नही ,बस और नहीं ,मुझे नहीं लिखना और मुझे नहीं जुड़ना किसी से भी," आज रीता अपनी बातों पर जैसे जिद्द कर बैठी थी. सीता औए गीता के लाख मनाने पर भी रीता अपनी मनमानी पर तुली थी.
रीता स्वभाव से निर्मल ,दोस्ती निभाने वाली भावुक साहित्यकार थी.अपने बातों को सटीक रूप में रखने के लिए मशहूर, फिर उसे उसका खामियाजा ही क्यों ना भुगतना पड़े. सीता एवं गीता उसे ,साहित्यकार होने के कारण मित्र मिले थे, और ना जाने किस तार से जुड़े कि दूरियां कोई मायने नहीं रखती. ऐसे में नित्य इन तीनो के बीच साहित्य की महफ़िल चल पड़ी और देखने वाले भी हैरान- परेशान. एक दिन ऐसा भी आया जो इनकी दोस्ती एक अनजान राजनीति की शिकार हुईं.
खुशियां जो सीता और गीता के हिस्से आई पर वह उन खुशियों की अनुभूति नहीं ले पा रहे थे,सिर्फ कारण यह कि रीता के साथ ज्यादतियां हुई. अब सीता और गीता एक तरफ तो रीता के साथ रही और दूसरी तरफ साहित्यिक मार्ग से अपनी बातों को साहित्यिक पटल पर तक तब तक रखती रहीं जबतक कि लक्ष्य में उन्हें सफलता ना मिली.दूसरी तरफ प्रेम के मोह पाश जो कि पवित्र और निःस्वार्थ थे ,भला गीता कब तक अपनी जिद्द पर अडी रहती, अपने दोस्तों में फिर से मिल गई.
आज साल का अंतिम दिन ,सर्दी की धूप में अलसाये
मंद मुस्कान लिए गीता सोच रही ,दोस्ती तो कइयों से बनती हैं पर असलियत से परिचय कराने वाले दोस्त शायद कुछ के ही नसीब में होता है , आज शायद कितने प्यारे दोस्तों को मैं खो देती यदि अपनी अकड़ पर रहती.@Ajha.27.12.16
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