Wednesday, 28 March 2018

मूर्तितोड़

(398 'शीर्षक अनुभूति
का ताप')

"मूर्ति तोड़ "
आज रविवार का दिन और सभी दोस्तों को एकत्रित कर श्यामनन्द अपने घर पर अवकाश की मस्ती ले रहे थे। हंसी और शोरगुल के मध्य अपने कमरे से बाहर आते हुए शायमानन्द के बेटे ने बताया _" पापा लेनिन के बाद आज फिर से एक मूर्ति टूटी है ... आंबेडकर की...."
" ये सब हो क्या करहा है... अबतक राजनीति पर धर्मान्धता का आरोप लग रहा था ...और अब ये 'वाद' ने भी विकृत रूप ले लिया.. " श्यामनन्द ने कहा।
तभी किसी दोस्त ने तंज़ कस्ते हुए कहा _ "मार्केटिंग का ज़माना है ,राजनीति भला इससे अछूती कैसे रह सकती है... "
"ये भी कोई मार्केटिंग हुआ और यदि सच में यह रूप तो बहुत ही घिनौना है। कितनी ओछी राजनीति है। आखिर चुनावों में आपने  कौन सा चेहरा जनता के समक्ष लेकर जाएंगे। ये लोग जनता कि नब्ज़ जानते हैं और ये भी जानते हैं आम जनता बहुत भावुक होती हैं. '
"अरे किन बातों में हम समय बर्बाद कर रहे हैं.... "
तभी किसी दोस्त ने कहा.... " अरे हमारे  पूर्वज कोई बेवकूफ थोड़े ही ना थे जो अपने इतिहास,व्यवस्था और ज्ञान की बातों को लिखित में ना  रख बल्कि इन सारी  बातों का दृश्य एयर श्रव्य के माध्यम से अपने भविष्य को याद कराते रहे. वो जानते थे की समाज में कुछ ऐसे भी लोग होंगे जो लिखित नियमावली का गलत
उपयोग कर सकते हैं....हे मानव मस्तिष्क आप महान है...आज से आपकी एक उपाधि और_ 'मूर्ति तोड़ '. "
अपर्णा झा

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