कभी-कभी सोचती हूँ कि हमें विरासत में कैसे माँ और बाबूजी मिले जो पूरी तरह से एक-दूसरे के प्रति समर्पित और प्रेम में डूबे हुए होते भी एक समय के बाद अपनी मर्जी नहीं बता पाते...बल्कि ये जिम्मेदारी बेटे को दे देते हैं कि उनके बांकि के जीवन का फैसला बेटा ही करेगा...
इस अमर प्रेम को परिभाषित कोई करना भी चाहे तो कैसे करे!हमारे बच्चों को तो अपने दादा-दादी, नाना-नानी के इस रिश्ते का पता ही नहीं और फिर हमने उन्हें समझाया ही कब!हम तो उन्हें उच्च स्तरीय नौकरियों के लिये तैयार कर रहें हैं, जहाँ रिश्तों की अहमियत है ही कहाँ !
और अब जब घड़ा खुद पर फूट रहा है तो समय पर दोष आरोपित करते हैं...
वास्तविकता का ज्ञान हमें उम्र के आखिरी पड़ाव पर ही क्यों होता है???
काशकि इसके लिये भी कोई संस्थान होता जिसमे इसकी शिक्षा दी जाती,जिसकी अनिवार्यता हर किसी के लिये होती.
अपर्णा झा
Monday, 27 August 2018
संस्कार
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