Monday, 21 August 2017

गुलज़ार

आज गुलज़ार साहब के जन्मदिवस पर मैं उनकी और उनके लेखनी को चश्मे- बद्दूर कहूंगी और चाहूंगी की उनकी उम्र में दिन - दूना , रात चौगुना इजाफा हो . उनकी ये कविता " मैं इस जमीं पे भटकता रहा सदियों तक "  में नजाकत, नफासतऔर सख्ती का क्या मेल समझाया.

जब छांव छांव चला था अपना बदन बचा कर
कि रूह को एक खूबसूरत जिस्म दे दूँ
न कोई सिलवट .न दाग कोई
न धूप झुलसे, न चोट खाएं
न जख्म छुए, न दर्द पहुंचे
बस एक कोरी कंवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ, रूह को मैं मगर तपी जब दोपहर दर्दों की, दर्द की धूप से
जो गुजरा
तो रूह को छांव मिल गई है .
बस अजीब है दर्द और तस्कीं [शान्ति ] का साँझा रिश्ता
मिलेगी छांव तो बस कहीं धूप में मिलेगी ...
        __ _ _ _ गुलज़ार

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