाल...
पछिला दू दिन बितल,तहिया अनन्त चतुर्दशी छल.बाबूजी (ससुर जी) हमरा ओहि ठाम दिल्ली आयल छलाह. अनन्त चतुर्दशी हमरा लेल सब दिन जकाँ छल,किया त' अहि इलाका में लोक अहि पावनि के नहि बुझैत छैथ.नैहर हमर सब दिन बाहरे रहल त' बहुतों रास मैथिल के पूजा आ बिध सब बुझबाक के अवसर नहि भेटल आ ताहि पर भैया आ पिताजी किछु साल तक नास्तिको रहलाह...
ख़ैर... बाबूजी के ओहि दिनक बेचैनी हम देख रहल छलियैन्ह.हुनका याद आबि रहल छलैन्ह जे कोना आँगन में माँजी अरिपन करि के पूरा पूजा के वस्तु जात सजबैत छलखिन्ह आ भरि आँगन आ दियाद-बाद के परिवार अप्पन अनन्त सूत्र आ प्रसाद चंगेरी आ दौड़ी में ल' ओहि पूजा में सम्मिलित होइतै छलैथ. बाबूजी विष्णु जी के मंत्रोच्चारण क' पूजा करथिन्ह. आ ताहि समाप्ति पर सभक बाँहि पर 'अनंत' रक्षा सूत्र बान्हथिन्ह.
सौंसे घर आनन्दक मनोरम दृश्य बनल रहैत छल.
बाबूजी कहलैथ कि ई अनन्त चतुर्दशी परिवार के रोग-शोक मुक्त राख' आ धन-धान्य आ सौहार्द बनल रहै ताहि निमित्ते विष्णु जी के पूजा कयल जाइत अछि.अहि दिन के धर्मशास्त्र में सेहो महत्व बताओल गेल. कहल ई जाइत अछि जे युधिष्ठिर सब जखन अज्ञातवास में छलैथ त' कृष्ण भगवान विष्णु जी के आह्वान केने छलैथ जे युद्धिष्ठिर सब परिवार के रक्षा करैथ.
बाबूजी के उद्गार हुनका मुख पटल पर एकटा विचित्र आनन्द प्रस्तुत क' रहल छल.मुदा तकर बाद एकटा विचित्र सन उदासियो देखबा में आयल...दियाद में एहेन किछो असमय घटित भ' गेल रहै जे ताहि के बाद घर में अनन्त पूजा नहि होइत अछि.एहने सन संदर्भ आरो किछु पावैन आ व्रत आदि में...
एकटा और घटना...
बाबूजी (हमर पिताजी) के हम्मर बा (दादी) बचपन में छोड़ि गेलखिन्ह. नवरात्र के अष्टमी दिन आ एमहर अंतिम संस्कार केने बाबा आ बाबूजी....गाम में विशाल मेला भगवती डीह पर...बाबूजी चौथी कक्षा के बच्चा छलाह, जिद्द कर' लगलाह जे हमरा मेला देखबाक अछि.बाबा कन्हा पर उठा बाबूजी के मेला ल' गेलैथ.बच्चा मोन बहलाइत रहल आ बाबा एकात भ' मुँह दोसर दिस केने शोक में डूबल...
बादक साल में की भेल हेतैय से कहियो नहि पुछलियन्ह...हँ' एत्तेक जरूर पता कि माता के रूप में नवरात्र में बाबूजी देवी दुर्गा के पाठ सब करथिन्ह आ खूब आस्था से ई पावैन मनाबथिन्ह. भरिसक अप्पन मायके प्रति सबटा प्रेम देवी दुर्गा में व्यक्त करैत होइथ...मुदा एक बात निश्चित रहै जे बाबूजी अष्टमी दिन ब्राह्मण भोज आ दान जरूर करथिन्ह. आइयो माँ के देखैत छियैन्ह जे ओहि तार के टूट' नहि देलैथ. हुनका सभक दादी माँ के प्रति प्रेम आ समर्पण से हमरा सबके कहियो ई बुझना नहि गेल कि हुनका हम बच्चा कि माँ देखने नहि छियनि बल्कि हमेशा ई अनुभव होइत छल जे ओ संगे छथि.ततबे नहि, बाबूजी जखन अस्वस्थ हुए लागलैथ त’ गया जा पिंड दान स' सेहो निवृत भेला, तथापि आय तक अप्पन पूर्वजक प्रति प्रेम आ आस्था अहियो उमेर में तेहने देखैत छियन्ह, आ सासुर में बाबूजी के सेहो अप्पन पूर्वज के प्रति प्रेम आ आस्था देखैत छियन्ह.
कहबाक तातपर्य ई जे ज्यों कोनो व्रत अथवा पावैन करैत छी अपने सब त' ओकर पाछूक' तर्क यहा ना... कि ईश्वर आराधना जे, हे भगवान ! हमरा घर-परिवार के रोग-शोक से दूर केने रहि, जे दुर्घटना असमय भूत में घटित भेल तकर पुनरावृत्ति नहि होय...तखन फेर कियाने लोक खासक' क' ताहि दिन के वर्जित करै के बजाय वरण करै कि "हे ईश्वर ! आय (अमुक) पावैन पर अपने से प्रार्थना जे फेर एहेन कोनो घटना नहि हूआ से अपने से चरण वन्दन करै छी."
की राय अपने सभक?
अपर्णा झा
चित्रण :वेब इमेजेस
दृश्य : मिथिला में अनन्त चतुर्दशी पूजा.