Tuesday, 11 September 2018

नानी गाम हमरा पसिन्न नै...

एक-दू दिन पहिने बाबूजी गामक हंसी-मजाक आ आनन्दक संस्कृति के याद करैत मुखपोथी पर एकटा पोस्ट लिखने छलैथ कि गाम  केना केना हंसी-मजाक, आनन्दक स्थिति के अनुभूति करैत छल.गामक, बाबा-बाबी,समधी-समधिन,नाती-पोता आ बरियाती अहि सब लेल विषय रहल करैत छल. बरियाती में शास्त्रार्थ आ खेनाय में जे कियो परास्त भेल अथवा उचितवक्ता बनबा के प्रयास कयल ओ बेचारे फंसि जाइत छलाह. हुनकर ओहि हिसाबे नामकरण भ' जायत छल. बच्चा नानी गाम गेल ता लोक हुनका बाबा-बाबी के नाम ल' खोंझबैत/दुलारैत छलैन्ह वा गामक नामे किछो उकठ
क' देल गेल आ बच्चा आब काइनि रहल अछि बांकी सब लेल ता हँसी... जमाय बाबू सबके सेहो ताहिना हुनका माय-बहीन-पिता के नाम ल' किछु खोंझा देल गेल...जमाय बाबू ता आगि-बबूला...
नब विवाह आ बेटी बाजय त' की आ कहै त' केकरा से...ज्यों बहीन-भौज के कहती त' ओ सब आरो खोंझा देतैन्ह आ ताहि पर भ' सकैत छै जे बौरबाबू तामस में सासुर से भाइग ने जाईथ. किनको लेल समस्या आ किनको लेल परिहास आ अहि सब में तालमेल बैसबैत जीवन कत्तेक आगाँ बढ़ि जाय...
          एहने सन हमरो किछु संमरण याद आबि गेल.तीसरा चौथा के विद्यार्थी रहल होयब जे गाम गेल रही.शहरक पालाल पोसल हम तीनू बहीन स्कूल आ घरक अनुशाशन में पालल पोसल भला ग्रामीण जीवन के उन्मुक्तता के स्वाद कत्त' छल!
गामक किछु बात नीको लागय आ किछु बेजाइयो.
ताहि सब समय में कन्या शिक्षा पर जोर कत्त'?माय, भौजी सब घर सम्हारैत आ बेटी आ दादी नानी सब टहल-टिकोरा करैत.बड़ आश्चर्य लागै कि शहर में 5-7 बजे साँझक पहर में खलबा हेतु घर से बहराइये.एत्त' के कत्त' पते नहि... बाबा गाम कनि शिक्षित गाम रहल त' लोक पर ताहि कनि बाजब-भूकब पर किछु असर छल. चूंकि हम सब कनि शहर से आयल छलहुँ आ पढ़ितो छलहुँ ता
गौंआँ सब कनि आदर के नज़र से देखैत छल आ कनि गर्व सेहो करैत छल,तैं बाबा गाम बाद नीक लागै.
अहि ठीक उल्टा हमर नानी गांव,धनटेडक गांव.शिक्षा से कोनो मतलब नहि. नानी अप्पन बच्चा के अप्पन नैहर में राखि शिक्षित केलैथ, आ ओ शिक्षा के प्रति एत्तेक झुकल जे बाबूजी सन पढ़' वला जमाय के चुनाव केलैथ.नानी गांव जेनाय बाबू जी लेल आनन्दक जीवन छलैन्ह.कियात' ओ माछ बहुत पसंद करै छलैथ.मामा पोखरी नेने छलखिन्ह. बाबूजी जात्ताको दिन ओहि ठाम रहती त' माछ भात या रोटी आ कठगर के जमायल दही भोजन में आ साझुक प्रहर भुजा आ छोटका तरलहवा माछ नाश्ता के रूप में खाईथ रहैथ.विद्वान जमाय के पदवी के ओ आनन्द लैथ.दालान भरल रहै छलैन्ह लोक सबस'. सभक लेल ओ देश आ दुनिया के अखबार छलखिन्ह. किनको धर्म के बारे में पूछनाय छलैन्ह ता किनको राजनीति त' किनको समाजक प्रगति जानबाक जिज्ञासा...हम तीनू बहीन के विवशता छल जे माँ-बाबुजी के संगे रहबाक छल.
माँ अप्पन नैहर में तेहन रैम जाइत जे हम सब के सेहो शायदे पता रहैत हेतैन्ह. एक भोर जे सखि-बहिंपा सब चाय पर आँगन से बाहर ल' जाइत रहैन्ह हुनका त' समय के पूछत...कत्त' नहेनाय भेल,कत्त' कहनाय भेल हमरा सब के पता नहि रहैत छल. नानी त' बेचारी स्वर्गवासी...एक्केटा मामा, सेहो माँ संगे हमेशा...मामी के एगो बेटी ता धरि, भरि दिन बेचारी के इंतजार में कटी जाय... "दाय कनि हमरो से बतियाइथिन्ह...!"ओ दिन कहिया आयत,से त' शहर आपस जागय लेल समानों अंत मे बनहाय.
एमहर हमरा सब के हालत ई जे नानी गांव जे बच्चा से हमसब बिल्कुल अलग-थलग, बेचारी मामी से भरी दिन बतियाईये. कनि माँ के खोज' लेल बहराइये कि कोनो अगत्ती मामा कि नाना कि
कोनो नानी चुइटते देरी बाबा या गामक नामे किछ उकठ क' दैयता.तामसे मोन अंध भेल,माँ जत्तही भेटैत कि हाथ पकड़ि घीच' लागिये."नै रहैक अछि हमरा अहि गाम, एतुका लोक बाबा के गाईर पाड़ैत छैन्ह, बाबा गाम लेल गाईर पाड़ैत छै...हमरा नहि रहैक अछि एत्त'. माँ हमर बात पर हँसैत आकि तखने फेर कियो ताना द' देलक."माँ आब हम रहबो एत्त'"...माँ हँसैत रहल, हमरा कना जाय कि माँ हम्मर एत्त' आबि केहेन निष्ठुर भेल.अप्पन बच्चो के बिसरा गेल.एहेन समय जे कियो नीक लागैत रहै से छल बेचारी अंगना में बैसल माँ के इन्तिज़ार करैत मामी. बेचारी के अंदर में हुनको भड़ास त' रहिते छलैन्ह.हमरा सभक बहाने ओहो अप्पन तामस के ठंडा लाइट छलैथ.
      आब त' की नैहर...की सासुर आ की नानी आ बाबागाम...ना ओ हंसी-मज़ाक रहल,ना ओ नैनपन रहल ना ओ मज़ाक... शहरी भ' गामोक' जी लहुँ.सच्चाई त' मुदा एखनो वैह जे नानीगाम हमरा पसिन्न नहि, ओ माँ के अप्पन बच्चा बिसरा दैत अछि.केहेन बालमन छल. आय जखन हम अप्पन बच्चा पोईस रहल छी त' नैहर जागय में अहि बातक हमेशा ध्यान राखैत छी मुदा हमरे वला उलाहना ओकरो कि अहाँके आगू नाना-नानी लेल हम आ पापा कियो नै...अहाँक नैहर वला मात्र अहीं के प्रेम करैत छथि...बेटा जखन कखनो ई उलाहना दैत अछि हमरा अप्पन बालमनक दिन सब याद आबि जाइत अछि..."माँ हमरा नानीगाम नहि पसिन्न...."
अपर्णा झा.

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