"अनन्त???"
(विषय चित्र पर आधारित)
कितने सालों बाद आज रवि परदेस से घर लौटा था. आज सुबह जब वह नींद से जागा तो वही सूर्य की किरणें, मंदिर की घंटी, आरती,चिड़ियों की चहचहाहट सब स्पष्ट सुनाई दे रही थी... और कर्ण प्रिय भी प्रतीत हो रहीं थीं...
मां का कहना सवेरे-सवेरे कि "बेटा सुबह हो गई चाय पी लो..." मानो कानों में चाशनी से सराबोर वो शब्द...
आजकल रवि अपने किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले को ले अपने शहर अपने माँ-बाबूजी के घर कुछ दिन के लिये आया हुआ था.परदेस में उसे इतनी फुर्सत कहाँ कि मां-बाबूजी से इधर-उधर की बातें सुनता...हर बार फ़ोन पर वार्तालाप इसी बात पर आकर रुकती..."अच्छा तो सब ठीक-ठाक ना..मैं फिर बात करता हूँ..."
माँ-बाबूजी अक्सर आपस में बातें करते ....हमने कमी में रहकर भी बच्चों को पढ़ाया-लिखाया कि शायद साहब बन कम से कम वो सुख-चैन की जिंदगी जिएंगे...पर ये क्या??? ये कौन सा मोह-जाल है जिसमें हमारे बच्चे फंसते जा रहे...जिसकी शुरुआत तो है पर अंत का पता नहीं."
रवि अपने इन दिनों को कुछ इस तरह से बिताया मानों सदियों बाद उसने बचपन जिया हो.उसे अपने इस जुड़ाव से अलग होने का जी नही कर रहा था..."बाबूजी ! चलिये ना हमारे साथ ...सब एक साथ रहेंगे..."
बेटा तुम्हें तुम्हारी खुशियां मुबारक हो...आप और आगे बढ़ो...ऊंचाइयों को छुओ..
पर एक बात बताते जाना ... घर-परिवार, समाज और फिर खुद की भी जरा सोचो...तो उसके लिए तुम्हारे पास समय नहीं...ये कैसा और कौन सा संघर्ष है जिसे तुम जिये जा रहे हो !!! इन ऊंचाइयों का कोई तो लक्ष्य होगा?"
"भविष्य निर्माण की बात बचपन से सुनता आया...पर...बाबूजी...आज...बस यही तो पता नही..."
Aparna Jha
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