"कहाँ हो तुम शीला...."
आज फिर वो याद आ गई.अगस्त '1990,स्नातक में दाखिला के पहले लिस्ट में मेरा नाम आया था इसलिये क्लास में मैं पहले ही दिन से थी.एक महीने की देरी से वह क्लास पहुंची थी. साँवली सी,बिल्कुल चुप-चाप,बात जितना ही पूछो उतना ही बताती. क्लास के विद्यार्थी उसके बारे में जानने के इच्छुक थे.चूंकि उसे और मुझे लगाकर दो ही लड़कियाँ उस डिपार्टमेंट में...तो पहल कौन करे पूछताछ की...कितने सहपाठी तो यह भी कहने लगे कि देर से दाखिला हुआ है जरूर आरक्षण से आई होगी.
धीरे-धीरे समय के साथ वह भी हम सबों के साथ खुलने लगी.बिहार के एक छोटे से प्रान्त से निकल इतने बड़े विश्वविद्यालय का सफर कोई आसान बात नहीं थी.ख़ैर समय आगे बढ़ता रहा मेरी और उसकी दोस्ती परवान चढ़ती रही.रात-दिन का साथ,वो होस्टल में और मैं दिल्ली के मोतीबाग में.हॉस्टल के बस स्टैंड तक हमें पता नहीं होता कि कैंपस में रहना है या मेरे घर...
ऐसा करते करते 5 साल बीत गए. फिर वह दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैंपस से पीएचडी करने लगी. मैं दूसरी पढ़ाई और नौकरी और फिर विवाह....और वह ईरान्त गई फिर AIR के विदेशी भाषा विभाग में पदस्थापित हुई.उसका विवाह ना जाने किन मोड़ से गुजरता रहा और वह मुझ से कन्नी काटती रही.हर बार उसे तलाश लेती और फिर वह नदारद...2002 की मुलाक़ात के बाद आज तक नही ढूंढ पाई.किसी ने बताया कि कुछ वैवाहिक जीवन की परेशानी से दिमाग पर असर हुआ,इलाज होने के बाद ना जाने और क्या हुआ, कोई कुछ कहता है और कोई कुछ....आज के दिन दोस्तों की नज़रों में वह लापता है....शीला कहां है,कैसे है,ना घरवालों को पता है और ससुरालवालों को कोई जानता नहीं, बस इतना पता हैकि एक बेटी है और ससुराल से कोई रिश्ता नहीँ...
आज भी मेरी नज़रें उसे तलाश रहीं हैं.शीला आखिर ऐसा क्या हुआ जो मुझे तुम बता ना सकी... तुम से तो सभी वात करते भी घबराते थे...आखिर मैं तुमसे इतनी दूर कैसे हो गई ! मेरी नज़रें आज भी तुम्हें तलाशती हैं...कहां हो तुम!
अपर्णा झा
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