Monday, 21 August 2017

मीरा

"मीरा"
(विषय के अंतर्गत)

घर के बगल का घर 'अस्तित्व निवास'_ ना जाने कितनी बार दिन भर में मैं उस नाम को पढ़ जाती.उस घर की एक बूढ़ी दादी और प्यारी पोती, उन्हें शायद खुद के करीब पाती,इसलिए वह पड़ोस का घर मेरे लिए आकर्षण केंद्र बन चुका था. 'मीरा', हाँ यही तो नाम था उस बच्ची का.शायद परिवारवाले सभी कृष्णपंथी थे और इस कारण ही उस बच्ची का ये नाम रखा गया होगा.मीरा हमेशा दादी में ही सिमटी रहती थी और दादी मीरा से.ना जाने कितने ही कृष्ण भजन और किस्से-कहानियां दादी के मुख से सुने थे और मीरा को कंठस्थ भी हो गए.
बचपन में तो शायद कोई भी नही जानता होगा कि मीरा आगे चलकर कैसी होगी, पर जो बातें वो मुझसे करती उसमें हमेशा इतना जरूर कहती_"चाची मुझे मीरा का प्रेम बहुत भाता है मेरी भी कोशिश रहेगी कि जीवन में अपने ऐसा प्रेम कर पाऊं..."
मीरा ने अपने जीवन में जितनी भी दोस्ती और रिश्तेदारी निभाई , लोगों में इस बात की प्रशंसा होती रहती.हर कोई कहता जिस घर वो जाएगी उस घर में बरक़त ही बरक़त रहेगी.
विवाह हुआ... बच्चे हुए....एक परिवार और उससे नए संबंधी जुड़ते गए.अपने प्रेम की उस परिभाषा के चरम की सोच लगता था मानो भगवान भी उसकी जांचना ही कर रहा हो.सुख तो शायद कम ही नसीब हुआ हो परन्तु कितनी ही परेशानियों_अन्न-धन की कमी,व्याधि(मौत से जूझती),व्यसन (गलत रास्ते पर कभी पति तो कभी बच्चे) से जूझते  हुए भी मीरा कभी अपने दायित्वों के निर्वाह में थकी नही. शायद ही अपनी खातिर कभी उसने चैन और आराम की सांस ली हो.
कई सालों बाद वह आपने मायके आई हुई थी .आज मुझे से भी मिलने आई .मेरे आस पड़ोस की दो परिचित वृध्दा भी मेरे सं ग बैठी थी.अब मैं बूढ़ी और वो अधेड़ वयस की हो गए थे. बातों का दौर चलता रहा, तभी मेरे मुंह से निकला..."और बताओ तुम्हारी वो मीरा ...कहां तक पहुंच पाई....."
"अरे चाची आपने मेरे दुखते तार को फिर से छेड़ दिया....आखिर मैं भी इंसान ही ठहरी....मीरा तो बनने की कोशिश की और बनी भी ,परन्तु मेरे लिए ना बाल गोपाल नाहि नंदलाल और नाहि कोई कृष्ण हुआ..."
तभी उनमें से एक वृध्दा ने मीरा के कंधे को सहलाते हुए_
" बेटी ये गृहस्थ आश्रम है जहां मीरा तो हर कोई चाहता पर कृष्ण मिलना असंभव....तुम अपनी जिम्मेदारियों से ही अपनी खुशी तलाशो...शायद उन्हीं में तुम्हें तेरे कृष्ण मिल जाएं."
Aparna Jha.

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