Thursday, 24 August 2017

मृगतृष्णा

मृगतृषणा (दुनियादारी  विषय पर संस्मरण)"

 

       "हाँ , मैं शादी करूंगा तो एक पढ़ी लिखी लड़की से पर वो हाउस वाइफ होगी......" चेन्ना राव की वो बातें मेरे कानों में हमेशा गुंजा करती थी. परन्तु समय के बदलते परिप्रेक्ष्य में ना जाने जिस सोच को मैं जी रही थी वह जैसे बदलने लगी थी. जब उसने यह बातें कहीं तो मुझे कहीं ना कहीं उसमें एक पुरुषवादी अहंग और दकियानूसी विचारों का मिलाजुला समावेश लगा था ,पर आज ,बक्त बदल गया.

             बात उन दिनों की,जब मै स्नातक में पढ़ रही थी , क्रांतिकारी विचारों में जीने वाली. हमेशा अपने पैरों पर चलने वाली स्वतंत्र नारी होने की अभिलाषा लिए अपने स्वप्न लोक में उड़ते रहती. जब क्लास नहीं होता तो अक्सर हम  लाइब्रेरी में बैठा करते , और जो कुछ दोस्तों का साथ हुआ तो वहीं के कैन्टीन से चाय ले टीलों पर घंटों बैठा करते.

इसी दौरान हमारे समूह के चाय में शामिल हुए चेन्ना राव. यूँही सबों के बीच कुछ चर्चा चल रहा थी .सभी अपने अपने विचारों को बता रहे थे. तभी चेन्ना के एक दोस्त जो की सरकारी नौकरी में कार्यरत था अपनी शादी का कार्ड उसे थमहाते चला गया. चूँकि चेन्ना हम सब में बड़े थे और डॉक्टर की उपाधि उन्हें मिलने वाली भी थी, तो शादी का कार्ड देख मुस्कुराने लगे और फिर उनके उदगार थे कि नौकरी मैं करूंगा और पत्नी मेरी घर संभालेगी. खैर , इस बात को बीते शायद कुछ साल गुजर गए. और बात भी आई गई हो गई.

               करीब तीन- चार साल बाद कुछ अध्ययन के सिलसिले  से मुझे राष्ट्रीय संग्रहालय जाना आना पड़ता.

मैं  बस से उद्योग भवन उतरती और बोट क्लब पार करते हुए संग्रहालय पहुँच जाती. यदा कदा वापसी में थोड़ा अन्धेरा हो भी जाता था.मैंने जो बोट क्लब पर युगलों को बैठे देखा तो बड़ी हैरानी हुई. हैरानी यह नहीं की रात के अंधियारे में ये लोग क्या कर रहे

बल्कि हैरानी की बात यह कि, ये किशोर या युवा वर्ग के युगल नहीं थे, बल्कि ये लोग ऑफिस के सहकर्मी थे जो जिनकी नज़दीकियां अपने घरेलु जीवन के परेशानियों से बन आई थीं.

                   तभी ना जाने क्यों चेन्ना की वो बात अचानक ही मानस पटल पर तस्वीर बन नाचने लगी.सच ही तो कहा था उसने. आजकल की जद्दो-जिहाद में रिश्ते ना जाने कब खो जाते हैं . जो रिश्ते असल के थे उससे हम दूर हो रहे क्योंकि उस रिश्ते को निभाने का हमारे पास समय नहीं. जिस सुखद जीवन की सोच में स्वतंत्र होने का सपना दिखा वो तो समय के चंगुल ने ना जाने कहाँ दबोच लिया. ना वो सुख मिला ना वो बात रही. बस सच्चाई है तो इतनी सी कि सभी मृगतृषणा की चाह में जिए जा रहे.

@Ajha.06.12.16

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