"उसनिया-कुटिया -कन्सार"
(मिथिला दर्शन )
मिथिलांचल का ये 'भाषा शब्द' उसके दैनिक जीवन के बारे में कितना कुछ कह जाता है. जीवन में खान-पान से प्रभावित दैनिक जीवन के कार्यकलाप और उससे हुई संतुष्टि में संस्कृति की झलक जिसमें प्रकृति की सुंदरता भी है और प्रकृति की आवश्यकता भी....वैसे भी कहा गया है "भूखे भजन ना होत गोपाला".सृजनात्मकता के तार भी पेट से होकर ही मस्तिष्क को जाता है.
ऐसे ही मिथिला के खान-पान का एक हिस्सा है 'धान', उससे बने खाद्यान्न और उसके गिर्द है "उसनिया-कुटिया और कन्सार".
मिथिला के भोजन में चावल प्रधानता है.चावल ही खान-पान,चावल पूजा के सामान में,शुभता और परिपूर्णता में और चावल के 'पिठार'(भिगोए हुए चावल के पीसे घोल)से है मिथिला लोक संस्कृति 'अरिपन'(अल्पना ) मिट्टी के आंगन और घर की दीवारों पर उकेरी पारम्परिक लोक चित्रकथाओं के कल्पनाओं की दृश्यावली.
मिथिला के खान-पान में दैनिक रूप से सुबह और शाम के नाश्ते में चावल से बने चूड़ा(पोहा/चिड़वा)और भूजा होता है.प्रातः चूड़ा(पानी से थोड़ा भिगो)-दही-चीनी-आचार और मौसम के अनुसार(उपलब्ध फल जैसे) केला या आम 'जलखैय' ( जलपान) के रूप में खाया जाता है.
शाम के नाश्ते में चावल का भूजा या चूड़ा का भूजा खाया जाता है.इस भूजा में भुना चना, प्याज,आदरक,हरी मिर्च, नींबू,आचार का मसाला इत्यादि मिला कर खाया जाता है.सोने पे सुहागा तब जब इसके साथ बालू में भुना आलू का चोखा या हरा चना/काला चना(घुघनी/फ्राइ) या फिर छोटी मछली तली हुई मिल जाए...
आइये चावल के 'चूड़ा' और 'भुजा' बनाने की प्रक्रिया को जानें.
पहले 'चूड़ा' बनाने की विधि जानें.'चूड़ा' बनाने की विधि ही 'उसनिया-कुटिया' की विधि है जो प्राचीनतम समय से चली आई है. उसनिया-कुटिया परिवार के किसी एक स्त्री का कार्य क्षेत्र(दायित्व) नहीं होता है,बल्कि परिवार की महिलाएं सब मिलकर इस कार्य को करतीं हैं. धान को रात भर भिगोने के बाद इसे लकड़ी के आंच पर मिट्टी के बर्तन(घड़े एक हिस्से को तोड़कर उसमें) बाँस की तीन चार छोटी छोटी बत्तियों से भूना जाता है और फिर 'उखईर-समेत' ओखली में कूट कर चूड़ा (rice flex) को धान के छिलके से अलग किया जाता है. धान के छिलके से चूड़ा को अलग करने की विधि को 'फटकना' कहते हैं और बाँस की पत्ती से बने 'सूप' या 'डगरा' के माध्यम से फटका जाता है.और फिर बाँस से बने बड़े-बड़े बर्तन 'पथिया' में इकट्ठा करते है.ठंडा होने पर इसकी डिब्बाबंदी होती है जो कि महीनों तक भोजन के रूप में काम आता है.
'भूजा भुनने का तरीका इससे थोड़ा अलग है.भूजा जहाँ भुना जाता है उसे 'कन्सार' कहते हैं.यहाँ चार या छः मिट्टी के चूल्हे (जिसमें लकड़ी जलाई जाती है) एक साथ जलते रहते हैं. जिस पर चावल भुनने के लिय मिट्टी का घड़ा गर्म होता रहता है और दूसरी तरफ मिट्टी के बर्तन में अलग अलग तापमान पर गर्म होते रहता है चिकनी बालू (विशेषकर 'कमला' नदी किनारे का बालू).भूजा वाले चावल को उसना चावल कहते हैं.इसकी विशेषता यह होती है कि धान को रात भर पानी में भिगोया जाता है और फिर उसी भीगे धान को आग पर थोड़ा भाप देने के बाद उससे चावल निकाला जाता है और इसी चावल का भूजा भुना जाता है. चावल को भुनने के लिये मिट्टी का घड़ा होता है जिसे बीच के हिस्से थोड़ा तोड़ दिया जाता है.लकड़ी के चूल्हे पर एक तरफ़ चावल भूनते रहता है और दूसरी तरफ़ बालू गर्म होते रहता है. चावल भुनने के क्रम में कन्सार वाली को पता होता है कि कब कितना गर्म बालू भूनते हुए चावल में डालते जाना है और जब चावल कुरकुरा भुन जाता है तो उसे गर्म बालू से अलग छान कर बाँस की बनी 'चंगेरी' में रखते हैं.इस 'चंगेरी' की खासियत यह कि यह बहुत ज्यादा गर्म नहीँ होता है और ना ही भूजा के कुर कुरेपन को ही कम होने देता है.(चावल भी दो तरह से भुना जाता है, एक को भुजा और दूसरे को 'मुरही' /मुरमुरे कहते हैं)
ज़रा इन जलपानों पर ध्यान दें...कितने पौष्टिक हैं ये जलपान और हमेशा घर में उपलब्ध रहने वाला...ना मेहमानों के लिये चूल्हा चढ़ाना, ना भोजन का मेनू तैयार करना और बस सबकुछ सरपट-चटपट. मिथिला के इस भोजन को रईसाना भोजन माना जाता है जिसका यूँ कहें तो इतिहास बहुत ही पुराना है. पहले के समय में मिथिलांचल में अतिथियों का खान-पान से स्वागत करने में चूड़ा-दही का बहुत ही बखान किया गया है.ब्राह्मणों को भी चूड़ा-दही-चीनी का ही सत्कार होता था,जिसमे चूड़ा-दही क़्वालिटी पर जोर होता था और चूंकि मिथिलांचल मिठाई पसंद लोग होते हैं इसलिए चीनी की मात्रा भी देखी जाती है. खान-पान,दान,विवाह में विदाई के तौर पर, रिश्तेदारी में और सफर/यात्रा में चूड़ा की पोटली साथ ही हुआ करती थी.आज भी गांव से आने वाले रिश्तेदार अपने शहरी रिश्तेदारों के लिये चूड़ा, भूजा तो लेकर ही जाते हैं.
'कन्सार' जाना स्त्रियों (विशेषकर बेटियों का ही कार्य हुआ करता था, इसे सखियों का मिलान भी कहा जा सकता है जहां 'सखि-बहिंपा' के लिये नित्य नए गांव के खबरों से रूबरू होना और मौज मस्तियों का समय था,जैसे कि पुरुषे वर्ग पान/चाय की दुकानों पर इकट्ठा हो गाँव और उसके बाहरी इलाकों के खबरों का आदान प्रदान किया करते थे.
'उसनिया-कुटिया' एक क्रिया-कलाप ना हो एक जुटान या कहें कि किसी उत्सव के तैयारी जैसा ही प्रतीत होता.जहां बूढ़ी स्त्रियों से ले बच्चियां तक शामिल रहतीं, हास्य-विनोद,गीत-गायन और गप्प-शप्प सभी तो शामिल था.
इसमें कोई दो राय नहीं कि मिथिलांचल की संस्कृति में अनेकों रस और आनन्द की अनुभूति के संग सीखने हेतु है बहुत कुछ-बहुत कुछ. अपने बचपन के यादों के पिटारे से एक और यादगार किस्सा जिसे मैंने जिया ....
अपर्णा झा
चित्रण : Puja Jha.इनकी मिथिला चित्रकला में रंगों का चुनाव और रेखाओं की महीनता मुझे बहुत भाती है और इस कारण मैं अपने लेखन में इनकी चित्रकारी का सहारा लेती हूं.आज के मेरे इस विषय पर ग्रामीण स्त्रियों के 'उसनिया-कुटिया' की एक झलकी जिसमें कुछ परछाई 'कन्सार' का भी.
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