Monday, 21 August 2017

राजनीति

"राजनीति"

शाम के समय नीलू अपने बालकोनी में सास के संग चाय की चुस्कियां ले रही थी कि तभी उधर से जाते हुए दोस्त शीला पर नज़र गई. नीलू ने आवाज़ लगाई _"बड़े दिनों के बाद दिखी हो, क्या बात है??? "
"नहीं शीला, ऐसी तो कोई बात नहीं.... बस बेटे ने इन दिनों परेशान कर रखा है..."
"अब क्या हुआ!!! तब तक तो उसकी बारहवीं कक्षा को लेकर परेशान थी....अब तो वह  मेडिकल भी पास कर के आने वाला है....अब काहे की परेशानी !!!"
"शीला मेरा बेटा कहता है कि मैं डॉक्टर नहीं, अपना भविष्य राजनीति में देख रहा हूँ. अभी राजनीति में साफ सुथरे छवि के लोगों की आवश्यकता है. मैं देश और समाज की सेवा करना चाहता हूं...."
"हे भगवान, उसे ऐसा ही करना था तो फिर मां-बाप के इतने पैसों और उम्मीदों पर पानी क्यों फेरा...???"
"क्या कहूँ शीला....इन बीच के सालों में उसने बड़े-बड़े कितने ही राजनीतिक विचारकों को पढ़ गया और उनके ही जीवनी से प्रभावित हो गया है. हमारी तो कुछ समझना ही नहीं चाहता...."
"उसे बताते हुए थक चुकी हूँ कि अपनी साफ-सुथरी छवि बनाने के लिए जीवन पर्यन्त आपादमस्तक खुद को कीचड़ में ही गुजरना होता है...." शीला की सास चुप-चाप सब सुन रही थी कि तभी अचानक बोल पड़ी....
"बिल्कुल सही कह रही हो बेटा. राजनीति पढ़ना कुछ और होता है और राजनीति को भविष्य बनाना कुछ और....
ये वो दलदल है जो गंगा को  मैदान पर आते ही कभी साफ रहने ही नहीं देती...."
Aparna jha



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