"अशांति"
(विषय चित्र पर आधारित)
"वकील दीदी, आज आप इतनी उदास क्यों बैठी हो? आपके पास तो हर सवाल का जवाब होता है."
"अरे नहीं रे शिवा ! हर बात का जवाब देना या पा जाना हमेशा मन को सुकून नहीं देता.
कभी-कभी ज़मीर भी आपसे सवाल कर बैठती है..."
"तो आज फिर ऐसा क्या हुआ वकील दीदी..."
"अरे कब तक हम अपने कानून को कोसते रहेंगे और न्याय की गुहार लगाते रहेंगे.नारी जगत की समस्याएं कोई एक है जो सुलझ जाए और फिर ये नई तरह की समस्या खड़ी!!! किन-किन बातों को ले समाज को जिम्मेदार ठहराया जाय!!!"
"अब तक तो हम कन्या शिक्षा पर जोर दे रहे थे कि 'बेटी पढ़ाओ देश बनाओ', पर क्या पता था कि बेटी पढ़ाने से सब उल्टा ही हो जाएगा.... "
"आज का अखबार देखा .... सर्वोच्च न्यायालय का आदेश .... अब दहेज उत्पीड़न के मामले में सीधे -सीधे लड़के और उसके परिवार वालों को कोई गिरफ्तार या जेल नही भेज सकता. आजकल एक नया पेशा चल पड़ा है, अधिकतर केस में लड़की या उसके परिवारवाले पैसे वाले शरीफ लड़कों को विवाह का झांसा देअपनी बेटी से विवाह करा गलत बातों के लिए कानून के जाल में फंसा देते हैं और यही उनकी कमाई का जरिया है."
"हे भगवान!!!"
" इतना ही नही, आजकल तो बेटियों के माँ-बाप अपने बेटियों का घर ही नही बसने दे रहे.इतनी धूम-धाम से विवाह होती है.महीने-दो महीने में बेटी घर वापस.....
कारण...घर के काम-काज में हाथ बटाना ना ही नव वधु को और ना ही उसके मां बाप अच्छा नहीं लगता. उन्हें यह पसन्द नहीं कि उनकी पढ़ी-लिखी बेटी ससुराल के कामों में हाथ बटाये....सास ससुर को को अपने साथ सम्मान पूर्वक रखे."
शिवा की मां जो वहां बैठे-बैठे सारे संवादों को सुन रही थी, बोल पड़ी....
"कहां तो हम अपने देश की दुहाई दे रहे थे कि आज़ादी के इतने सालों में इतनी प्रगति के बावजूद हम महिलाएं कैसी-कैसी परिस्थितियों से जूझ रहे हैं....कोई सुनने वाला ही नहीं..... हमें क्या पता कि बेटियों के दुश्मन उसके मां बाप भी कम नहीं , जो इनको शिक्षित कराने का दम तो भरते हैं पर रिश्तों को समझने की सीख भी नहीं देते और नाहि उनका घर बसने देते...
"हायराम ! कैसा ये जमाना आ गया....बेटी ससुराल में मान पाई भी तो माँ-बाप के अंध प्रेम की बलि चढ़ी...सच में कलयुग ही है,घोर कलयुग.....!!!"
Aparna Jha
स्वरचित,मौलिक रचना.

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