Thursday, 24 August 2017

क्या आलोचना और समालोचना एक ही हैं ? आलोचना का स्वरूप कैसा होना चाहिए ?

​ क्या आलोचना और समालोचना एक ही हैं ? आलोचना का स्वरूप कैसा होना चाहिए ?

आलोचना अपने आप में नकारात्मक नहीं बल्कि कालांतर में इसका दुरुपयोग ही आलोचना के स्वरूप को नकारात्मक कर दिया है. आलोचना और समालोचना किसी व्यक्ति विशेष , तथ्य  या विषय पर समीक्षा का तरीका है. 

       आलोचना में किसी विषय में व्याप्त खामी को उजागर किया जाता है , उद्देश्य उसके गुणवत्ता को बढ़ाना होना और उसे सही तौर पर लक्ष्य तक पहुचाना होता है.

        जहां तक समालोचना की बात आती है तो यहाँ किसी विषय के गुण और दोष दोनों की चर्चा की जाती है , लक्ष्य यही कि,उस विषय पर सही निर्णय  लेने के वक्त दोनों ही तर्क (पक्ष और विपक्ष) मददगार साबित हों.

*आलोचना वही व्यक्ति सही कर सकता है जो अमुक विषय पर पूरी जानकारी रखता हो और समसामयिक स्थिति में विषय की महत्ता को समझता हो और किसी भी विचारधारा से  प्रभावित ना हो ,यानी, तटस्थ हो कर अपनी बात रख सकता हो(हालांकि ऐसा होना एक अपवाद ही होगा).

आज की परिस्थिति में आलोचक हर कोई है जबकि समय की मांग समालोचकों की है@Ajha.22.12.16

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