Wednesday, 23 August 2017

लाल बत्ती,नीली बत्ती

" लाल बत्ती-नीली बत्ती"

कल सुबह जब मैं अखबार के पन्ने  पलट रही थी(आजकल पढ़ना कहां होता है☺)तो एक सुर्खी पर नज़र आ कर रुक गई.वो शायद प्रधान मंत्री जी का गाड़ियों पर लाल बत्ती लगाने पर रोक की कुछ बातें थीं.अनेकों प्रकार के भाव में मन में आने लगे.कभी सोचती की चलो इन VIP गाड़ियों के चलन पर रोक से शायद रोड के जाम की स्थिति सुधर जाए.फिर मन यह सोचता कि उन हस्तियों का क्या होगा जो काम करने से अधिक इन बत्तियों वाली  गाड़ियो में भ्रमण  से ज्यादा खुश होते हैं.अपनी शक्ति प्रदर्शन का यह  एक विशेष अस्त्र भी तो है. आते जाते सड़कों पर लोगों को पता भी तो लगता है कि इस  गाड़ी में बैठा आदमी कोई VIP होगा.
                  खैर,चलिए इन सबसे अलग आपको एक किस्सा सुनाती हूँ. मैं जिस जगह नौकरी करती थी वाः सरकारी फंड पर चलने वाली संस्था थी और उसके बोर्ड के मनोनीत सदस्य राजनीतिक महकमे से ही होते थे. बात ऐसी हुई कि जो डायरेक्टर उस संस्था की थीं वाः किजी और पार्टी द्वारा मनोनीत की सालों से अपने पद पर काम कर रही थीं . तभी सरकार बदली और वहां की chair person भी बदल गईं. अब इन मोहतरमा को किन्ही कारणवश अपने पद के हिसाब से जो गाड़ी की दावेदारी थी वह मिलने में जरा देर क्या लगी.मोहतरमा ने तत्काल अपनी शक्ति प्रदर्शन दिखा डाला. ऊपर के महकमे को फोन घुमाया और समय सीमा निश्चित कर डाली की मुझे इतने समय में इस पते पर गाड़ी खड़ी  होनी चाहिए. गाड़ी खड़ी होने की तो बात छोड़िए , गाड़ी आई भी ,वह भी नई. इतना ही नहीं हुआ उस गाड़ी पर नीली बत्ती भी लगी ताबी और ड्राइवर भी.
                    उस पद की गरिमा के लिए उस बत्ती की जरूरत थी या नहीं इसे बताना कुछ जरूरी जान नही पड़ता , पर यह बताना भी जरूरी है कि वो एक दौर भी देखा था हमने जब खुल के तो बोल नही सकते थे 'अंधेर नगरी, चौपट राजा' और मन बड़ा ही उदास और खिन्न रहता था कि इन्ही दिनों को देखने हमने अंग्रेजों से आज़ादी पाई थी. पर आज जो देखने को मिल रहा है वो कोई दिवा स्वप्न से कम नहीं.हमने तो उम्मीद का दामन ही छोड़ दिया था.आज इतने सालों से घुन लगे तंत्र में एक प्रतिशत भी उम्मीद की किरण दिख परदति है तो वह भी स्वागत योग्य है, चलो शुरुआत तो हुई कहीं से.
                 अब जो आम आदमी जागा है, है भगवान इन्हें ऐसे ही जगाए रखना.सत्ता और देश की मजबूती अकेले एक आदमी के सोचने से नही होता, अपने अहम को छोड़ देश हित पर ध्यान देना होता है क्योंकि तरक्की जो करेगा देश तो खुश रहें उस देश के नागरिक. जरूरत है तो थोड़ा सोच बदलने की.

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