Wednesday, 23 August 2017

चाह

"चाह"

         " शाम्भवी कहाँ हो तुम ? इतनी ठण्ड में एक कप चाय तो बनता है"_ दो दिन से बीमार की अवस्था में बिस्तर पर पड़े -पड़े शिवम तंग आ चुके थे और फिर आज क्रिसमस का दिन , भला कौन अपने आप को रोक सकता था.
" ये लो चाय, और भी कुछ चाहिए तो बता दो , घर के सारे काम निपटाने हैं"_ शाम्भवी ने कहा.
"चाय तो अच्छी बनी है,चलो इसी ख़ुशी में आज तुम्हें बाहर कहीं घुमा लाता हूँ , वैसे भी आज क्रिसमस का माहौल है,अच्छा लगेगा..."शिवम् ने कहा.
       शाम्भवी ने शिवम् की बात मान तैयार होने चली गई.
शिवम् ने भी गाडी निकाली और फिर दोनों इस कड़ाके की ठण्ड में भी घूमने निकल पड़े.गाडी में दोनों शांत बैठे गुलाम अली की ग़ज़ल का लुत्फ़ ले रहे. तभी एक स्कूटर पर पति-पत्नी और गोद में छोटा सा बच्चा, माँ से चिपका हुआ. तभी शाम्भवी चुप्पी तोड़ते हुए_
"देखो इतनी ठण्ड में भी......."
"क्यों क्या तुमने ये दिन नहीं देखे ??? तुम ने भी तो इस तरह से........" शिवम ने शाम्भवी की और देखते हुए कहा.
हाँ ,सच ही तो कहा था शिवम ने. वो कड़ाके की ठण्ड हो या फिर तीखी धूप, नश्तर चलाती हुई, बारिश का मौसम कभी बादल -बिजली  की गर्जना डरा जाता तो कभी मूसलाधार बारिश में भीगते हुए ही शिवम् को अपने नौकरी के सिलसिले में दूर -दूर की भाग-दौड़ में ही तो देखा था शाम्भवी ने. पर उन दोनों ने कभी किसी बात की एक दूसरे से शिकायत नहीं की.
शाम्भवी _"याद है ऑफिस से वापिस लौटते हुए कैसे पहले तुम पार्क में मुझे ढूंढते, मेरी सहेलियों का तुम्हें देख लेना ,फिर मुझे छेड़ना और उनका मुस्कुराना तुम्हारे चेहरे को सुर्ख कर जातीं. वहां से फिर तुम मुझे किसी रेस्तरों में ले जाते. ऐसा करना ,तुम्हारा हमेशा की दिनचर्या ही हो चली थी. और सच पूछो तो तुम्हारा ऐसा करना मुझे भी भाता था. सर्दियों और बारिश के मौसम में समोसा और गुलाब जामुन ,गर्मियों में स्पंज रसगुल्ला लगभग तय सा ही था."
शिवम शांत मुद्रा में गाड़ी चलाते हुए शाम्भवी की बातें चुप चाप सुन रहा था . तभी फिर से शाम्भवी_
"आज हम यहाँ तक पहुंचे हैं , भगवान् का दिया सबकुछ है पर वो ख़ुशी ......! आज हर बात में तुलनात्मकता का आभास हो आया .ख़ुशी हो या दुःख उसके भी पैमाने तय हो गए हैं _छोटी और बड़ी में"
शिवम ने थोड़ी हामी तो भरी परन्तु चुपचाप ही रहा.
शाम्भवी_ शायद .....शायद तब की ख़ुशी में हमारे और तुम्हारे सिवा और कुछ भी ना था.शायद हमने एक दूसरे को पाने को ही जन्नत की ख़ुशी मानी थी.हमारी दुनिया हमारे-तुम्हारे वजूद से थी. वहां भविष्य की चिंताएं , प्रतिस्पर्धा की मार इत्यादि जैसे शब्दों की छुअन मात्र भी ना थी. हम अपनी दुनिया के शहंशाह भी,हुक्मरान भी. और आज ये .........
क्या आप भी ऐसा ही सोचते थे/हैं जैसा कि मैं...."
शाम्भवी ने उत्सुकतावश पूछा.
शिवम ने शाम्भवी के चेहरे को देखा तो जरूर पर वह फिर भी चुपचाप गाडी चलाते हुए..........
©@Ajha.30.12.16

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