और इन सबके बीच मुझे याद आ रहा 80 का वो दशक जब 6ठी कक्षा में रही होउंगी ,तभी बाबूजी का तबादला पटना हुआ था. तब का समय था जब अमीरियत का पैमाना लोगों के छत पर लगे टीवी के एंटीना से होता था और दूसरा वो लोग अमीरी में गिने जाते थे जिनके घर कोई व्यक्ति 'बाबू' के ओहदे पर होता. छोटे थे समझ में आता नहीं था की आखिर 'बाबू' ऐसा कौन सा ओहदा था जिसको लोग खासे नजर से देख रहे थे . बाबूजी बी तो एक gazetted ऑफिसर ही तो थे पर हमारी स्थिति तो बहुत आम लोगों सी ही थी. पर यहां तो हर महकमा ही गलत रूप से पैसे कमा रहे थे_'बाबू' यानी सचिवालय या यूनिवर्सिटी का किरानी जिसे हज़ार बहाने थे पैसे कमाने के, 'प्रोफेसर' यानी कालेज एवं यनिवेर्सिटी के शिक्षक जो की पीएचडी लिखने, नोट्स तैयार करने ,पेपर लीक करने और नम्बर बढ़ाने में पैसा कमा रहे इसी तरह और किस किस की बात करें.......
शायद ईमानदार परिवार के बच्चों ने जो असन्तुष्टि का माहौल जिया शायद उसी से उनमे विद्रोह की भावना तो आई पर दिशा गलत थी. .........
....... क्रमशः
@Ajha.14.11.16
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