Monday, 21 August 2017

ज़माना बदल रहा है

"ज़माना बदल रहा है..."

पैसों में क्या रिश्तों को खरीदा जा सकता है ???
हाँ....
आजकल हम और आप कर ही क्या रहे हैं... अपने बच्चों की अभिलाषाएं पूरी करते-करते उन्हें  भावना विहीन एवम विवेकहीन बनाते जा रहे हैं, जहां ना तो बच्चों को संबंध के प्रति कोई ममता है और ना ही प्रेम के लिए कोई कोना खाली है....
बस आडम्बरों में हम जिये जा रहे हैं....
विवाह पर करोड़ों का खर्च...
जन्मदिन पर बेशुमार खर्च...
बाज़ारवाद पर दुनियाभर के खर्च....
पर उसके बाद क्या....

एक विवाह पर करोड़ों का खर्च और सौ दिन का भी संबंध नहीं...
जिम्मेदार कौन????
रिश्ते की नींव डालने, सवारने और मजबूती की सीख के लिए भी कोई संस्था खोलनी पड़ेगी....

बच्चों के जन्मदिन में पैसों का बेतहाशा खर्च, परन्तु इस आयोजन से निष्कर्ष क्या ...?
किसने कितने महंगे तोहफे दिए और बदले में क्या तोहफे मिले...!!!

क्या कोई बच्चों को इसकी वास्तविकता से अवगत कराता है ? क्या ऐसे समय में बच्चों को संबंधों और आशीर्वादों का महत्व बताया जाता है???

क्या ये बेहतर नही होता कि बजाय आडम्बरों में खर्च किये बच्चों को रिश्तों में जीना सिखाया जाय,उसके मौलिक कर्तव्यों का ज्ञान उसके परिवार के लोग दें. घर में साथ बैठ समय गुजारें उनकी बातों को सुने, समझें और उसकी प्रकृति को समझने की कोशिश करें.

आज के बदलते परिवेश में समाज में जो उथल पुथल का माहौल है उसमें परिवार भी जिम्मेदार है.

शिक्षा का महत्व यह है कि  व्यक्ति शालीन,संस्कारवान,सहिष्णु,
मर्यादित, आत्मनिर्भर और रिश्तों की नजाकत को  समझते हुए उसका भलीभांति निर्वहन करे.

.....और यह पाठशाला जीवनपर्यंत चलती ही रहती है सबों के लिये. आवश्यकता है आंख कान खोले रहने की और खुद में ग्राह्यता की विशेषता को बढ़ाये रखने की.
Aparna Jha

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