"सोच बदलना होगा ......"
हम ऐसे क्यों हो गए कि गेरुआ वस्त्र से घृणा करने लगे , उसमें छुपे सादगी और वैराग्य को और तपस्या को क्यों नहीं देख पाते. हम अपनी पूर्वग्रसित भावनाओं से इस प्रकार क्यों ग्रसित हो चुके हैं कि एक व्यक्ति को खुद को साबित करने का अल्पावधि भी नहीं देना चाहते? कहीं हम अपने विचारों में इतने कमजोर तो नही हो गए कि सहिष्णुता ही समाप्त हो गई.
हांलांकि स्वामी विवेकानंद या पूर्व प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का नाम लेना यहाँ उचित नहीं पर यहां जिक्र करना तो जरुरी है. स्वामी विवेकानंद जी को अपनी बातें बताने और देश को विश्व पटल पर गौरवान्वित करने के लिए अपने व्यक्तित्व और पहनावे के संग कभी भी समझौता नहीं करना पड़ा था .यही बात हमारे शास्त्रीजी पर भी लागू होता था. उन्होंने सादगी में जिस प्रकार से जीवन व्यतीत किया, 'जय जवान जय किसान 'का नारा देने वाले इस महान व्यक्ति की सादगी देखते ही बनती थी.यदि यूपी के लोगों ने अपना विश्वास मत जता दिया है, तो क्या ये उचित होगा की अपने पूर्वानुमानों एवं पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो पांच साल में क्या होगा उसके नतीज़े
आज ही निकाल दें.
मैं आशान्वित भी हूँ और उम्मीद भी यही करती हूँ कि काश भारत का भगवा रंग अनेकता में एकता का रंग बना के दिखाये और जिसकी छत्रछाया जाति-धर्म-वर्ग बिलकुल व्यक्तिगत मामला हो. ईसाई अपने ईसाई होने पर गर्व करता है, मुसलमान भाई अपने मुसलमान होने पर फक्र करते हैं , पर हिन्दू अपनी सोच में इतने बँटे क्यों हैं. क्यों हिंदुत्व की बातें करना दंगा फैलाने की बात से जुड़ी है?
याद रखें धर्म की बातें लोगों को जोड़ती है तोड़ती नहीं. स्वतंत्रता संग्राम में जब तक अपने-अपने धर्मों से जुड़े रहे और इन्हें भारत का अंग माना एकता बानी रही और हमने स्वतंत्रता भी पाई. परन्तु अंग्रेजों के 'फूट डालो राज करो' की नीति में फँस देश दो भागों में बाँट गया. अँगरेज़ देश छोड़ कर चले तो गए पर उनकी सोच हम पर आज तक हावी है.
@Ajha.20.03.17
अपर्णा झा.
Wednesday, 23 August 2017
सोच बदलने होगा
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