हैलो मंजू ,क्लास से फ्री हो गई क्या"
हाँ,हाँ ,हैल्लो भावना अभी आधे घंटे में छुट्टी हो जायेगी. बताओ कैसे फोन करना हुआ"
"कई दिन हो गए थे तुम से मुलाक़ात नहीं हो पा रही है क्यों ना आज कैंटीन में साथ कॉफ़ी हो जाए,थोड़ी सुनेंगे ,थोड़ा सुनाएंगे:)." भावना ने मंजू से कहा.
"चलो आज मुहूर्त निकल ही आया,इसी ख़ुशी में आओ गले मिलते हैं :):):):)" भावना ने मंजू से गले मिलते कहा.
_भावना क्या बात है आज तुम्हारी हंसी की वो खनक सुनाई नहीं दे रही???
_नहीं कुछ ख़ास नहीं , बस जिंदगी गुज़र रही.
समझ में नहीं आता क्या करूँ जितना ही खुद को समझना चाहती हूँ उतना ही उलझते जा रही.
घर -परिवार की जिम्मेदारियां,नौकरी की गंभीरता ,सामाजिकता सभी तो निभाया मैंने ,कभी किसी से उम्मीद की दरकार नहीं . फिर भी क्यों कोई मुझसे खुश नहीं.
वहीँ अनिता को देखो,सुनीता को देखो .सभी तो अपनी जिंदगी जी रहे, अपनी मर्जी का खाते पीते,पहनते ओढ़ते , हमेशा दूसरों की देखा देखी और प्रतिस्पर्धा में ही जीवन यापन कर रहे पर कितने खुश दीखते हैं .
मंजू हंसने लगी ,"अरे बावली किसी के चेहरे पर उसकी खुशी तुमने कैसे पहचान ली.तुम शायद अपने सोच में गलत भी तो हो सकती है."
तभी प्रिंसिपल मुस्कुराते हुए वहां पहुंचे_क्या बातें हो रही हैं ! क्या मैं भी कॉफी पी सकता हूँ."कुछ ही क्षणों में परिस्थितियों को भांपते उन्होंने मुस्कुराते हुए एक शेर दागा_
"ख़्वाबों के दरमियाँ थे
अब किनारा मिल गया"
"मैं ने तो जीवन से यही सीखा कि बेकार की बातों में समय मत गंवाओ.खुदमें खुशी तलाशो.और बाकी को धुंए में उड़ाते चलो."
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