समय की पटखनी
मां को हमेशा अपने पति और बच्चों के लिए ही जीते देखा.कभी ना खुद का खयाल ना खुद के हालात पर कोई नज़र.बस यही के बच्चे ठीक प्रकार से रहें, स्वस्थ जीवन जीये और अपने भविष्य को कामयाब बनाये.मां पढ़ी-लिखी नही होने के बावजूद परिवार की भावनाओं और आवश्यकताओं को खूब समझती थी साथ ही 'सामाजिकता' भी जरूरी है इसका भी उन्हें ज्ञान था.परंतु इतना सब करते हुए भी पति के ताने की तुम क्या जानती समझती हो???बच्चे कहते "मां तुम्हे क्या पता,तुम्हारी दुनिया है ही कितनी बड़ी..." और जब बहुएं तो उन्होंने भी कसर कोई छोड़ा नहीं. मां मैन ही मन बच्चों को दुआऍं देती की अस्तित्व को लेकर मैं जो जीवन जिया, हे भगवान ! मेरे बच्चों को वो दिन ना देखना पड़े....."
पर यह क्या ??? कभी बेटी ,कभी बहु उन्ही तानों और व्यंगों का दुखड़ा ले मां से अपनी गुहार लगा रही....
मां हैरान .ये क्या हुआ ??? मान लिया कि मैं पढ़ी लिखी नही,दुनिया नहीं देखी परन्तु तुमलोग तो ...."
"समय में परिवर्तन नहीं या बच्चों का पालन नही सही????
या ये समय की पटखनी"
Aparna Jha
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