Wednesday, 23 August 2017

रूहानियत

"रूहानियत"
''मन' कभी भौतिकता का मोहताज़ नहीं होता.उसकी तो खुद की बनाई हुई एक इबारत है जो कल्पनाओं के शीशमहल सा तो दिखता है पर उसके लिए इस इबारत की नींव बहुत पक्की और सुकूँ बख्श भी. कभी ख्वाबों का रूप ले,कभी खयालों के नाम से, कभी खुद का साया लगे....कल्पनाओं के ही तो रूप है जिसे पकड़ पाने,संजो लेने की ख्वाहिश ही तो 'मन'की दुनिया के कारनामें हैं.प्रकृति इस 'मन' की सहेली बन उसे दुलारती है,पुचकारती, छेड़ती,चिढाती हुई और ना जाने इस 'मन' कि वीणा के कितने ही सुर छेद देती है,बिखेर देती है.ये धरती,आकाश,नदी,झरने , बादल-बिजली , वनस्पति ना जाने इस 'मन' के कितनी ही बातों का गवाह बन जाते हैं.इस 'मन' की एक आदत है, वह हमेशा ही
एक अधूरेपन में खुद को देखता है और ख्वाबों -खयालों से उसे पूरा कर एक अजीब सी खुशी पा जाता है......क्या नाम हो इस खुशी का.......इस दुनिया का ???
कहीं यही 'रूहानियत' तो नही......
दुनिया चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारे.
@Ajha.31.03.17

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