"उजाले की ओर...."
(विषय पर आधारित)
आज बहुत दिनों के बाद चाचा- चाची के चेहरे पर मुस्कुराहट दिखी. एयरपोर्ट से सीधे हमारे घर पर ही आये थे. चाची आते ही मां के गले लग खुशी से रोने लगी. "रचना मेरा बेटा वापस मुझे मिल गया.उसने मुझे 'माँ' बोला और माफी भी मांगी. अपने पिता के समक्ष ,अपने किये पर बहुत पछता भी रहा था."
हुआ यूं था कि चाचाजी अपने जमाने के विद्वान IAS अफसर हुआ करते थे.लोगों के बीच अच्छी-खासी शोहरत भी थी.उनका एकमात्र बेटा जिसे बड़े अरमानों से पाला-पोसा था. ज्ञान के मामले में वह बड़े होने तक पिता को पीछे छोड़ चुका था. एक से एक कम्पनियों के उच्च अधिकारी का कार्य भर भी उसने संभाला था. परन्तु इन सब के बीच उसकी गलत संगत ने उसे नशेबाज बना दिया था. उसकी दिन पर दिन हालत ऐसे बिगड़ती गई कि ना उसने अपना परिवार बसाया और निरंतर मां बाबूजी के टोकने से तंग आ उन्हें भी छोड़ कहीं दूसरे देश में रहने लगा. जब कभी मां -पिताजी उससे जबरन मिलने भी चले जाते तो भला-बुरा सुना कर अगले ही दिन उन्हें वापस भेज देता. आज उसकी ऐसी हालत हो गई थी कि ना ही नौकरी , ना पैसा, न घर ,नाहि दोस्त कोई पहचानने को राजी थे. जब चाचा-चाची को इस बात का पता चला तो डरते ही सही फिर से अपने बेटे के पास चले गए.परन्तु इस बार उनके बेटे की आंखें खुली .वह सोच रहा था_"जिन लोगों पर उसने पैसे लुटाए थे जिस दुनिया को उसने अपना समझा था वह तो मिथ्या थी." भावुक हो रोने लगा_
"बाबूजी आपलोग अबतक हिम्मत नहीं हारे....!!!"
"मैं तो सोचता था कि आपने मुझे अबतक तो भुला दिया होगा.पर ये मैं क्या देख रहा हूँ...???आपलोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट !!"
"हाँ बेटा, हमें जो अपना बेटा वापस मिल गया.चाहा तो था कि तुम्हारे रास्ते में उजाले ही उजाले हों पर कुछ देर के लिए तुम अंधेरे में चले गए....पर अब जो लौटे हो मेरा विश्वास है कि अब तुम्हारी राहों में दोगुने उजाले होंगे और अब अंधियारा कभी तुम्हें छू भी नही पायेगा"
चाची के आंसुओं के धार थमने को ही नहीं आ रहे थे, तभी माँ ने चाची को संभालते हुए
कहा_ दीदी , अंधियारा कभी हमेशा के लिए तो नहीं होता,अमावस भी तो सिर्फ पंद्रह दिनों की होती है....अच्छा चलो रास्ते की थकान होगी, मुंह हाथ आपलोग भी धो लो, मैं तबतक चाय बना लाती हूँ...
Aparna Jha
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