Monday, 21 August 2017

डूबता सूरज,नया सवेरा

डूबता सूरज
सवेरे की ओर
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"मम्मी आप कहाँ खो गए !!! आपका नाती आपसे कुछ बोल रहा है..."
" नहीं नैना, बस ऐसे ही .जब कभी 'घरेलू हिंसा' की खबर अखबार में पढ़ती हूँ, फिर से अपना अतीत सामने नाचने लगता है..." शीतल अभी कुछ कहना चाह ही रही थी कि बिल्कुल खामोश हो गई.उसे जैसे चारों तरफ से अतीत की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं_
"बहुत हो चुका ये तुम्हारा डराना धमकाना...
बस अब और नहीं..."
"तुम्हारी हिंसाओं को कब से सहती आ रही हूँ....यह मत समझना कि मैं कमज़ोर हूँ... तुम्हारी ताकत को देख डर गई ..."
"बहुत हुआ अब तुमसे विदा लेने का समय आ गया. पर जाने से पहले जो तुम्हें बता रही हूं, मेरी बातों को ध्यान से सुनना.जानना चाहोगे मैंने तुम्हारी ज्यादतियों को क्यों सहा...???"
"जानना चाहोगे इस "क्यों" को...शायद अब भी तुम इसके लिए तैयार नहीं...पर अब मैं  तुम्हें हर वो बात बताती हूँ जिससे तुम अनभिज्ञ रहे...
ऐसी बात नही थी कि सोचूँ 'लोग क्या कहेंगे'
और यह भी नहीं कि तुम मेरे पति हो तो तुम्हारी बदतमीजियों को बर्दाश्त कर लूं...
तुममें मेरे और मेरे परिवार के प्रति हमेशा से हीन भावना थी  जिसे तुम छिपाने की कोशिश करते रहे.जो तुम्हारे पुरुषत्व को ठेस पहुचाती रही.मेरा हमेशा समाज में प्रशंसा पा जाना तुम्हारे अहं को ठेस पहुंचाता रहा.मैं इन बातों को भलीभांति समझती थी.तुम मुझे उकसाना चाहते थे ताकि मैं भी भड़कूँ और मुझे तुम बदनाम कर दो ...."
"परन्तु इन सब से अलग, मैंने तुम्हारे प्यार को पढ़ लिया था.तुम्हारी उस भावना को भी समझ चुकी थी कि तुम खुद को मेरे काबिल नहीं समझते थे और चाहते थे कि किसी भी प्रकार मेरे संग न्याय हो..."
"मैंने बेशक तुम्हे पति के रूप में पाया परन्तु तुम्हारे वहशीपन को सहा भी,क्योंकि मैं तुम्हारे भीतर दबे इंसान को बाहर लाना चाहती थी.तुम्हें इंसान बनने में मदद करना चाह रही थी....."
" शायद  यह मेरा असफल प्रयास था .अब मेरे उम्मीद का सूरज डूब चुका है."
"अच्छा तो मैं चलूं....!!!"
"नहीं!!! बिल्कुल नहीं."
हाथ जोर से पकड़ शीतल का पति भावुक हो बोला_"तुम्हारी इस घर को जरूरत है...
कभी छोड़ कर मत जाना."
Aparna Jha
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