मौन : समस्या या समाधान
'मौन' की बात करें तो यह कहा जा सकता है कि यह चेतना की अवस्था है जहां व्यक्तिगत भावनाओं पर अंतर्मन का स्वीकार या प्रतिकार जताने की प्रक्रिया है.अगर मैं अपनी राय की बात करूँ,तो, मुझे लगता है 'मौन' शब्द में इतनी गहराई है कि अधिकांशतः इसका प्रयोग ही गलत हो जाता है. बहुत बार यह भी कहा जाता है कि बहुत सारी बातों के फसाद की जड़ संवाद है और इसके प्रतिउत्तर में मौन रहने को सही माना गया है. मेरे विचार में यह तर्क एक हद तक सही हो सकता है परंतु हमेशा नही.
मैं मौन को एक सकारात्मक अभिव्यक्ति मानती हूं .मौन मेरे लिए वह स्थिति है जहां सांसारिक सुख,दुख परिस्थितियां,भौतिकता सब विलीन हो जाते हैं और आप एक शून्यता की अनुभूति करते हैं जो आपको परमसुख से साक्षात्कार कराती है.आप चाहे अकेले हों या भीड़ में ,पर आप अपनी मौन की अनुभूतियों में आनंदित होते रहते हैं.
अगर अपनी बात करूं तो कह सकती हूं कि मौन रहने की अवस्था को मैंने अक्सर महसूस किया है.
मैं जब कभी मंदिर की आरती सुनती हूँ या सुंदर गायन अथवा धुन तो, गुनगनाने के बजाय मौन रहने का सुख भाता है,गले से जैसे आवाजें निकलनी बन्द हो जातीं हैं शब्द गूंगे होने लगते है ,और बस आनंद से ओत-प्रोत मुस्कान तो कभी आंखें अश्रुपूर्ण हो जाती तो कभी-कभी रोंगटे भी खड़े होने लगते. ऐसा ही आनंद मुझे मेरे अपने साहित्य-साधना में भी दीख पड़ती है.
जहाँ तक मौन को समस्या एवं समाधान के रूप में देखें तो आज के समाज में मौन रहना समस्याओं से भागने अथवा दूर रहने या डर कर रहने का अस्त्र माना गया है.दूसरा कारण यह कि समाज ऐसी विषम परिस्थितियों से गुज़र रहा है कि यह खुद को समझा पाना बहुत कठिन है कि मौन की अवस्था क्या होनी चाहिए.
संसार में रह जो सांसारिक माया मोह से मुक्ति पा जीवन व्यतीत कर रहा हो वही सकारात्मक मौन की अवस्था को जी सकता है और ऐसे व्यक्ति के लिए 'मौन' ना तो समस्या है औए ना ही समाधान ,बल्कि जीवन जीने की एक अवस्था है.
@अपर्णा झा
11.06.17
फरीदाबाद.
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