Tuesday, 25 September 2018

एक सवाल विश्वास से जुड़ल

एकटा  सवाल...

पछिला दू दिन बितल,तहिया अनन्त चतुर्दशी छल.बाबूजी (ससुर जी) हमरा ओहि ठाम दिल्ली आयल छलाह. अनन्त चतुर्दशी हमरा लेल सब दिन जकाँ छल,किया त' अहि इलाका में लोक अहि पावनि के नहि बुझैत छैथ.नैहर हमर सब दिन बाहरे रहल त' बहुतों रास मैथिल के पूजा आ बिध सब बुझबाक के अवसर नहि भेटल आ ताहि पर भैया आ पिताजी किछु साल तक नास्तिको रहलाह...
  
ख़ैर... बाबूजी के ओहि दिनक बेचैनी हम देख रहल छलियैन्ह.हुनका याद आबि रहल छलैन्ह जे कोना आँगन में माँजी अरिपन करि के पूरा पूजा के वस्तु जात सजबैत छलखिन्ह आ भरि आँगन आ दियाद-बाद के परिवार अप्पन अनन्त सूत्र आ प्रसाद चंगेरी आ दौड़ी में ल' ओहि पूजा में सम्मिलित होइतै छलैथ. बाबूजी विष्णु जी के मंत्रोच्चारण क' पूजा करथिन्ह. आ ताहि समाप्ति पर सभक बाँहि पर 'अनंत' रक्षा सूत्र बान्हथिन्ह.
सौंसे घर आनन्दक मनोरम दृश्य बनल रहैत छल.
बाबूजी कहलैथ कि ई अनन्त चतुर्दशी परिवार के रोग-शोक मुक्त राख' आ धन-धान्य आ सौहार्द बनल रहै ताहि निमित्ते विष्णु जी के पूजा कयल जाइत अछि.अहि दिन के धर्मशास्त्र में सेहो महत्व बताओल गेल. कहल ई जाइत अछि जे युधिष्ठिर सब जखन अज्ञातवास में छलैथ त' कृष्ण भगवान विष्णु जी के आह्वान केने छलैथ जे युद्धिष्ठिर सब परिवार के रक्षा करैथ.
बाबूजी के उद्गार हुनका मुख पटल पर एकटा विचित्र आनन्द प्रस्तुत क' रहल छल.मुदा तकर बाद एकटा विचित्र सन उदासियो देखबा में आयल...दियाद में एहेन किछो असमय घटित भ' गेल रहै जे ताहि के बाद घर में अनन्त पूजा नहि होइत अछि.एहने सन संदर्भ आरो किछु पावैन आ व्रत आदि में...

एकटा और घटना...
बाबूजी (हमर पिताजी) के  हम्मर बा (दादी) बचपन में छोड़ि गेलखिन्ह. नवरात्र के अष्टमी दिन आ एमहर अंतिम संस्कार केने बाबा आ बाबूजी....गाम में विशाल मेला भगवती डीह पर...बाबूजी चौथी कक्षा के बच्चा छलाह, जिद्द कर' लगलाह जे हमरा मेला देखबाक अछि.बाबा कन्हा पर उठा बाबूजी के मेला ल' गेलैथ.बच्चा मोन बहलाइत रहल आ बाबा एकात भ' मुँह दोसर दिस केने शोक में डूबल...
बादक साल में की भेल हेतैय से कहियो नहि पुछलियन्ह...हँ' एत्तेक जरूर पता कि माता के रूप में नवरात्र में बाबूजी देवी दुर्गा के पाठ सब करथिन्ह आ खूब आस्था से ई पावैन मनाबथिन्ह. भरिसक अप्पन मायके प्रति सबटा प्रेम देवी दुर्गा में व्यक्त करैत होइथ...मुदा एक बात निश्चित रहै जे बाबूजी अष्टमी दिन ब्राह्मण भोज आ दान जरूर करथिन्ह. आइयो माँ के देखैत छियैन्ह जे ओहि तार के टूट' नहि देलैथ. हुनका सभक  दादी माँ के प्रति प्रेम आ समर्पण से हमरा सबके कहियो ई बुझना नहि गेल कि हुनका हम बच्चा कि माँ देखने नहि छियनि बल्कि हमेशा ई अनुभव होइत छल जे ओ संगे छथि.ततबे नहि, बाबूजी जखन अस्वस्थ हुए लागलैथ त’ गया जा पिंड दान स' सेहो निवृत भेला, तथापि आय तक अप्पन पूर्वजक प्रति प्रेम आ आस्था अहियो उमेर में तेहने देखैत छियन्ह, आ सासुर में बाबूजी के सेहो अप्पन पूर्वज के प्रति प्रेम आ आस्था देखैत छियन्ह.

कहबाक तातपर्य ई जे ज्यों कोनो व्रत अथवा पावैन करैत छी अपने सब त' ओकर पाछूक' तर्क यहा ना... कि ईश्वर आराधना जे, हे भगवान ! हमरा घर-परिवार के रोग-शोक से दूर केने रहि, जे दुर्घटना असमय भूत में घटित भेल तकर पुनरावृत्ति नहि होय...तखन फेर  कियाने लोक खासक' क' ताहि दिन के वर्जित करै के बजाय वरण करै कि "हे ईश्वर ! आय (अमुक) पावैन पर अपने से प्रार्थना जे फेर एहेन कोनो घटना नहि हूआ से अपने से चरण वन्दन करै छी."
की राय अपने सभक?
अपर्णा झा

चित्रण :वेब इमेजेस
दृश्य : मिथिला में अनन्त चतुर्दशी पूजा.

Sunday, 23 September 2018

उसनिया-कुटिया,कन्सार (मिथिला दर्शन)

"उसनिया-कुटिया -कन्सार"
(मिथिला दर्शन )

मिथिलांचल का ये 'भाषा शब्द' उसके दैनिक जीवन के बारे में   कितना कुछ कह जाता है. जीवन में खान-पान से प्रभावित दैनिक जीवन के कार्यकलाप और उससे  हुई संतुष्टि में संस्कृति की झलक जिसमें प्रकृति की सुंदरता भी है और प्रकृति की आवश्यकता भी....वैसे भी कहा गया है "भूखे भजन ना होत गोपाला".सृजनात्मकता के तार भी पेट से होकर ही मस्तिष्क को जाता है.
ऐसे ही मिथिला के खान-पान का एक हिस्सा है 'धान', उससे बने खाद्यान्न और उसके गिर्द है "उसनिया-कुटिया और कन्सार".
मिथिला के भोजन में चावल प्रधानता है.चावल ही खान-पान,चावल पूजा के सामान में,शुभता और परिपूर्णता में और चावल के 'पिठार'(भिगोए हुए चावल के पीसे घोल)से है मिथिला लोक संस्कृति 'अरिपन'(अल्पना ) मिट्टी के आंगन और घर की दीवारों पर उकेरी पारम्परिक लोक चित्रकथाओं के कल्पनाओं की दृश्यावली.

मिथिला के खान-पान में दैनिक रूप से सुबह और शाम के नाश्ते में चावल से बने चूड़ा(पोहा/चिड़वा)और भूजा होता है.प्रातः चूड़ा(पानी से थोड़ा भिगो)-दही-चीनी-आचार और मौसम के अनुसार(उपलब्ध फल जैसे) केला या आम 'जलखैय' ( जलपान) के रूप में खाया जाता है.
शाम के नाश्ते में चावल का भूजा या चूड़ा का भूजा खाया जाता है.इस भूजा में भुना चना, प्याज,आदरक,हरी मिर्च, नींबू,आचार का मसाला इत्यादि मिला कर खाया जाता है.सोने पे सुहागा तब जब इसके साथ बालू में भुना आलू का चोखा या हरा चना/काला चना(घुघनी/फ्राइ) या फिर छोटी मछली तली हुई मिल जाए...

आइये चावल के 'चूड़ा' और 'भुजा' बनाने की प्रक्रिया को जानें.

पहले 'चूड़ा' बनाने की विधि जानें.'चूड़ा' बनाने की विधि ही 'उसनिया-कुटिया' की विधि है जो प्राचीनतम समय से चली आई है. उसनिया-कुटिया परिवार के किसी एक स्त्री का कार्य क्षेत्र(दायित्व) नहीं होता है,बल्कि परिवार की महिलाएं सब मिलकर इस कार्य को करतीं हैं. धान को रात भर भिगोने के बाद इसे लकड़ी के आंच पर मिट्टी के बर्तन(घड़े  एक हिस्से को तोड़कर उसमें) बाँस की तीन चार छोटी छोटी बत्तियों से भूना जाता है और फिर 'उखईर-समेत' ओखली में कूट कर चूड़ा (rice flex) को धान के छिलके से अलग किया जाता है. धान के छिलके से चूड़ा को अलग करने की विधि को 'फटकना' कहते हैं और बाँस की पत्ती से बने  'सूप' या 'डगरा' के माध्यम से फटका जाता है.और फिर बाँस से बने बड़े-बड़े बर्तन 'पथिया' में इकट्ठा करते है.ठंडा होने पर इसकी डिब्बाबंदी होती है जो कि महीनों तक भोजन के रूप में काम आता है.
'भूजा भुनने का तरीका इससे थोड़ा अलग है.भूजा जहाँ भुना जाता है उसे 'कन्सार' कहते हैं.यहाँ चार या छः मिट्टी के चूल्हे (जिसमें लकड़ी जलाई जाती है) एक साथ जलते रहते हैं. जिस पर चावल भुनने के लिय मिट्टी का घड़ा गर्म होता रहता है और दूसरी तरफ मिट्टी के बर्तन में अलग अलग तापमान पर गर्म होते  रहता है चिकनी बालू (विशेषकर 'कमला' नदी किनारे का बालू).भूजा वाले चावल को उसना चावल कहते हैं.इसकी विशेषता यह होती है कि  धान को रात भर पानी में भिगोया जाता है और फिर उसी भीगे धान को आग पर थोड़ा भाप देने के बाद उससे  चावल निकाला जाता है और इसी चावल का भूजा भुना जाता है. चावल को भुनने के लिये मिट्टी का घड़ा होता है जिसे बीच के हिस्से थोड़ा तोड़ दिया जाता है.लकड़ी के चूल्हे पर एक तरफ़ चावल भूनते रहता है और दूसरी तरफ़ बालू गर्म होते रहता है. चावल भुनने के क्रम में कन्सार वाली को पता होता है कि कब कितना गर्म बालू भूनते हुए चावल में डालते जाना है और  जब चावल कुरकुरा भुन जाता है तो उसे गर्म बालू से अलग छान कर बाँस की बनी 'चंगेरी' में रखते हैं.इस 'चंगेरी' की खासियत यह कि यह बहुत ज्यादा गर्म नहीँ होता है और ना ही भूजा के कुर कुरेपन को ही कम होने देता है.(चावल भी दो तरह से भुना जाता है, एक को भुजा और दूसरे को 'मुरही' /मुरमुरे कहते हैं)
ज़रा इन जलपानों पर ध्यान दें...कितने पौष्टिक हैं ये जलपान और हमेशा घर में उपलब्ध रहने वाला...ना मेहमानों के लिये चूल्हा चढ़ाना, ना भोजन का मेनू तैयार करना और बस सबकुछ सरपट-चटपट. मिथिला के इस भोजन को रईसाना भोजन माना जाता है जिसका यूँ कहें तो इतिहास बहुत ही पुराना है. पहले के समय में मिथिलांचल में अतिथियों का खान-पान से स्वागत करने में चूड़ा-दही का बहुत ही बखान किया गया है.ब्राह्मणों को भी चूड़ा-दही-चीनी का ही सत्कार होता था,जिसमे चूड़ा-दही क़्वालिटी पर जोर होता  था और चूंकि मिथिलांचल मिठाई पसंद लोग होते हैं इसलिए चीनी की मात्रा भी देखी जाती है. खान-पान,दान,विवाह में विदाई  के तौर पर, रिश्तेदारी में और सफर/यात्रा में चूड़ा की पोटली साथ ही हुआ करती थी.आज भी गांव से आने वाले रिश्तेदार अपने शहरी रिश्तेदारों के लिये चूड़ा, भूजा तो लेकर ही जाते हैं.
'कन्सार' जाना स्त्रियों (विशेषकर बेटियों का ही कार्य हुआ करता था, इसे सखियों का मिलान भी कहा जा सकता है जहां 'सखि-बहिंपा' के लिये नित्य नए गांव के खबरों से रूबरू होना और मौज मस्तियों का समय था,जैसे कि पुरुषे वर्ग पान/चाय की दुकानों पर इकट्ठा हो गाँव और उसके बाहरी इलाकों के खबरों का आदान प्रदान किया करते थे.
'उसनिया-कुटिया' एक क्रिया-कलाप ना हो एक जुटान या कहें कि किसी उत्सव के तैयारी जैसा ही  प्रतीत होता.जहां बूढ़ी स्त्रियों से ले बच्चियां तक शामिल रहतीं, हास्य-विनोद,गीत-गायन और गप्प-शप्प सभी तो शामिल था.
इसमें कोई दो राय नहीं कि मिथिलांचल की संस्कृति में अनेकों रस और आनन्द की अनुभूति के संग सीखने हेतु है बहुत कुछ-बहुत कुछ. अपने बचपन के यादों के पिटारे से एक और यादगार किस्सा जिसे मैंने जिया ....
अपर्णा झा
चित्रण : Puja Jha.इनकी मिथिला चित्रकला में रंगों का चुनाव और रेखाओं की महीनता मुझे बहुत भाती है और इस कारण मैं अपने लेखन में इनकी चित्रकारी का सहारा लेती हूं.आज के मेरे इस विषय पर ग्रामीण स्त्रियों के  'उसनिया-कुटिया' की एक झलकी जिसमें कुछ परछाई 'कन्सार' का भी.

Friday, 14 September 2018

गीता बाबा (संस्मरण)

"गीता बाबा"
हिंदी दिवस के बहाने...
(संस्मरण)

तब गाँव में होने वाले हास्य-विनोद की बात ही कुछ और हुआ करती थी.बाबा-चाचा की खाड़ी के लोगों में कुछ नटखट-शरारती लोग भी थे.एकठो थे हमारे 'गीता बाबा'... पहलवानी और वाक्चातुर्य में उन्हें कोई पछाड़ नहीं सकता था. मैथिल विवाह में शास्त्रार्थ का कुछ विशेष महत्व हुआ करता था जिसकी तैयारी बाराती में जाने वाले लोग विशेषतौर पर कर के जाते थे. बल्कि यूँ भी होता था कि कितनी शादियां, लड़के वाले वधू के गांव के आहार-व्यवहार पर जोड़ते अथवा मुकर जाते थे. हमारे 'गीता बाबा' के नाम पर भी... वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में _ challenge accepted/rejected वाली बात, अगल-बगल वाले गाँवों से होने वाले विवाह संबंधों में लागू होता था. इतना ही नहीं,  कोई शहर से आया और थोड़ा भी तेजी दिखाने लगते तो गीता बाबा हमारे दालान पर बुलाकर शैतानी से उसकी कक्षा लगा देते थे _ "बौआ शहर में अंग्रेजी से शिक्षा ग्रहण किये हो...
(उस समय ट्रांसलेशन का जमाना था,जो चार पंक्ति हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद कर देता मानो वो पढ़ाई में अव्वल...)
तो जरा इसका अनुवाद हमें करके बताओ_

घोड़ा, सड़क पर अड़क कर भड़क गया... ट्रांसलेट इन टु इंग्लिश.☺

शहरी बौआ तो तभी चारो खाने चित्त...

अपर्णा झा

Thursday, 13 September 2018

शाम्भवी दी (हिंदी दिवस)

"शाम्भवी दी"
हिंदी दिवस के बहाने(संस्मरण)

"अरे कहाँ हो मंजू, सोना, मोना !कोई तो दया करो इस गरीब पर.....मुँह टेढिया टेढिया के बोलकर थक गई हूँ....."
"ऐसा क्या हुआ....शाम्भवी दी???
"अरे कुछ नहीं सोना... आज हमारे इतिहास के विभाग में कुछ अहिन्दी भाषी लोग आए थे....बात-चीत थोड़ी लंबी खिंच गई.....वो भी अंग्रेज़ी में.....अब तो चाय पिला दो."
हम सबकी चहेती, गंगा होस्टल में रहने वाली 'शाम्भवी दी'. बिल्कुल  ठेठ बिहारी मस्ती वाला अंदाज़...कैम्प्स में जहां से वो गुज़रतीं, विद्यार्थीजन, उनकी सादगी और बोलने केअंदाज़ के कुछ इस तरह दीवाने थे कि होस्टल तक उनका पीछा करते...और इस बीच किसी को उन्होंने टोक क्या दिया...उसपर तो बस मानों कि शर्म से सैंकड़ों घड़ा पानी पर पड़ गया.
शाम्भवी दी पटना के एक अमीर घर की बेटी थीं जिन्होंने वहीं के मिशनरी स्कूल से शिक्षा ली थी और  उच्च शिक्षा दिल्ली के लेडीज़ श्रीराम कॉलेज से और अब जेएनयू में शोधकर्ता के रूप में रहीं.
वो छात्र जो दूसरे राज्यों से हिंदी माध्यम से पढ़कर आते उनके लिए शाम्भवी दी तो मानो वरदान से कम नहीं.ऐसा इसलिए कि इस युनिवर्सिटी में लोगबाग अंग्रेजी ही खाते-पीते,उठते-बैठते और सांस भी अंग्रेज़ी में ही लेते.ऐसे में कुछ दिनों के लिये नये प्रवेश लिए हुए हिंदी भाषियों  का तो जैसे अंग्रेज़ी संग सामना, मानो कान बहरा हो जाना,शरीर फूल जाना ,ऐसी ही हालत हुई रहती थी.
हालांकि शाम्भवी दी जितनी ही सुंदरता से हिंदी बोलती उतने ही सौम्यता से अंग्रेजी भी.परन्तु ज्यादा समय उनका वो अजबे-गजबे वाला भोजपुरिया हिंदी ... क्या गज़ब ढाता था उनपर... इस बात के गवाह वहां का हर एक विद्यार्थी और प्रशिक्षक थे.
उनसे जब भी कोई हैरानीवश पूछ बैठता की तब जब कि वह इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हैं और इतनी कुशाग्र बुद्धि भी, फिर भी जानबूझ कर अपनी ऐसी छवि उन्होंने क्यों बना रखी है?तब वह पूरी गंभीरता से यही कहतीं .... "जैसे जीवन के लिये आक्सीजन जरूरी है वैसा ही महत्व भाषा का भी हमारे जीवन पर है.वो भाषा जिसे बोलकर अपना बचपन, अपनी जवानी अपने ढलते उम्र को जिया जाता है उसकी जगह भला आवश्यकतानुसार सीखी गई नई भाषा भला कैसे ले सकता है.वह तो हमारे आत्मा की आवाज़ है जो हमें उस तक पहुंचाती है, हमारे और उसके बीच एक रिश्ता कायम कराती है...रिश्ता करीबी का....प्रेम का...अपनेपन का...
उससे भला मुझे कोई कैसे अलग कर सकता???मुझ से मेरी भाषा का खोना यानि मेरे शरीर को मेरी आत्मा से अलग करना है.....अच्छा,
तुम ही लोग  बताओ...क्या ऐसा कभी संभव है भला!!!
तीन वर्षों का सानिध्य उनसे रहा.फिर, देश के सर्वोच्च प्रसाशनिक सेवा की परीक्षा में राष्ट्रीय स्तर पर 19वें स्थान पर उत्तीर्ण हुईं और अपने कर्मक्षेत्र की ओर चल पड़ीं हमारी शाम्भवी दी.कितना कुछ सीखने को मिला,कितना कुछ सिखा गईं उन तीन वर्षों में.उनमें हिंदी भाषा के प्रति उनका समर्पण,उनकी अपने जमीन से जुड़ाव और अक्षुण्ण प्रेम की अभिव्यक्ति कूट-कूट कर भरा था  जिसे वो भरपूर जीती थीं और इसे कभी अपने से अलग देखना भी नहीं चाहती थीं...
बस ऐसी ही थीं हमारी 'शाम्भवी दी'.
अपर्णा झा

Wednesday, 12 September 2018

चोरचन यानि चौठ-चंद्र

"चौठ चंद्र यानी मिथिलांचल के चोरचन की अशेष शुभकामनाएं"

     मिथिलांचल की सुंदरता यही कि यहां कण-कण सुंदरता-मधुरता और विदुषिता समाई हुई है.एक आम सी दिखने वाली स्त्री भी सौ गुणों की खान है.तजुर्बा तो पूछिये मत...बस नानी-दादी के संग बचपन गुज़ारी थी और अध्यात्म और संस्कृति का ज्ञान अनायास ही रग रग में दौड़ने लगा. मां की गृहस्थी,बात-विचार और सहिष्णुता देखते-देखते बड़ी हुई और गृहस्थी को चलाना आ गया.पर्व-त्योहारों का महत्व,भजन गीत, अल्पना बनाना और ना जाने कितने ही गुण परम्पराओं को देखते सुनते सीखते चली आई.
जिस माटी की में प्रकृति की सुंदरता और संस्कृति की वैभवता हो उसकी प्रशंसा मानो सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है.
मिथिला संस्कृति विशेषतौर से त्योहारों एवम उत्सवों की संस्कृति है,हर महीने यानि कहें तो समय के छोटे- छोटे अंतरालों पर कोई ना कोई पर्व होता ही है और उससे जुड़ी होती है पूजा- पाठ की विधि और उससे जुड़ी अल्पना की संस्कृति और फिर वैदिक पाठ सँग गीत-संगीत,साथ ही हर पर्व-त्योहार की विशेषता उसके पकवान और पाक सज्जा से परिपूर्ण होती हुई...
आज का दिन कहीं गणेश चतुर्थी तो कहीं हरतालिका तीज और हमारे समस्त मिथिलांचल में "चोरचन यानि चौठ चंद्र" का पर्व.मिट्टी और बांस के बर्तनों में दही,फल पकवानों को चावल के पीसे घोल और सिंदूर के अल्पना से सजाएं आँगन में चंद्रमा को अर्ग देते हुए प्रार्थना करना कि हे चंद्रमा हमारे घर के सभी विघ्न-बाधा हरो...
आप सभी मित्रों को आज के पर्व की हार्दिक शुभकामना.
यह तस्वीर #pujajha जी ने बनाया है जो कि हमारे एक मिथिला मुखपोथी समूह  #sakhibahinpaसखीबहिनपा सदस्यता हैं और उनकी चित्रकारी ने मेरा मन मोह लिया,सोच आप सबों के संग भी इसे साझा करूँ.
विषय: चौठ चंद्र की पूजा और उससे संबंधित पूरे आचार-विचार.
अपर्णा झा

कहाँ हो तुम शीला...!

"कहाँ हो तुम शीला...."
आज फिर वो याद आ गई.अगस्त '1990,स्नातक में दाखिला के पहले लिस्ट में मेरा नाम आया था इसलिये क्लास में मैं पहले ही दिन से थी.एक महीने की देरी से वह क्लास पहुंची थी. साँवली सी,बिल्कुल चुप-चाप,बात जितना ही पूछो उतना ही बताती. क्लास के विद्यार्थी उसके बारे में जानने के इच्छुक थे.चूंकि उसे और मुझे लगाकर दो ही लड़कियाँ उस डिपार्टमेंट में...तो पहल कौन करे पूछताछ की...कितने सहपाठी तो यह भी कहने लगे कि देर से दाखिला हुआ है जरूर आरक्षण से आई होगी.
धीरे-धीरे समय के साथ वह भी हम सबों के साथ खुलने लगी.बिहार के एक छोटे से प्रान्त से निकल इतने बड़े विश्वविद्यालय का सफर कोई आसान बात नहीं थी.ख़ैर समय आगे बढ़ता रहा मेरी और उसकी दोस्ती परवान चढ़ती रही.रात-दिन का साथ,वो होस्टल में और मैं दिल्ली के मोतीबाग में.हॉस्टल के बस स्टैंड तक हमें पता नहीं होता कि कैंपस में रहना है या मेरे घर...
ऐसा करते करते 5 साल बीत गए. फिर वह  दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैंपस से पीएचडी करने लगी. मैं दूसरी पढ़ाई और नौकरी और फिर विवाह....और वह ईरान्त गई फिर AIR के विदेशी भाषा विभाग में  पदस्थापित हुई.उसका विवाह ना जाने किन मोड़ से गुजरता रहा और वह मुझ से कन्नी काटती रही.हर बार उसे तलाश लेती और फिर वह नदारद...2002 की मुलाक़ात के बाद आज तक नही ढूंढ पाई.किसी ने बताया कि कुछ वैवाहिक जीवन की परेशानी से दिमाग पर असर हुआ,इलाज होने के बाद ना जाने और क्या हुआ, कोई कुछ कहता है और कोई कुछ....आज के दिन दोस्तों की नज़रों में वह लापता है....शीला कहां है,कैसे है,ना घरवालों को पता है और ससुरालवालों को कोई जानता नहीं, बस इतना पता हैकि एक बेटी है और ससुराल से कोई रिश्ता नहीँ...
आज भी मेरी नज़रें उसे तलाश रहीं हैं.शीला आखिर ऐसा क्या हुआ जो मुझे तुम बता ना सकी... तुम से तो सभी वात करते भी घबराते थे...आखिर मैं तुमसे इतनी दूर कैसे हो गई ! मेरी नज़रें आज भी तुम्हें तलाशती हैं...कहां हो तुम!
अपर्णा झा

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Tuesday, 11 September 2018

नानी गाम हमरा पसिन्न नै...

एक-दू दिन पहिने बाबूजी गामक हंसी-मजाक आ आनन्दक संस्कृति के याद करैत मुखपोथी पर एकटा पोस्ट लिखने छलैथ कि गाम  केना केना हंसी-मजाक, आनन्दक स्थिति के अनुभूति करैत छल.गामक, बाबा-बाबी,समधी-समधिन,नाती-पोता आ बरियाती अहि सब लेल विषय रहल करैत छल. बरियाती में शास्त्रार्थ आ खेनाय में जे कियो परास्त भेल अथवा उचितवक्ता बनबा के प्रयास कयल ओ बेचारे फंसि जाइत छलाह. हुनकर ओहि हिसाबे नामकरण भ' जायत छल. बच्चा नानी गाम गेल ता लोक हुनका बाबा-बाबी के नाम ल' खोंझबैत/दुलारैत छलैन्ह वा गामक नामे किछो उकठ
क' देल गेल आ बच्चा आब काइनि रहल अछि बांकी सब लेल ता हँसी... जमाय बाबू सबके सेहो ताहिना हुनका माय-बहीन-पिता के नाम ल' किछु खोंझा देल गेल...जमाय बाबू ता आगि-बबूला...
नब विवाह आ बेटी बाजय त' की आ कहै त' केकरा से...ज्यों बहीन-भौज के कहती त' ओ सब आरो खोंझा देतैन्ह आ ताहि पर भ' सकैत छै जे बौरबाबू तामस में सासुर से भाइग ने जाईथ. किनको लेल समस्या आ किनको लेल परिहास आ अहि सब में तालमेल बैसबैत जीवन कत्तेक आगाँ बढ़ि जाय...
          एहने सन हमरो किछु संमरण याद आबि गेल.तीसरा चौथा के विद्यार्थी रहल होयब जे गाम गेल रही.शहरक पालाल पोसल हम तीनू बहीन स्कूल आ घरक अनुशाशन में पालल पोसल भला ग्रामीण जीवन के उन्मुक्तता के स्वाद कत्त' छल!
गामक किछु बात नीको लागय आ किछु बेजाइयो.
ताहि सब समय में कन्या शिक्षा पर जोर कत्त'?माय, भौजी सब घर सम्हारैत आ बेटी आ दादी नानी सब टहल-टिकोरा करैत.बड़ आश्चर्य लागै कि शहर में 5-7 बजे साँझक पहर में खलबा हेतु घर से बहराइये.एत्त' के कत्त' पते नहि... बाबा गाम कनि शिक्षित गाम रहल त' लोक पर ताहि कनि बाजब-भूकब पर किछु असर छल. चूंकि हम सब कनि शहर से आयल छलहुँ आ पढ़ितो छलहुँ ता
गौंआँ सब कनि आदर के नज़र से देखैत छल आ कनि गर्व सेहो करैत छल,तैं बाबा गाम बाद नीक लागै.
अहि ठीक उल्टा हमर नानी गांव,धनटेडक गांव.शिक्षा से कोनो मतलब नहि. नानी अप्पन बच्चा के अप्पन नैहर में राखि शिक्षित केलैथ, आ ओ शिक्षा के प्रति एत्तेक झुकल जे बाबूजी सन पढ़' वला जमाय के चुनाव केलैथ.नानी गांव जेनाय बाबू जी लेल आनन्दक जीवन छलैन्ह.कियात' ओ माछ बहुत पसंद करै छलैथ.मामा पोखरी नेने छलखिन्ह. बाबूजी जात्ताको दिन ओहि ठाम रहती त' माछ भात या रोटी आ कठगर के जमायल दही भोजन में आ साझुक प्रहर भुजा आ छोटका तरलहवा माछ नाश्ता के रूप में खाईथ रहैथ.विद्वान जमाय के पदवी के ओ आनन्द लैथ.दालान भरल रहै छलैन्ह लोक सबस'. सभक लेल ओ देश आ दुनिया के अखबार छलखिन्ह. किनको धर्म के बारे में पूछनाय छलैन्ह ता किनको राजनीति त' किनको समाजक प्रगति जानबाक जिज्ञासा...हम तीनू बहीन के विवशता छल जे माँ-बाबुजी के संगे रहबाक छल.
माँ अप्पन नैहर में तेहन रैम जाइत जे हम सब के सेहो शायदे पता रहैत हेतैन्ह. एक भोर जे सखि-बहिंपा सब चाय पर आँगन से बाहर ल' जाइत रहैन्ह हुनका त' समय के पूछत...कत्त' नहेनाय भेल,कत्त' कहनाय भेल हमरा सब के पता नहि रहैत छल. नानी त' बेचारी स्वर्गवासी...एक्केटा मामा, सेहो माँ संगे हमेशा...मामी के एगो बेटी ता धरि, भरि दिन बेचारी के इंतजार में कटी जाय... "दाय कनि हमरो से बतियाइथिन्ह...!"ओ दिन कहिया आयत,से त' शहर आपस जागय लेल समानों अंत मे बनहाय.
एमहर हमरा सब के हालत ई जे नानी गांव जे बच्चा से हमसब बिल्कुल अलग-थलग, बेचारी मामी से भरी दिन बतियाईये. कनि माँ के खोज' लेल बहराइये कि कोनो अगत्ती मामा कि नाना कि
कोनो नानी चुइटते देरी बाबा या गामक नामे किछ उकठ क' दैयता.तामसे मोन अंध भेल,माँ जत्तही भेटैत कि हाथ पकड़ि घीच' लागिये."नै रहैक अछि हमरा अहि गाम, एतुका लोक बाबा के गाईर पाड़ैत छैन्ह, बाबा गाम लेल गाईर पाड़ैत छै...हमरा नहि रहैक अछि एत्त'. माँ हमर बात पर हँसैत आकि तखने फेर कियो ताना द' देलक."माँ आब हम रहबो एत्त'"...माँ हँसैत रहल, हमरा कना जाय कि माँ हम्मर एत्त' आबि केहेन निष्ठुर भेल.अप्पन बच्चो के बिसरा गेल.एहेन समय जे कियो नीक लागैत रहै से छल बेचारी अंगना में बैसल माँ के इन्तिज़ार करैत मामी. बेचारी के अंदर में हुनको भड़ास त' रहिते छलैन्ह.हमरा सभक बहाने ओहो अप्पन तामस के ठंडा लाइट छलैथ.
      आब त' की नैहर...की सासुर आ की नानी आ बाबागाम...ना ओ हंसी-मज़ाक रहल,ना ओ नैनपन रहल ना ओ मज़ाक... शहरी भ' गामोक' जी लहुँ.सच्चाई त' मुदा एखनो वैह जे नानीगाम हमरा पसिन्न नहि, ओ माँ के अप्पन बच्चा बिसरा दैत अछि.केहेन बालमन छल. आय जखन हम अप्पन बच्चा पोईस रहल छी त' नैहर जागय में अहि बातक हमेशा ध्यान राखैत छी मुदा हमरे वला उलाहना ओकरो कि अहाँके आगू नाना-नानी लेल हम आ पापा कियो नै...अहाँक नैहर वला मात्र अहीं के प्रेम करैत छथि...बेटा जखन कखनो ई उलाहना दैत अछि हमरा अप्पन बालमनक दिन सब याद आबि जाइत अछि..."माँ हमरा नानीगाम नहि पसिन्न...."
अपर्णा झा.